आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
( १० )
का निर्णय है । काशीस्थ गर्नमेन्टसंस्कृतकालेजमें न्यायशास्त्रके
प्रधानाध्यापक सर्वतन्त्रस्वतन्त्र मेरे गुरुदेव श्रीसूर्यनारायणशुक्लजीने भी
उद्योतकराचार्यका यही समय अपनी न्यायमञ्जरीभूमिकामे निर्धारित
किया है ।
वाचस्पतिमिश्र—
संस्कृतवाङ्मयमें अनेक वाचस्पति हुए हैं। उनमें दो दार्शनिक
वाचस्पति थे । उनमें एकको आचार्यमिश्र वाचस्पतिनामसे तथा
दूसरेको षड्दर्शनटीकाकृत् आचार्यवाचस्पतिमिश्रनामसे प्रसिद्धि प्राप्त
है । इनम द्वितीय षड्दर्शनारण्यानोपञ्चानन आचार्य वाचस्पतिमिश्र
ही न्यायविद्याकी महत्त्वपूर्ण परम्परामें ऋषिकल्प चतुर्थ महापुरुष
थे । इन्होंने •न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकाके अतिरिक्त न्यायसूचीनिबन्ध
•न्यायकलिका या •न्यायकणिका-तत्त्वविन्दु-ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा तत्त्ववैशारदी
और ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यपर भामतीटीकाकी रचना की थी। इसीलिये
‘षड्दर्शनटीकाकृत्’ इस सम्मानोपाधिसे ये
( ११ )
७८ = ९७६ ई० वर्ष न्यायसूचीनिबन्धका रचनाकाल होता है । अर्थात्
ईसाकी दशम शताब्दीके अन्तमें वाचस्पतिमिश्र थे । एवं ११०० शक-
वर्षमें वर्तमान हम्मीरराजाके सभापण्डित श्रीदामोदरके पुत्र श्रीशार्ङ्गधर-
ने नृगनृपतिका निर्देश शार्ङ्गधरसंहितामें किया है । इससे ११००
शकवर्षसे २०० वर्ष पूर्व ८९८ शकवर्षसे नृगराजाका और वाचस्पति-
मिश्रका समय सिद्ध होता है । इसके अनुसार ७८ वर्ष जोड़नेपर
९७६ ई० वर्ष तथा १३५ वर्ष जोड़नेपर १०३३ वि० संवत् वाचस्पतिमिश्र-
का समय आता है ।
किन्तु उपर्युक्त द्विवेदी प्रभृतिके मतका विरोध करते हुए डा० गङ्गा-
नाथझा प्रभृति अन्य विद्वान् न्यायसूचीनिबन्धके उपसंहारमें लिखे उक्त
श्लोकमें वत्सरपदसे विक्रमवत्सर मानकर वाचस्पतिमिश्रका समय
( ८९८-५७ = ) ८४१ ई० वर्ष निश्चित करते हैं । डा० कीथ एवं
डा० वुडश महाशय भी डा० झा के मतका ही समर्थन करते हैं । उभय-
पक्षका सम्यक् विचारकर श्रीउदयवीरशास्त्री भी झामतका ही समर्थन
करते हैं । तथा श्रीद्विवेदी एवं महामहोपाध्याय हरप्रसादशास्त्रीके
मतका खण्डन करते हैं ।
मेरे विचारसे भी डा० झाका ही मत ठीक प्रतीत होता है । क्योंकि
उक्त निबन्धमें वर्षका नामोल्लेख न होनेसे सामान्यत प्रसिद्ध वि०
संवत् ही मानना उचित है । आज भी ईसाका नाम लिये बिना केवल
वर्षसंख्या १८४७, १९४२, १९४७ आदि लिख दिया जाता है, किन्तु
प्रसिद्धिवशात् ई० वर्ष समझा जाता है । वैसे ही वहाँ प्रसिद्धिवश
विक्रमसंवत् ही मानना चाहिये ।
यह इसलिये भी उचित है कि यदि ८९८ शकवर्ष होता तो ९०६
शकवर्षमे वर्तमान उदयनाचार्य वाचस्पतिमिश्रके अत्यन्त समानकालिक
हो जानेसे उनकी न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकापर तात्पर्यपरिशुद्धि कैसे
लिखते ? वाचस्पतिमिश्रलिखित ८९८ को विक्रमवर्ष माननेपर उदयना-
चार्यका समय ( ९०६ शकवर्ष + १३५ = ) १०४१ विक्रमसंवत् होनेसे
वाचस्पतिमिश्रसे लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद उदयनाचार्यद्वारा तात्पर्य-
परिशुद्धिका लिखना सर्वथा संगत होगा । मेरे गुरुदेव श्रीसूर्यनारायण-
शुक्लजीने भी न्यायमञ्जरीकी भूमिकामें ९४१ ई० वर्ष ही वाचस्पति-
मिश्रका समय निर्धारित किया है ।
( १२ )
प्रस्तुत ग्रन्थ 'आत्मतत्त्वविवेक' के रचयिता सुगृहीतनामधेय
आस्तिकशिरोमणि श्रीमान् उदयनाचार्य दार्शनिकगगनमण्डलमें अत्यन्त
तेजस्वी सूर्यके समान विराजमान थे । जिन्होंने न्याय लोक एवं
आगमोंके ऊपर छाये प्रतिपक्षियोंके व्याघातरूप घोर अन्धकारको दूर
कर मुक्तिके मार्गको प्रशस्त किया । ग्रन्थके अन्तमें उनकी यह उक्ति है-
'तदिदमुदयनेन न्यायलोकागमानां व्यतिहतिरवधूय व्यञ्जित धर्म्म मुक्तेः' ।
उनकी प्रसिद्धि अनेक नामोंसे थी । उदयन, उदयनाचार्य
न्यायाचार्योदयन, उदयकर या उदयाकार, उदयंकर एवं उदयनाचार्य
भादुड़ी आदि । अपने 'उदयन' नामका उल्लेख उदयनाचार्यने स्वयं
अपने वैशेषिकसूत्र प्रशस्तभाष्यकी किरणावलीनामक व्याख्याग्रन्थमें
किया है । "व्यतेने किरणावलीमुदयनः" । प्रस्तुत ग्रन्थके उपसंहार-
श्लोकमें भी "तदिदमुदयनेन न्यायलोकागमानाम्" ऐसा उल्लेख किया
है । कलकत्तामुद्रित "आत्मतत्त्वविवेक" के उपसहार-वाक्यमें
"इदमुदयकरेण न्यायलोकागमानाम्" ऐसा पाठ है । इसका उल्लेख
महामहोपाध्याय विन्ध्येश्वरी प्रसाद द्विवेदीने न्यायवार्तिककी भूमिकामें
किया है । इस प्रकार उदयकर भी इनका नाम था । उदयनाचार्य या
न्यायाचार्योदयन ऐसा विद्वानोंद्वारा व्यवहृत नाम भी इन्हीं का है ।
