आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 28, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें( १७ )
चार्यने राजासे कहा—ठीक कहते हो, किन्तु मेरी बात सुनो । मनुष्य
की जय या पराजय तो हरिकी इच्छाके अधीन है । यथाशक्ति हम
विवाद करेंगे, आप चिन्ता छोड़कर हमारे पराक्रमको देखो। दूसरे
दिन राजदरबारमे उपस्थित होकर राजाने सभी विद्वानोंको और उस
बौद्धाचार्यको भी बुलाकर कहा कि आप दोनों (उदयनाचार्य एव बौद्धा
चार्य) का मेरे समक्ष बिचार हो । राजाके निर्देशानुसार बहुत दिनो
तक उन दोनोंका भारी विवाद चलता रहा । तब बौद्ध विद्वान्ने
उदयनाचार्यसे अपनी पराजयको समझते हुए आश्चर्य करानेवाली
अपनी माया फैलायी और राजासे बोला—
शालग्रामकी शिलामे इनके मतमे भगवान् वस्तुत स्थित हैं।
उसे मगावैं, मैं अपने मतसे उसे खण्डित कर देता हूँ। यदि वह शिला
जलवत् होकर अदृश्य हो जाती है, तो मेरा कथन सत्य होगा। यदि
उदयनाचार्य उसे जलवत् करके पुन शिला को व्यक्तकर देंगे तो इनका
भी मत मैं सत्य मान लूँगा। इसमे सशय नहीं है।
राजाने उदयनाचार्यकी तरफ देखा और बोले कि यह बौद्धाचार्य
क्या कह रहे हैं । इसपर उदयनाचार्य अत्यन्त हर्षित हुए और बोले कि
यद्यपि यह इनकी माया है, तथापि मै इसे स्वीकार करता हूँ। मैं माया
भी जानता हूँ, किन्तु एक बात मैं भी कहता हूँ कि शिलाके वैसा हो जाने
पर सभासद् लोग भ्रमसे यही कहेंगे कि दोनोंका मत सत्य है। इसलिये
कौन सत्य है और कौन मिथ्या है, इसके निर्णयके लिये मैं एक शर्त
कहता हूँ। यदि उसे यह स्वीकार करेंगे तो मै भी अपनी प्रतिज्ञाको
पूरी करूँगा। तब राजाने बौद्धाचार्यकी ओर देखा । बौद्धाचार्यने
कहा कि मैं इनकी शर्त मानूँगा ।
दोनोंकी बात सुनकर एक सुदृढ़ शालग्रामकी शिलाको मँगवाया
और उसे एक पवित्र सोनेकी थालीमे रखवाया। तब उक्त बौद्धने अपने
मतको प्रतिपादित किया। तदनन्तर क्षणभरमे वह शिला जल बन
गयी और अग्रिम क्षणमे ही वह तिरोहित हो गयी । सबके समक्ष यह
अद्भुत कार्य हुआ । उसके बाद उदयनाचार्यने बौद्धमतका खण्डन
करते हुए अपना मत कहा । तत्काल वह जल प्रकट होकर अग्रिम क्षण
में ही वह जल पुनः शिला बन गया ।