सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

( २५ )
बाह्यपदार्थ असत् हैं । उसीके अन्तर्गत नैयायिकोंका नित्य आत्मा भी
है और वह असत् है ।
यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या ग्राह्यतत्त्व बाह्यार्थ एवं ग्राहकतत्त्व
आन्तरविज्ञान ये दोनों ही परमार्थतः सत् हैं और इनका अभेद
विवक्षित है ? अथवा ये दोनोंमें भेद होनेपर भी दोनों एक जातिके हैं ?
अर्थात् बाह्यार्थ भी ज्ञानजातिका ही है ? अथवा ज्ञान परमार्थसत् है
और बाह्यार्थ अलीक है अर्थात् असत् है ?
इनमें प्रथम अभेदपक्षमें सहोपलम्भ, ग्राह्यत्व या प्रकाशमानत्व जो
भी हेतु दिया जायगा, वह सभी हेतु आभास होगा । क्योंकि परामर्श-
हेतु-पक्ष-साध्य और अनुमिति सभी परस्पर अभिन्न हैं तो इनमे हेतु-
हेतुमद्भाव कैसे होगा ? साथ ही नील-पीत आदि परस्पर-विरुद्ध
धर्मोंका एक विज्ञानके साथ अभेद कैसे होगा ? ग्राह्यत्व या प्रकाश-
मानत्व भी भेदमें ही बन सकेगा, अभेद में नहीं ।
यदि कहा जाय कि बाह्यार्थका विज्ञानके साथ न भेद है और न
अभेद है, किन्तु उभयसे रहित चित्ररूप है, तो यह भी नहीं हो सकता
है । क्योंकि परस्पर-विरुद्ध भेद और अभेद जैसे एक जगह नहीं रहता
है, वैसे दोनोंका निषेध भी एक जगह नहीं रह सकता है ।
एवं बाह्यार्थको ज्ञानसजातीय भी नहीं माना जा सकता है, क्योंकि
ज्ञानसजातीय होनेपर उसमें ग्राह्यत्व नहीं रह सकता है । साथ ही
घटपटादि सभीके ज्ञानसजातीय होनेसे घटज्ञानमें पटविषयकत्वका
प्रसङ्ग हो जायगा ।
यदि कहा जाय कि बाह्यार्थ न ज्ञानसे अभिन्न है और न ज्ञान-
सजातीय है, किन्तु सर्वथा अलीक है । क्योंकि उसमें ग्राह्यलक्षणका
सर्वथा अभाव है । जैसे शशशृङ्ग सर्वथा ग्राह्यलक्षणसे रहित होनेके
कारण अलीक होता है, वैसे सभी बाह्यार्थोंको समझना चाहिये । किन्तु
यह कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि किसी वस्तुके लक्षणका ज्ञान
न होनेसे उस वस्तुकी सत्ता नहीं समाप्त हो सकती है । कारण, लक्षण
का अपरिज्ञान वस्तुकी दुरूहताके कारण भी हो सकता है ।
यदि माध्यमिकमतका अवलम्बन कर बाह्यार्थके समान विज्ञान भी
नहीं है, और सर्वशून्यता ही परमतत्त्व है, ऐसा कहा जाय तो यह भी