किन्तु ईश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रग्रन्थमे देखा गया 'उदयाका रसूनुना' यह वाक्य
किसी औरको उदयाकरनाभसे अभिहित करता है, उदयनाचार्यको नहीं ।
"शब्देन्दुशेखरे ज्योत्स्नां प्रकरोत्युदयंकरः" श्लोकमे आया उदयंकर-
नाम तो किसी अत्यन्त अर्वाचीनका है, यह सुतरा स्पष्ट है । उदयनाचार्य
भादुड़ी भी प्रस्तुत उदयनाचार्यसे भिन्न थे । क्योंकि चाटुर्जी वानुर्जी
गाङ्गुली भादुड़ी आदि उपाधियाँ बल्लालसेनकी दी हुई हैं, जिनका
समय "अद्भुतसागर आदि ग्रन्थोंके आधारपर १०८५ शकाब्द था ।
जबकि उदयनाचार्यने लक्षणावलीमे इसके निर्माणका काल ९०६ शकाब्द
लिखा है । इस प्रकार उदयन उदयकर-उदयनाचार्य,एवं न्यायाचार्यो-
दयन यही नाम इनके वस्तुतः थे । (द्रष्टव्य--म० म० विन्ध्येश्वरीप्रसाद
द्विवेदीकृत न्यायवार्तिकभूमिका पृष्ठ १५१-५२)
आत्मतत्त्वविवेकके रचयिता श्रीमान् उदयनाचार्य वङ्गदेशीय या
'दाक्षिणात्य नहीं थे किन्तु मैथिल थे, इसका स्पष्ट उल्लेख भविष्यपुराण-
के परिशिष्टमे हुआ है । जैसे -
( १३ )
अथ वक्ष्ये तृतीयस्य हरेरंशस्य धीमतः ।
उदयनाचार्यनाम्नस्तु माहात्म्यं लोमहर्षणम् ॥१॥
भूत्वा स मिथिलायान्तु शास्त्राण्यध्येष्ट सर्वशः ।
विशेषतो न्यायशास्त्रे साक्षाद् वै गौतमो मुनिः ॥२॥
बौद्धसिद्धान्तमुग्धान्ध-सुखाय हितकारिणीम् ।
वितेने विदुषां प्रीत्ये विमलां किरणावलीम् ॥३॥
मिथिलामाजगामाशु निजमन्दिरमुत्तमम् ।
तत्र शिष्योपशिष्यैश्च सेवित परमादरात् ॥७९॥
अध्यापयामास मुहुः सर्वशास्त्राणि यत्नतः ।
अधीय तस्मादाचार्याद् वेदशास्त्राणि सर्वशः ॥८०॥
धर्मं संस्थापयामासुर्द्देशेदेशेऽतिपण्डिताः ।
अद्यापि मिथिलायान्तु तदन्वयभवा द्विजाः ॥८१॥
एवं सोदयनाचार्यो बभूव पृथिवीतले ॥८४॥ इत्यादि ।
( भवि० पु० परि० भगवद्भक्तमाहात्म्य अध्याय ३० )
इस प्रकार स्थूलरीतिसे उदयनाचार्यके देश-काल एवं स्थितिका
निर्णय होता है । सूक्ष्मरीतिसे तो उनके कालका निर्णय उनकी लक्षणा-
वलीके अन्तिम श्लोकसे होता है । वहाँ उदयनाचार्यने स्वयं उल्लेख
किया है— तर्काम्बराङ्कप्रमितेष्वतीतेषु शकान्ततः ।
वर्षेषूदयनश्चक्रे सुबोधां लक्षणावलीम् ॥
इस श्लोकके अनुसार ९०६ शकवर्षमें उदयनाचार्यकी स्थिति
थी, यह निश्चित होता है । यह समय ई० वर्षके रूपमें ९८४ वा
वर्ष होता है । अर्थात् ईसाकी दसवीं शताब्दीके अन्तिम भागमें
उदयनाचार्यकी स्थिति थी ।
एवं, नैषधीयचरितकी एक टीका ९७२ शकवर्ष में लिखी गयी थी,
वह बात भी—
“युग्माश्वाङ्कैर्निरुक्ते शकनृपतिसमे कान्यकुब्जेश्वरस्य ,
आदेशं प्राप्य यत्नान्नलचरितमहाकाव्यटीकां व्यधत्त ।
सूरिर्भूदेवसंज्ञो दिनमणितनयः कूर्मपूर्वाग्रजन्मा ,
तुष्यत् तेनान्तरात्मा त्रिभुवनजनकोमापतिःश्रीमहेशः ॥”
से प्रमाणित है ।
इस टीकाके निर्माणकालको ध्यानमें रखते हुए यह निश्चित होता
( १४ )
है कि नैषधकाव्यके प्रणेता श्रीहर्ष ९७२ शकवर्षसे पूर्वमें थे । और
इन्होंने खण्डनखण्डखाद्यमें उदयनाचार्यकी "शङ्का चेदनुमास्त्येव'
इस कारिकाके उद्धरणके साथ न्यायमतका खण्डन किया है । इससे
भी पुष्ट है कि उदयनाचार्यका ९०६ शकवर्ष काल माननेमें कोई भी
अनुपपत्ति नहीं है ।
उदयनाचार्यने न्यायवार्तिकतात्पर्यपरिशुद्धिमें लिखा है "प्रपञ्चि-
तोऽयं न्यायकुसुमाञ्जलाविति' ( न्या० वा० अ० २ आ० २ ) । एव,
वहीं अ० ३ आ० १ में "विद्यासन्ध्योदयोद्रेकात्" इत्यादि श्लोक लिखा
है, जो किरणावलीके प्रारम्भमें भी है । एव "अपसिद्धान्तस्तु यथा
विरोधाद्भिद्यते तथा तत्रैव वक्ष्यते, शेष परिशिष्टे" यह लिखकर 'न्याय-
परिशिष्ट" ग्रन्थका उल्लेख किया है । किरणावलीमें "विस्तरस्तु न्याय-
कुसुमाञ्जलावात्मतत्त्वविवेके चानुसन्धेय" ऐसा लिखा है । तात्पर्य-
परिशुद्धि और किरणावलीमे लिखा 'विद्यासन्ध्योदयोद्रेकात्" इत्यादि
श्लोक लक्षणावलीमे भी है ।
उपर्युक्त लेखोंसे यह निर्विवाद सिद्ध है कि न्यायकुसुमाञ्जलि
आत्मतत्त्वविवेक किरणावली न्यायवार्तिकतात्पर्यपरिशुद्धि—न्यायपरिशिष्ट
और लक्षणावली ये छहों ग्रन्थ उदयनाचार्यके ही लिखे हैं । न्याय
परिशिष्टनामक न्यायसूत्रवृत्तिका ही अन्य नाम प्रबोधसिद्धि बोधशुद्धि
है, यह बात श्रीवरदराजाचार्यने तार्किकरक्षामें निरूपित की है ।
उपर्युक्त ग्रन्थोंमें सबसे पहिले आत्मतत्त्वविवेक लिखा ऐसा प्रतीत
होता है । क्योंकि उसके ईश्वरसिद्धिप्रसङ्गमे न्यायकुसुमाञ्जलिके
प्रसङ्गोंका कुछ भी संकेत नहीं है । उसके बाद क्रमशः न्यायकुसुमाञ्जलि,
परिशिष्ट, तात्पर्यपरिशुद्धि, किरणावली, अनन्तर लक्षणावली लिखी गयी,
ऐसा प्रतीत होता है ।
