आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १६९
तथापि सामान्यतद्वतोरत्यन्तभेदे कथं सामानाधिकरण्य-
मिति चेत्, किमिदम् ? समानेनाधिकरणेन हि सम्बन्धः सामा-
नाधिकरण्यम्, तस्य च भेदेन को विरोध इति नाधिगच्छामः ।
गवाश्वयोरपि तथाभावप्रसङ्ग इति चेत्, ननु व्यतिरेकदृष्टान्त-
स्थानं तत्, न तु विरोधस्थानम् । तन्न मैत्रतनयोऽपि यदि
कश्चिदश्यामः स्यात् परिदृश्यमानानामपि तथाभावप्रसङ्ग इति
क्व नाम दुर्लभम् ?
निचोड ) यही है कि—पहले असत् पिड पीछे कैसे सत् हो सकता
है ?—किन्तु वह तो सांख्यके सत्कार्यवादका अनुगमन कर रही है, जो
आपके द्वारा कभी भी स्वीकृत नहीं हुए रहनेके कारण बिना कुछ खाये
वमनके समान है ।
"तथापि जाति ( धर्म ) और जातिमान् ( धर्मी ) मे यदि अत्यन्तभेद
हो तो उनमें परस्पर सामानाधिकरण्य कैसे हो सकता है ? अतः धर्म
और धर्मीमे अत्यन्तभेद न मानकर आंशिकभेद अर्थात् भेदाभेद ही
मानना चाहिये" तो यह क्या कह रहे हो ? अर्थात् ऐसा नहीं कह
सकते । क्योंकि समान अधिकरणसे सम्बन्ध ही तो सामानाधिकरण्य
कहाता है और उसे भेदसे क्या विरोध है ? यह हम नहीं समझते ।
यदि कहो कि—अत्यन्तभेदमे सामानाधिकरण्य माननेपर गो और
अश्वमें भी सामानाधिकरण्य होने लगेगा—तो हम यह नहीं कहते कि