आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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दीधिति टीकायें ग्रन्थके अन्ततक हैं, किन्तु बीच-बीचमें कही नहीं भी
हैं। किन्तु शङ्करमिश्रकी कल्पलता टीका साद्यन्त अविकल है।
अनुवाद करते समय मैंने उक्त सभी टीकाओंका सहारा लिया है।
किन्तु जहाँपर व्याख्याओमे भेद प्रतीत हुआ है, वहाँ मूलके अत्यन्त
निकट और अक्लिष्ट व्याख्याका ही अनुगमन किया है। ग्रन्थके
अस्फुट विषयको स्फुट करनेकी मेरी यथाशक्ति चेष्टा रही है। उसमें
भी मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसे विद्वज्जन ही बता सकते हैं। मेरा
प्रयास विषयके विवेकके साथ पंक्त्यर्थ का विवेक करनेका भी रहा है।
ताकि ऐसा न हो कि विषयका ज्ञान हो जानेपर भी किसी पंक्तिका
अर्थ अज्ञात रह जाय या एक भी पद का अर्थ छूट जाय। इसी मानीमें
यह अनुवाद विवेचनात्मक है तथा मूल और अनुवादमें बिम्बप्रतिबिम्ब-
भाव जैसा है।
इस संस्करणमें दी गयी टिप्पणियां, जैसे "१ पु० पा०, २ पु० पा०,
३ पु० पा०" एशियाटिकसोसाइटी कलकत्ताद्वारा प्रकाशित आत्मतत्त्व-
विवेकके अनुसार ही मैंने भी दी हैं। कलकत्तावाला संस्करण महा-
महोपाध्याय लक्ष्मणशास्त्री द्राविड़ एव विन्ध्येश्वरीप्रसादद्विवेदीद्वारा
सम्पादित होनेसे प्रामाणिक है।
यहाँ टिप्पणीमें अङ्कित १ पु० से जयनारायणतर्कपञ्चानन एवं
मदनमोहन शर्मन्द्वारा सम्पादित ( कलकत्ता १८४७ ) आत्मतत्त्व-
विवेक लिया गया है। तथा २ पु० जीवानन्द विद्यासागर, कलकत्ता
सम्पादित ( १८७३ ) आत्मतत्त्वविवेक लिया गया है। तथा टिप्पणीमें
अङ्कित ३ पु० पा० से यदुनाथसार्वभौमकी पुस्तकका पाठ लिया गया
है। यह बात रायल एशियाटिक-सोसाइटी, बङ्गालके तत्कालीन जेनरल
सेक्रेटरी जोह्न-वान-मेननद्वारा लिखित भूमिकासे विदित है। इन
तीन संकेतोंके अतिरिक्त सभी टिप्पणियाँ स्वयं मेरी दी हुई हैं।
प्रस्तुत पुस्तकके शुद्ध सम्पादनका भी प्रयास मैंने किया है। मूल-
ग्रन्थके अनुच्छेदोंका निर्धारण प्रायः मैंने अपने ढङ्गसे किया है, ताकि
पाठकोंको विषयबोधमें सुविधा हो। अत्यन्त सावधानीसे इस संस्करण
को शुद्ध बनानेका प्रयास करनेपर भी मानवसुलभ मेरी अनवधानतासे
या मुद्रणके दोषसे यदि त्रुटियाँ रह गई हों तो सहृदय विद्वज्जन कृपया
स्वयं शुद्ध कर लेंगे, यह मेरी विनम्र प्रार्थना है।