त्रिदण्डिवेदान्तियोंका कहना है कि उदयनाचार्यने आत्मतत्त्वविवेकके
अन्तमें "अत एव त्रिदण्डिवेदान्तमतोपसंहार " ऐसा लिखा है । तथा
रामानुजाचार्यके बाद ही त्रिदण्डिवेदान्तियोंका मत प्रचलित होनेसे
रामानुजाचार्यके बाद ही उदयनाचार्यकी स्थिति सिद्ध होती है ।
'प्रपन्नामृत' ग्रन्थके आधारपर रामानुजाचार्यका स्थितिकाल १०१२ शकवर्ष
था । अतः लक्षणावलीग्रन्थमे प्रतिपादित ९०६ शाकाब्दमे उदयनाचार्य
की स्थिति सम्भव नहीं है ।
( १५ )
एव, किन्तु उक्त कथन ठीक नहीं है। क्योंकि रामानुजाचार्यसे भी
बहुत पहले टङ्क-द्रमिण-गुहदेव-भारुचि आदि विशिष्टाद्वैतवादी आचार्य
थे। जिनके सम्बन्धमे 'एकदण्डी त्रिदण्डी वा' ऐसा मनुने स्मरण किया
है। इसलिए त्रिदण्डिवेदान्तमत भी अत्यन्त प्राचीन था और उसीका
उल्लेख उदयनाचार्यने किया है।
सुरेश्वराचार्यने बृहदारण्यकवार्त्तिकके ब्राह्मण ५ अध्याय ६ मे
“सत्रिदण्डवत्” ऐसा उल्लेख किया है। इससे निश्चित होता है
कि शङ्कराचार्यके परवर्ती वाचस्पतिमिश्रके और उनके भी परवर्ती
उदयनाचार्यकेद्वारा त्रिदण्डिमतका उपन्यास होनेमे कोई अनुपपत्ति
नहीं है।
यदि विशिष्टाद्वैत सम्प्रदायको पूर्वापेक्षया अधिकाधिक लोकविश्रुत
करनेवाले अद्वितीय आचार्य श्रीरामानुजाचार्यको ही आधार मानकर
उदयनाचार्यने आत्मतत्त्वविवेकमे “त्रिदण्डिमतोपसहारः” लिखा है,
ऐसा त्रिदण्डिवेदान्तियोंका आग्रह हो तो भी उदयनाचार्यकी ९०६
शकवर्षमें स्थितिका सामञ्जस्य किया जा सकता है। जैसे—१०१२
शकवर्षपर्यन्त १२० वर्षकी परमायुको प्राप्त रामानुजाचार्यका जन्मकाल
( १०१२-१२० = ) ८९२ शकवर्ष सिद्ध होता है। लक्षणावलीके
अनुसार सर्वमान्य ९०६ शकाब्दके बाद भी उदयनाचार्यकी स्थिति हो
सकती है। ऐसी स्थितिमे ९०६ शकाब्दमे और उसके बादमें भी
वर्तमान उदयनाचार्य “त्रिदण्डिमतोपसहारः” ऐसा उल्लेख कर सकते
हैं। अतः उदयनाचार्यकी ९०६ शकवर्षमे स्थिति होनी सर्वथा
प्रामाणिक है।
किसीके अनुसार उदयनाचार्य १०२९ शकवर्षमें अवस्थित लक्ष्मण-
सेनकी सभामें थे। क्योंकि गोवर्धनाचार्यने शृङ्गारसप्तशतीके अन्तमे
लिखा है—
उदयनबलभद्राभ्या सप्तशती शिष्यसोदराभ्या मे ।
द्यौरिव रविचन्द्राभ्यां प्रकाशिता निर्मलीकृत्य ॥
यहाँपर आनन्दपण्डितने इसकी व्याख्यामे उदयनका अर्थ उदयनाचार्य
किया है। तथा गोवर्धनाचार्य राजा लक्ष्मणसेनके पञ्चरत्नोंमें थे।
जैसा कि "पञ्चरत्न" ग्रन्थमे कहा है—
ख्यातो गोवर्धनाचार्य उमापतिधरस्तथा ।
शरणो जयदेवश्च धोयी कविनृप क्रमात् ॥
यहाँ लक्ष्मणसेनकी सभामें गोवर्धनाचार्यके रहनेसे उनके शिष्यका उस
कालमें रहना सुतरा सिद्ध है । किन्तु १०२९ शकवर्षके निकटमें
अथवा उसके बादमे ९०६ शकवर्षमें वर्तमान उदयनाचार्यका रहना
असम्भव होनेसे लक्ष्मणसेनकी सभामे वर्तमान गोवर्धनाचार्यके शिष्य
उदयनाचार्य कोई अन्य ही उदयनाचार्य थे । ऐसा मानना चाहिये ।
एव, १३०० शकाब्दमें वर्तमान जयदेवरचित गीतगोविन्दके टीका-
कार उदयनाचार्य भी कोई अन्य ही थे । क्योंकि ९०६ शकवर्षके साथ
उक्त शकाब्दका विरोध स्पष्ट है । इसलिए ९०६ शकवर्ष उदयनाचार्यका
स्थितिकाल सर्वथा असंदिग्ध है ।
श्रीउदयनाचार्य परमभगवद्भक्त एव आस्तिकशिरोमणि थे । इसके
सम्बन्धमें भविष्यपुराणके परिशिष्टमे निम्नलिखित वर्णन हुआ है—
एक समय कोई बौद्धाचार्य अपने शिष्यों सहित बौद्ध सिद्धान्तोंको
प्रकट करनेके उद्देश्यसे तिरहुत ( मिथिला ) के राजदरबारमे पहुँचा
और अहङ्कारके साथ अपने एक शिष्यको दूतके रूपमे राजाके पास इस
सन्देशके साथ भेजा कि जाओ और मेरे शब्दोंमें मिथिलेशको कहो
कि हे राजन् ! आप वेदशास्त्रोंसे व्यर्थ ही भ्रममें पड़े हो । मेरे शास्त्रको
देखो और मेरे मार्गका अनुगामी बनो । यदि इस प्रदेशमे कोई
व्यक्ति वेदमतकी स्थापना कर सकनेवाला हो तो उसे बुलवाओ कि वह
मेरे साथ विचार करे । राजाने बौद्धाचार्यके दूतकी उस बातको
सुनकर कहा कि जाओ, अपने गुरुसे कहो कि मैं भ्रममे हूँ या वह भ्रममे
हैं, यह निश्चय करना बहुत बडी बात है । कल प्रातः सभामे आवो,
उसमे व्यक्त हो जायगा । यह सुनकर वह दूत राजाके कथनको अपने
गुरुसे निवेदित किया ।
राजाने तत्काल प्रदेशके बहुत पण्डितों को, जिनमें उदयनाचार्य
प्रमुख थे, बुलाकर कहा । अहो, अत्यन्त विद्वान् नास्तिकका इस राज
में आगमन हुआ है, इनके साथ आप लोग शास्त्रार्थ करें । यदि वह
जीत जाते हैं तो मैं और आप सभी उनके मतके अनुयायी हो जायेंगे ।
यदि आप सबकी विजय होती है, तो मैं आप सबकी सेवा करूँगा,
इसमें संशय नहीं है । यह सुन सभी विद्वान् मौन रहे किन्तु उदयना-
( १७ )
चार्यने राजासे कहा—ठीक कहते हो, किन्तु मेरी बात सुनो । मनुष्य
की जय या पराजय तो हरिकी इच्छाके अधीन है । यथाशक्ति हम
विवाद करेंगे, आप चिन्ता छोड़कर हमारे पराक्रमको देखो। दूसरे
दिन राजदरबारमे उपस्थित होकर राजाने सभी विद्वानोंको और उस
बौद्धाचार्यको भी बुलाकर कहा कि आप दोनों (उदयनाचार्य एव बौद्धा
चार्य) का मेरे समक्ष बिचार हो । राजाके निर्देशानुसार बहुत दिनो
तक उन दोनोंका भारी विवाद चलता रहा । तब बौद्ध विद्वान्ने
उदयनाचार्यसे अपनी पराजयको समझते हुए आश्चर्य करानेवाली
अपनी माया फैलायी और राजासे बोला—
शालग्रामकी शिलामे इनके मतमे भगवान् वस्तुत स्थित हैं।
उसे मगावैं, मैं अपने मतसे उसे खण्डित कर देता हूँ। यदि वह शिला
जलवत् होकर अदृश्य हो जाती है, तो मेरा कथन सत्य होगा। यदि
उदयनाचार्य उसे जलवत् करके पुन शिला को व्यक्तकर देंगे तो इनका
भी मत मैं सत्य मान लूँगा। इसमे सशय नहीं है।
राजाने उदयनाचार्यकी तरफ देखा और बोले कि यह बौद्धाचार्य
क्या कह रहे हैं । इसपर उदयनाचार्य अत्यन्त हर्षित हुए और बोले कि
यद्यपि यह इनकी माया है, तथापि मै इसे स्वीकार करता हूँ। मैं माया
भी जानता हूँ, किन्तु एक बात मैं भी कहता हूँ कि शिलाके वैसा हो जाने
पर सभासद् लोग भ्रमसे यही कहेंगे कि दोनोंका मत सत्य है। इसलिये
कौन सत्य है और कौन मिथ्या है, इसके निर्णयके लिये मैं एक शर्त
कहता हूँ। यदि उसे यह स्वीकार करेंगे तो मै भी अपनी प्रतिज्ञाको
पूरी करूँगा। तब राजाने बौद्धाचार्यकी ओर देखा । बौद्धाचार्यने
कहा कि मैं इनकी शर्त मानूँगा ।
दोनोंकी बात सुनकर एक सुदृढ़ शालग्रामकी शिलाको मँगवाया
और उसे एक पवित्र सोनेकी थालीमे रखवाया। तब उक्त बौद्धने अपने
मतको प्रतिपादित किया। तदनन्तर क्षणभरमे वह शिला जल बन
गयी और अग्रिम क्षणमे ही वह तिरोहित हो गयी । सबके समक्ष यह
अद्भुत कार्य हुआ । उसके बाद उदयनाचार्यने बौद्धमतका खण्डन
करते हुए अपना मत कहा । तत्काल वह जल प्रकट होकर अग्रिम क्षण
में ही वह जल पुनः शिला बन गया ।
( १८ )
तदनन्तर राजा आदि सभीने साधु साधु कहते हुए उदयनाचार्यकी
प्रशंसा की । किन्तु आचार्य ने कहा—इनका भी मत जब स्थित ही है
तो यह मेरी प्रशंसा कैसी ? इसलिये अब जो मैं कहता हूँ, उसे
बौद्धाचार्य करें ।
ऐसा कह कर बौद्धाचार्यको कहा कि—मैंने आपके कथनानुसार कर
दिया । किन्तु किसका मत सत्य है और किसका मिथ्या है ? इसके
निश्चयके लिये जो मैं कहता हूँ, राजाके समक्ष करें ।
यह अतिविशाल तालका वृक्ष दरवाजेपर स्थित है । इसपर
चढ़कर हम दोनों ऊपरसे गिरें । "वेदाः प्रमाणम्" यह कह कर मैं और
"वेदाः अप्रमाणम्" यह कह कर आप ऊपरसे गिरना । हम दोनों साथ-
साथ तालवृक्षसे गिरेंगे । दोनोंमें जो जीवित रहेगा, उसका मत सत्य
होगा और उसे सभी लोग स्वीकृत करेंगे । उदयनाचार्यके इस वचन-
को बौद्धाचार्यने भी स्वीकार कर लिया ।
तब राजाने उन दोनोंसे कहा कि प्राणान्त करनेवाली यह परीक्षा
ठीक नहीं है । इसलिये आप दोनों इस विचारको छोड़ दें । राजाके
इस वचनको सुनकर उदयनाचार्यने कहा कि इसमे कोई दोष नहीं है ।
हम शास्त्रके प्रति भक्तिसे अपनी रुचिसे ऐसा करेंगे और तुम मेरे या
इनके किसी एकके मर जानेपर उसके मतको छोड़कर जीवित बचे हुए
के मतको स्वीकार कर लेना ।
ऐसा सुन कर राजाने बौद्धाचार्यकी ओर देखा । उन्होंने भी ऐसा
ही कहा । राजाने भी प्रतिज्ञा की । तब उदयनाचार्य एवं बौद्धाचार्य
दोनों उस महावृक्षपर चढ़कर अपने-अपने मतको बोलकर पृथिवीपर
गिरे । उदयनाचार्य "वेदा प्रमाणम्" कह कर और बौद्धाचाय "वेदाः
अप्रमाणम्" कह कर गिरे । उदयनाचार्य वेदोंसे सुरक्षित होकर वेद
और हरिका स्मरण करते हुए पृथिवीपर खड़े हो गये । किन्तु बौद्धा-
चार्यका ऊपरसे गिरते ही प्राणान्त हो गया । यह महान् आश्चर्य देख
कर राजा आदि सभीने आचार्यको बार-बार नमस्कार कर उनकी प्रशंसा
की । उसके अनन्तर राजाने वेदशास्त्रको सत्य मानकर उसे अपने
राज्यमें स्थापित किया और वैदिक आचारमें निरत हो गये तथा
राज्यके सभी बौद्ध उपासक आस्तिक हो गये ।
पुनः एकबार उदयनाचार्य भगवान् जगन्नाथका दर्शन करनेकी
इच्छासे पुरी गये । वहाँपर मार्कण्डेय हृद आदि तीर्थजलसे स्नानकर
मन्दिरके द्वारपर आ गये । भगवान्के दर्शनहेतु जब मन्दिरके भीतर
प्रवेश करना चाहे तो अपने आप कपाट बन्द हो गया । यह देखकर
उदयनाचार्य दूसरे द्वारपर गये, वहाँ भी वैसा ही हुआ । तीसरे द्वारपर
जानेपर भी वैसा ही हुआ । तब आचार्य चतुर्थ द्वारपर जाकर मन्दिर मे
जानेको तत्पर हुए । किन्तु उस कपाटको भी बन्द देखे ।
इस कौतुकको देखकर वे सभी जन खड़े रहे । किन्तु उदयनाचार्य
जी मुस्कुराते हुए बोले—
जगन्नाथ ! सुरश्रेष्ठ !
ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मामवज्ञाय वर्तसे ।
उपस्थितेषु बौद्धेषु मदधीना तव स्थिति ॥ ६८-६९ ॥
( भवि० पु० परिशिष्ट अ० ३० )
इतना कहते ही तुरन्त सभी बन्द कपाट खुल गये । जगन्नाथके सभी
पुजारी चकित हो गये तथा आदरपूर्वक उदयनाचार्यको ले जाकर
मन्दिरमें भगवान् जगन्नाथका दर्शन कराये । उदयनाचार्यने भगवानका
दर्शन, पूजन और स्तुति करते हुए वहाँ कई रात निवास किया । तथा
भगवान्ने स्वप्नमे पूजारियोंसे कहा कि मेरा उत्कृष्ट पीताम्बर उदयनाचार्य
को दो, वह मेरा अत्यन्त प्रिय है और मेरा ही अश है, इसमे सन्देह
नहीं है । बौद्धसिद्धान्तवादियोंद्वारा तिरस्कृत होनेपर इसने ही मुझे
कायम रखा है । तब प्रात उठ कर पुजारीजन जगन्नाथकी आज्ञासे
उनका पीताम्बर लाकर आचार्यको दे दिये । आचार्यने उस प्रसादको
शिरोधार्य कर लिया । और प्रसाद प्राप्त कर मिथिलामे आ गये ।
और वहाँ सर्वशास्त्रोंको पढाने लगे । बहुत समयके बाद वृद्ध हो
काशी आकर कुछ दिन रहकर उन्होंने मणिकर्णिकामे मङ्गानालमें लीला-
पूर्वक प्राणत्याग कर दिया । इस प्रकार उदयनाचार्य धर्मकी स्थापना
तथा नास्तिक्यकी निवृत्तिके लिये पृथिवीपर अवतरित हुए थे ।
( भवि० पु० परिशिष्ट अध्याय ३० )
प्रस्तुत पुस्तक आत्मतत्त्वविवेकका अनुवाद करने एव इसके प्रका-
शनकी प्रवृत्ति मेरे अन्दर तभी हुई थी, जब मैं मारवाड़के सिरोही
प्रस्तुत ग्रन्थ आत्मतत्त्वविवेकमे आत्मतत्त्वका विशद विवेचन
किया गया है। क्योंकि आस्तिक नास्तिक सभी अध्यात्मवादियोंको
इस बातमे समान मान्यता है कि सर्वानुभवसिद्ध दुःखके नाशका एक-
मात्र उपाय तत्त्वज्ञान ही है। और वह ज्ञेय तत्त्व आत्मा ही है। भले
ही वह ज्ञेय आत्मा निरात्मवादियोंके लिये निषेध्यरूपमे ज्ञेय हो या
आत्मवादियोंके लिये विधिरूपमे ज्ञेय हो । अर्थात् वह आत्मा क्या
है ? जिसका नैरात्म्यवादी निषेध करते हैं और आत्मवादी अस्तित्व
प्रतिपादित करते हैं। इस प्रकार उभयदृष्टिसे उस आत्मतत्त्वका विवेचन
करना आवश्यक होनेसे इस ग्रन्थमें उसका विवेचन किया गया है।
इसीलिये इसका नाम आत्मतत्त्वविवेक रखा गया है। इसका अन्य
नाम बौद्धाधिकार या बौद्धधिकार भी है। यद्यपि उदयनाचार्यके सभी
ग्रन्थ बौद्धोंकी आलोचना करते हैं, किन्तु उन सबोंमे आत्मतत्त्वविवेक
बौद्धमत खण्डनमें अकेला तत्पर है।
यह ग्रन्थ चार अधिकरणोंमें पूर्ण होता है—क्षणभङ्गवाद, बाह्यार्थ
भङ्गवाद, गुणगुणिभेदभङ्गवाद एव अनुपलम्भवादके रूपमे । उक्त
चारो वाद बौद्धोंके हैं, जिनका श्रीमदुदयनाचार्यने प्रबल प्रतिवाद
प्रस्तुत किया है। सिद्धान्तकी दृष्टिसे इन चारो अधिकरणों को क्षण
भङ्गभङ्ग बाह्यार्थभङ्गभङ्ग गुणगुणिभेदभङ्गभङ्ग और अनुपलम्भभङ्ग
प्रकरण नामसे भी कहा जाता है।
क्षणभङ्गवाद—
इस प्रकरणमें क्षणिकवाद का खण्डन किया गया है, जिससे नित्य
आत्मा स्वतः सिद्ध हो जाता है। बौद्धमतके अनुसार जब सभी पदार्थ
क्षणिक हैं, तो आस्तिकोंका नित्य आत्मा कैसे सिद्ध हो सकता है। उनका
यह अनुमान है कि—"यत् सत् तत् क्षणिक यथा जलधर, सन्तश्च भावा
अमी। इत्यादि। अर्थात् जो सत् है, वह क्षणिक है, जैसे मेघ और
घटादि। विवादका विषय शब्दादि भी सत् हैं, इस लिये वे सभी क्षणिक
हैं। इस अनुमानप्रमाण से जब सभी पदार्थ क्षणिक सिद्ध हैं तब
नित्य आत्माके अस्तित्वका प्रश्न ही कहाँ है। यह बौद्धका पूर्वपक्ष है।
यहाँ सिद्धान्तीका कहना है कि "जो सत् है वह क्षणिक है" यह
व्याप्ति ही असिद्ध है। यदि कहा जाय कि क्षेत्रस्थ बीज अङ्कुर जननमें
( २० )
स्टेटमे एक जैनमुनिको न्याय पढ़ानेके लिए उनके आग्रहपर कुछ
समयके लिये वहाँ गया था। वहाँ अनेक न्यायग्रन्थोंके अध्यापनके
साथ साथ आत्मतत्त्वविवेकके भी अध्यापनका सुअवसर प्राप्त हुआ।
अनुवादकार्यकी पूर्णता मैंने गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज, भागलपुर (बिहार)
में अपने कार्यकालमें कर ली थी। किन्तु प्रकाशनकी चेष्टा काशी-हिन्दू
विश्वविद्यालयमें आनेके बाद ही की।
अनुवादकी पाण्डुलिपि मैंने वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालयमे
अनुसन्धान विभागके तत्कालीन डाइरेक्टर श्रीक्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय
को दिखलाई। इस कार्यसे बहुत प्रसन्न हो उन्होंने सुझाव दिया कि
आत्मतत्त्वविवेकमें आये पूर्वपक्षोंके मूलवचनोंका ससन्दर्भ उल्लेख
टिप्पणीमें या स्वतन्त्ररूपमें कर देना महत्त्वपूर्ण होगा। उनके निर्देश-
नुसार मैंने उसे भी यथाप्राप्त बौद्धग्रन्थोंका आलोडन कर परिशिष्टके रूप-
मे सन्निविष्ट कर दिया। बादमें इस पाण्डुलिपिको मैंने सम्पूर्णानन्द
संस्कृत विश्वविद्यालयके प्रकाशनविभागको प्रकाशनकी स्वीकृतिहेतु दे
दिया। पाण्डुलिपि लगभग दो वर्ष रखी रह गई और प्रकाशनके लिए
पहलेसे स्वीकृत पुस्तकोंकी लम्बी परम्परामें इसके शीघ्र प्रकाशनकी आशा
न देखकर मैंने अपनी पाण्डुलिपि वहाँसे वापस ले ली। अन्तत उत्तर-
प्रदेश संस्कृत अकादमी, लखनऊकी आर्थिक सहायता पाकर मैंने स्वयं
प्रकाशनका निर्णय कर लिया। प्रकाशनके पूर्व विद्वानोंके प्राप्त सुझावके
अनुसार इसकी भाषाको भी यथासम्भव परिमार्जित किया। फलतः
बहुत कालके अन्तरालमे भी इसका प्रकाशनकार्य सम्पन्न हो सका यह
भगवान् विश्वनाथकी कृपा ही थी।
विषयकी दृष्टिसे गम्भीर एव भाषाकी दृष्टिसे दुरूह इस महत्त्वपूर्ण
ग्रन्थका अनुवादकार्य मैंने अध्यापनके साथ साथ लगभग दो वर्षों में पूर्ण
किया था। उस समय मेरे पास महामहोपाध्याय लक्ष्मणशास्त्री द्राविड़
द्वारा सम्पादित एशियाटिक सोसाइटी, बङ्गालसे प्रकाशित हुई शङ्कर-
मिश्र, रघुनाथशिरोमणि एव भगीरथठक्कुरकी टीकाओंसहित आत्मतत्त्व
विवेक पुस्तक प्राप्त थी। उसमे शङ्करमिश्रकी कल्पलता, भगीरथठक्कुरकी
प्रकाशिका एव रघुनाथशिरोमणिकी दीधिति टीकायें सन्निविष्ट थी।
मथुरानाथ तर्कवागीशकी भी 'रहस्य' नामक टीका प्रारम्भकी कुछ
पंक्तियों तक ही होकर रह गयी मिली, यह आश्चर्य है। प्रकाशिका एव
( २१ )
दीधिति टीकायें ग्रन्थके अन्ततक हैं, किन्तु बीच-बीचमें कही नहीं भी
हैं। किन्तु शङ्करमिश्रकी कल्पलता टीका साद्यन्त अविकल है।
अनुवाद करते समय मैंने उक्त सभी टीकाओंका सहारा लिया है।
किन्तु जहाँपर व्याख्याओमे भेद प्रतीत हुआ है, वहाँ मूलके अत्यन्त
निकट और अक्लिष्ट व्याख्याका ही अनुगमन किया है। ग्रन्थके
अस्फुट विषयको स्फुट करनेकी मेरी यथाशक्ति चेष्टा रही है। उसमें
भी मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसे विद्वज्जन ही बता सकते हैं। मेरा
प्रयास विषयके विवेकके साथ पंक्त्यर्थ का विवेक करनेका भी रहा है।
ताकि ऐसा न हो कि विषयका ज्ञान हो जानेपर भी किसी पंक्तिका
अर्थ अज्ञात रह जाय या एक भी पद का अर्थ छूट जाय। इसी मानीमें
यह अनुवाद विवेचनात्मक है तथा मूल और अनुवादमें बिम्बप्रतिबिम्ब-
भाव जैसा है।
इस संस्करणमें दी गयी टिप्पणियां, जैसे "१ पु० पा०, २ पु० पा०,
३ पु० पा०" एशियाटिकसोसाइटी कलकत्ताद्वारा प्रकाशित आत्मतत्त्व-
विवेकके अनुसार ही मैंने भी दी हैं। कलकत्तावाला संस्करण महा-
महोपाध्याय लक्ष्मणशास्त्री द्राविड़ एव विन्ध्येश्वरीप्रसादद्विवेदीद्वारा
सम्पादित होनेसे प्रामाणिक है।
यहाँ टिप्पणीमें अङ्कित १ पु० से जयनारायणतर्कपञ्चानन एवं
मदनमोहन शर्मन्द्वारा सम्पादित ( कलकत्ता १८४७ ) आत्मतत्त्व-
विवेक लिया गया है। तथा २ पु० जीवानन्द विद्यासागर, कलकत्ता
सम्पादित ( १८७३ ) आत्मतत्त्वविवेक लिया गया है। तथा टिप्पणीमें
अङ्कित ३ पु० पा० से यदुनाथसार्वभौमकी पुस्तकका पाठ लिया गया
है। यह बात रायल एशियाटिक-सोसाइटी, बङ्गालके तत्कालीन जेनरल
सेक्रेटरी जोह्न-वान-मेननद्वारा लिखित भूमिकासे विदित है। इन
तीन संकेतोंके अतिरिक्त सभी टिप्पणियाँ स्वयं मेरी दी हुई हैं।
प्रस्तुत पुस्तकके शुद्ध सम्पादनका भी प्रयास मैंने किया है। मूल-
ग्रन्थके अनुच्छेदोंका निर्धारण प्रायः मैंने अपने ढङ्गसे किया है, ताकि
पाठकोंको विषयबोधमें सुविधा हो। अत्यन्त सावधानीसे इस संस्करण
को शुद्ध बनानेका प्रयास करनेपर भी मानवसुलभ मेरी अनवधानतासे
या मुद्रणके दोषसे यदि त्रुटियाँ रह गई हों तो सहृदय विद्वज्जन कृपया
स्वयं शुद्ध कर लेंगे, यह मेरी विनम्र प्रार्थना है।
दीधिति टीकायें ग्रन्थके अन्ततक हैं, किन्तु बीच बीचमें कहीं नहीं भी
हैं । किन्तु शङ्करमिश्रकी कल्पलता टीका सायन्त अविकल है ।
अनुवाद करते समय मैने उक्त सभी टीकाओका सहारा लिया है ।
किन्तु जहाँपर व्याख्याओंमे भेद प्रतीत हुआ है, वहाँ मूलके अत्यन्त
निकट और अक्लिष्ट व्याख्याका ही अनुगमन किया है । ग्रन्थके
अस्फुट विषयको स्फुट करनेकी मेरी यथाशक्ति चेष्टा रही है । उसमे
भी मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसे विद्वज्जन ही बता सकते हैं । मेरा
प्रयास विषयके विवेकके साथ पक्त्यर्थ का विवेक करनेका भी रहा है ।
ताकि ऐसा न हा कि विषयका ज्ञान हो जानेपर भी किसी पक्तिका
अर्थ अज्ञात रह जाय या एक भी पद का अर्थ छूट जाय । इसी मानिये
यह अनुवाद विवेचनात्मक है तथा मूल और अनुवादमे बिम्बप्रतिबिम्ब
भाव जैसा है ।
इस सस्करणमे दी गयी टिप्पणियों, जैसे "१ पु० पा०, २ पु० पा०,
३ पु० पा०' एशियाटिकसोसाइटी कलकत्ताद्वारा प्रकाशित आत्मतत्त्व
विवेकके अनुसार ही मैने भी दी हैं । कलक
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कहनेका क्या अभिप्राय है ? क्या विनाश प्रतियोगीरूप है ? या
अलीक है ? या प्रतियोगीका कार्य है ? अथवा प्रतियोगीका व्यापक है ?
अर्थात् विनाशके ध्रुवभावी होनेके उपर्युक्त कारण हो सकते हैं । किन्तु
उनमें कोई भी यहाँ नहीं हो सकता है । प्रथम इसलिये नहीं हो सकता
कि निषेध्य एव उसका निषेध दोनोंका एकत्व अनुपपन्न है । क्योंकि—
विधिरात्माऽस्य भावस्य निषेधस्तु ततः परः ।
सोऽपि चात्मेति कः प्रेक्षः शृण्वन्नपि न लज्जते ॥
निषेध अलीक रूप है, यह द्वितीय विकल्प भी ठीक नहीं है ।
क्योंकि विनाश यदि तुच्छ है तो उसके अहेतुकत्वमे क्या आया ?
ऐसी स्थितिमे घटका विनाश क्वचित्क या कादाचित्क न होकर सर्वत्र
एव सदा होने लगेगा ।
प्रतियोगीका कार्य भी विनाश नहीं हो सकता है । क्योंकि वैसा
माननेपर विरोधमे असिद्धिदोष हो जायगा । विनाश प्रतियोगीका
व्यापक है, इसलिये वह ध्रुवभावी है, यह चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं
है । क्योंकि प्रतियोगी और उसके विनाशका भिन्न भिन्न समय होनेसे
व्यापकत्व असम्भव है ।
यदि पूछो कि भाव यदि क्षणिक नहीं है तो स्थिर भी कैसे है ?
तो यही उत्तर होगा कि 'स एवायम्' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होनेसे भाववस्तु
स्थिर है ।
इसके अतिरिक्त क्षणिकत्व अनुपपन्न भी है । क्योंकि सभी भावोंको
क्षणिक माननेपर अनेक देश कालमे अनुगत गवादि व्यवहार नहीं बन
सकेगा । यदि कहा जाय कि—अनुगत व्यवहारका कारण भावरूप
गोत्वादि नहीं है किन्तु अभावरूप अगोपोह ( अगोव्यावृत्ति ) आदि ही
है । अतः सभी भाव वस्तु क्षणिक है, इसमें कोई बाधा नहीं है—तो
ऐसा नहीं कह सकते । क्योकि अपोहवाद अनुभवविरुद्ध होनेसे
अप्रामाणिक है ।
बाह्यार्थभङ्गवाद—
इस प्रकरणमें विज्ञानवादका खण्डन कर बाह्यार्थकी सिद्धि की
गयी है, जिससे विज्ञानातिरिक्त आत्माकी सिद्धि हो जाती है । बौद्ध
के मतमें आन्तर क्षणिकविज्ञान वास्तविक है, उससे अतिरिक्त सभी
( २५ )
बाह्यपदार्थ असत् हैं । उसीके अन्तर्गत नैयायिकोंका नित्य आत्मा भी
है और वह असत् है ।
यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या ग्राह्यतत्त्व बाह्यार्थ एवं ग्राहकतत्त्व
आन्तरविज्ञान ये दोनों ही परमार्थतः सत् हैं और इनका अभेद
विवक्षित है ? अथवा ये दोनोंमें भेद होनेपर भी दोनों एक जातिके हैं ?
अर्थात् बाह्यार्थ भी ज्ञानजातिका ही है ? अथवा ज्ञान परमार्थसत् है
और बाह्यार्थ अलीक है अर्थात् असत् है ?
इनमें प्रथम अभेदपक्षमें सहोपलम्भ, ग्राह्यत्व या प्रकाशमानत्व जो
भी हेतु दिया जायगा, वह सभी हेतु आभास होगा । क्योंकि परामर्श-
हेतु-पक्ष-साध्य और अनुमिति सभी परस्पर अभिन्न हैं तो इनमे हेतु-
हेतुमद्भाव कैसे होगा ? साथ ही नील-पीत आदि परस्पर-विरुद्ध
धर्मोंका एक विज्ञानके साथ अभेद कैसे होगा ? ग्राह्यत्व या प्रकाश-
मानत्व भी भेदमें ही बन सकेगा, अभेद में नहीं ।
यदि कहा जाय कि बाह्यार्थका विज्ञानके साथ न भेद है और न
अभेद है, किन्तु उभयसे रहित चित्ररूप है, तो यह भी नहीं हो सकता
है । क्योंकि परस्पर-विरुद्ध भेद और अभेद जैसे एक जगह नहीं रहता
है, वैसे दोनोंका निषेध भी एक जगह नहीं रह सकता है ।
एवं बाह्यार्थको ज्ञानसजातीय भी नहीं माना जा सकता है, क्योंकि
ज्ञानसजातीय होनेपर उसमें ग्राह्यत्व नहीं रह सकता है । साथ ही
घटपटादि सभीके ज्ञानसजातीय होनेसे घटज्ञानमें पटविषयकत्वका
प्रसङ्ग हो जायगा ।
यदि कहा जाय कि बाह्यार्थ न ज्ञानसे अभिन्न है और न ज्ञान-
सजातीय है, किन्तु सर्वथा अलीक है । क्योंकि उसमें ग्राह्यलक्षणका
सर्वथा अभाव है । जैसे शशशृङ्ग सर्वथा ग्राह्यलक्षणसे रहित होनेके
कारण अलीक होता है, वैसे सभी बाह्यार्थोंको समझना चाहिये । किन्तु
यह कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि किसी वस्तुके लक्षणका ज्ञान
न होनेसे उस वस्तुकी सत्ता नहीं समाप्त हो सकती है । कारण, लक्षण
का अपरिज्ञान वस्तुकी दुरूहताके कारण भी हो सकता है ।
यदि माध्यमिकमतका अवलम्बन कर बाह्यार्थके समान विज्ञान भी
नहीं है, और सर्वशून्यता ही परमतत्त्व है, ऐसा कहा जाय तो यह भी
सभव नहीं है। क्योंकि शून्यतामे यदि कोई प्रमाण है, तो सर्वशून्यता
कहाँ हुई ? यदि शून्यतामे प्रमाण नहीं है तो सर्वसत्ता ही सिद्ध हो
गयी।
एवं, लोकव्यवहारमें बाह्यार्थकी सत्ता व्यवस्थित होनेपर भी विश्वमें
अलीकत्व शून्यत्व या विचारासहत्वका सिद्ध करनेका उपक्रम किया जाय
तो बौद्धकी अपनी प्रतिज्ञा भी अनवस्थित हो जायगी। अर्थात् बौद्धका
विज्ञान, उसका दर्शन और उसका सिद्धान्त भी अव्यवस्थित हो जायगा।
इसलिये यह विश्व तथ्य है।
गुणगुणिभेदभङ्गवाद—
बौद्धमतानुसार गुण और गुणीमे भेद नहीं होता है। ज्ञानगुण
है। अत ज्ञानगुण और गुणी आत्मामे भेद नहीं है। अर्थात् ज्ञान
से भिन्न गुणी आत्मा नहीं है। यही उनका नैरात्म्यपक्ष है।
किंतु यह पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि गुणसे गुणी भिन्न
होता है। कारण, "यमहमद्राक्षं तमहं स्पृशामि अथवा यमस्प्राक्षं त
पश्यामि" इस प्रतीतिमें दर्शन और स्पर्शनके द्वारा एक ही विषयका
ग्रहण होता है। यहाँ गुण दो हैं—दर्शन और स्पर्शन। और ये
दोनों ही परस्परमे भिन्न हैं। जैसे चैत्रके द्वारा गृहीत विषयका
प्रतिसंधान मैत्र नहीं कर पाता और मैत्रद्वारा दृष्ट विषयका प्रति
संधान चैत्रको नहीं होता है वैसे ही नेत्र द्वारा देखो गया वस्तुका
प्रतिसन्धान त्वगिन्द्रिय नहीं कर सकती है और त्वगिन्द्रियद्वारा छुए
गये पदार्थका प्रतिस धान आखका नहीं हो सकता है। त्रिन्तु उक्त
प्रतीतिमे प्रतिसन्धान होता है कि जिसे मैने देखा था, उसे ही छू
रहा हूँ या जिसका स्पर्श किया था उसे ही देख रहा हूँ। यहाँ दो
प्रकारके भिन्न भिन्न ज्ञानोंमें एक ही विषयका प्रतिस धान होता है।
इससे सिद्ध है कि उक्त दोनों ज्ञानोंसे अतिरिक्त गुणी आत्मा है,
जो "दोनों भिन्न भिन्न ज्ञानोंमें एक ही विषय है" ऐसा आकलन कर
लेता है। यदि दर्शन और स्पर्शन गुणोंसे भिन्न एक गुणी आत्मा नहीं
होता तो उक्त प्रकारका एकार्थका प्रतिसन्धान नहीं होता।
यहाँ ज्ञानका विषय क्या है, यह विचारणीय है। क्या दोनोंका
केवल रूप या केवल स्पर्श विषय है ? या दो भिन्न भिन्न विषयोंका
एक समुदाय या समुदायातिरिक्त कोई विषय गृहीत होता है ? अथवा
वस्तुविहीन ज्ञानका ही आकारविशेष उल्लिखित होता है ? या वस्तु-
शून्य अलीक ही भासित होता है ? जैसे रज्जुसर्पभासित होता है।
इनमें प्रथम पक्ष नहीं हो सकता है। क्योंकि जो ही रूप है, वही
स्पर्श नहीं है।
द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है। क्योंकि उक्त समुदाय एकदेश-
प्रयुक्त या एककालप्रयुक्त या एककार्यप्रयुक्त अथवा एककारणप्रयुक्त
होगा ? प्रथम कोटिमें अन्योन्याश्रयदोष हो जायगा। क्योंकि एक
आधारताका प्रतिसन्धान होनेपर समुदायका अनुसन्धान होगा और
समुदायका प्रतिसन्धान होनेपर एकदेशताका प्रतिसन्धान हो सकेगा।
एककालता रूप द्वितीयकोटि तब होती यदि रूप और स्पर्श एक ही
इन्द्रियसे ग्राह्य होता। एककार्यता रूप तृतीय कोटि भी संभव नहीं है।
क्योंकि रूप और स्पर्शका एक कार्य नहीं है। एककारणतारूप चतुर्थ
कोटि भी नहीं हो सकती है, क्योंकि रूप-स्पर्शादिका एक कारण होनेमें
प्रमाण नहीं है।
चतुर्थ आकारपक्षमें या पञ्चम अलीकपक्षमें रूप स्पर्शादिका विलोप-
प्रसङ्ग हो जायगा। इसलिये तृतीयपक्ष हो सकता है। अर्थात् उक्त
प्रतिसन्धानका विषय रूपस्पर्शादिसे अतिरिक्त एक अवयवी है। ऐसी
स्थितिमें उस एक अवयवी वस्तुका ग्रहण करनेवाला अतिरिक्त आत्मा
सिद्ध हो जाता है।
गुण और गुणीका सहोपलम्भ होनेसे दोनोंमें अभेद है, यह नहीं
कह सकते। क्योंकि 'पीतः शङ्खः' इस स्थलमें श्वेत्यगुणका अनुपलब्ध
होनेपर भी शङ्खका उपलब्ध होता है।
अनुपलम्भाद्—
इस प्रकरणमें "आत्मा नहीं है, क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती
है" इस बौद्धपक्षका खण्डन किया गया है। जैसे, सभीको आत्माकी
उपलब्धि नहीं होती है, इसमें सन्देह है। यदि कहो कि एक व्यक्तिको
उपलब्धि नहीं होती है, तो यह व्यभिचारदोषसे ग्रस्त है। क्योंकि
किसी एक व्यक्तिको उपलब्धि न होनेपर उस वस्तुका अभाव नहीं हो
जाता है।
( २८ )
इसके विपरीत अनुमानद्वारा आत्माकी उपलब्धि होती है । यह
अनुमान प्रतिसन्धान है । जैसे, "स एवाय देवदत्त, यमह पाटलि-
पुत्रेऽद्राक्षम्" इत्यादि । यहाँ पूर्वमे पाटलिपुत्रमें देवदत्तको देखनेवाला
और यहाँ काशीमें उसका प्रतिसन्धान करनेवाला एक ही स्थिर
आत्मा है । अर्थात् यहाँ स्मरण और प्रत्यक्षका कर्त्ता एक ही स्थिर
आत्मा है ।
उक्त प्रतिसन्धानका कर्ता देह है यह नहीं कह सकते, क्योंकि
देहके प्रतिदिन परिवर्तित होनेसे वह दूसरेके द्वारा दृष्टका प्रतिसन्धान
नहीं कर सकता है । "नान्यदृष्ट स्मरत्यन्य यह नियम है ।
न्यायाभिमत आत्माके सम्बन्धमे तर्क भी हैं। जैसे, आत्मा यदि
सादि हो तो इष्टसाधनताज्ञानके अभावमें प्रथम प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
ऐसी स्थितिमें सर्वथा अप्रवृत्तिका प्रसङ्ग हो जायगा । अतः आत्मा
अनादि है । आत्मा यदि सान्त हो तो अनादि सान्त होनेसे वह अभाव
( प्रागभाव ) बन जायगा । अत आत्मा अनन्त भी है । यदि वह
द्रव्य न हो तो निर्गुण हो जायगा । अत आत्मा द्रव्य भी है । यदि
वह व्यापक न हो तो अग्नि पवनादिमे क्रिया नहीं हो सकेगी । अत
आत्मा व्यापक है । यदि वह मूर्त हो तो मूर्त नित्य परमाणुकी तरह
अस्मदादिको प्रत्यक्ष होनेवाले सुख दु खादिका वह आधार नहीं हो
सकेगा । अतः आत्मा अमूर्त है। यदि वह सक्रिय हो तो मूर्त
होने लगेगा । अतः आत्मा निष्क्रिय है।
यहाँ यह शङ्का करना कि—आत्मा यदि कथञ्चित् सिद्ध भी हो तो
वह हेय ही है । क्योंकि आत्मदर्शी व्यक्ति उसके उपकारीके प्रति राग
करेगा और उसके अपकारीके प्रति द्वेष करेगा। राग द्वेष ससारका
मूल है । अत मुमुक्षुजन को भी नैरात्म्यकी ही भावना करनी चाहिये—
ठीक नहीं है। क्योंकि अनात्मदर्शीका मुमुक्षु होना ही अनुपपन्न है।
कारण, आत्माको विना स्वीकार किये कोई न तो दुख को छोडना
चाहेगा और न सुखको प्राप्त करना चाहेगा । साथ ही यह नैरात्म्य
दृष्टि नास्तिक्यको बढावा देगी । एव प्रबल विषयतृष्णाको जगाता
हुई अनन्त अनर्थको पैदा करेगी। इसीलिये तो "यावज्जीवेत् सुख
जीवेत्" ,त्यादि निश्शङ्क प्रलाप होते हैं। यह जो कहा कि आत्म-
दर्शी व्यक्ति उपकारीमें राग और अपकारीमे द्वेष करेगा—तो यह
ठीक ही हैं। क्योंकि जो मोक्षको उपकार मानता है, वह उसके
हेतुके प्रति रागवान् हो और उसके बाधकके प्रति द्वेषवान् हो तो यह
समुचित ही है।
ऐसे (शरीरादिसे भिन्न) आत्मामें न्याय (अनुमान) और आम्नाय
दोनों ही प्रमाण हैं। न्याय प्रतिपादित ही हो चुका है। आम्नाय-
प्रमाणका सार तो "अशरीरं वाव सन्तम्" इत्यादि है, जो शरीरसे भिन्न
आत्माको प्रतिपादित करता है। आप्तोक्त होनेसे उक्त आम्नाय प्रमाण
है। क्योंकि विश्वका कर्ता सर्वज्ञ ईश्वर अनुमानसे सिद्ध है और उसीके
द्वारा आम्नाय उक्त है। अतः उसमे अप्रामाण्य नहीं है। उपर्युक्त
प्रमाणोंसे अवधारित ऐसे आत्माकी आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्ति ही मोक्ष
है। यह न्यायशास्त्रका सारभूत अर्थ है।
कृतज्ञताज्ञापन—
सर्वप्रथम मैं अपने शिवसायुज्यप्राप्त प्रात स्मरणीय गुरुओ सर्वतन्त्र-
स्वतन्त्र पण्डितप्रवर श्रीसूर्यनारायणशुक्ल एव विद्यानिधि महामहो-
पाध्याय पण्डितपञ्चानन श्रीहरिहरकृपालुद्विवेदीका ऋणी हूँ, जिन्होंने
क्रमशः मुझे न्यायवैशेषिक एव वेदान्तका निरतिशयस्नेहपूर्वक अध्यापन
कर मेरी आखें खोल दीं। उनके लिये इतना ही कहना पर्याप्त होगा
"चक्षुरुन्मीलितं याभ्याम्"। वस्तुत जो कुछ मैं ज्ञान प्राप्त कर सका हूँ,
उनकी अपारकृपा एवं स्नेहका सुफल है।
उत्तरप्रदेश सस्कृत अकादमीके वर्तमान अध्यक्ष एव सम्पूर्णानन्द
संस्कृतविश्वविद्यालयके भू० पू० कुलपति पण्डित श्रीकरुणापतिजी त्रिपाठी
का उपकार भूल नहीं सकता, जिन्होंने अपने कुलपतित्वकालमे ही इस
ग्रन्थके सानुवाद प्रकाशनको आवश्यक समझा था और इसके लिये
उ० प्र० सस्कृत अकादमीके माध्यमसे पाँच हजार रुपयोंका सरकारी
साहाय्य-अनुदान स्वीकृत कर इसके प्रकाशनार्थ हमे प्रोत्साहित किया
और इसका प्रकाशन सम्भव हो सका।
मैं उन मनीषियोंका अत्यन्त ही अनुगृहीत हूँ, जिन्होंने मौखिक या
लेखनबद्ध अपनी अमूल्य सम्मतियाँ देकर मुझे प्रोत्साहित एव मेरी इस
कृतिको गौरवान्वित किया है। इनमे अनन्तश्रीविभूषित स्वामीकरपात्री-
जी महाराज, सम्पूर्णानन्द सस्कृत विश्वविद्यालयके वर्तमान कुलपति