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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 530 में से

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पृष्ठ 26

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एव, किन्तु उक्त कथन ठीक नहीं है। क्योंकि रामानुजाचार्यसे भी
बहुत पहले टङ्क-द्रमिण-गुहदेव-भारुचि आदि विशिष्टाद्वैतवादी आचार्य
थे। जिनके सम्बन्धमे 'एकदण्डी त्रिदण्डी वा' ऐसा मनुने स्मरण किया
है। इसलिए त्रिदण्डिवेदान्तमत भी अत्यन्त प्राचीन था और उसीका
उल्लेख उदयनाचार्यने किया है।
सुरेश्वराचार्यने बृहदारण्यकवार्त्तिकके ब्राह्मण ५ अध्याय ६ मे
“सत्रिदण्डवत्” ऐसा उल्लेख किया है। इससे निश्चित होता है
कि शङ्कराचार्यके परवर्ती वाचस्पतिमिश्रके और उनके भी परवर्ती
उदयनाचार्यकेद्वारा त्रिदण्डिमतका उपन्यास होनेमे कोई अनुपपत्ति
नहीं है।
यदि विशिष्टाद्वैत सम्प्रदायको पूर्वापेक्षया अधिकाधिक लोकविश्रुत
करनेवाले अद्वितीय आचार्य श्रीरामानुजाचार्यको ही आधार मानकर
उदयनाचार्यने आत्मतत्त्वविवेकमे “त्रिदण्डिमतोपसहारः” लिखा है,
ऐसा त्रिदण्डिवेदान्तियोंका आग्रह हो तो भी उदयनाचार्यकी ९०६
शकवर्षमें स्थितिका सामञ्जस्य किया जा सकता है। जैसे—१०१२
शकवर्षपर्यन्त १२० वर्षकी परमायुको प्राप्त रामानुजाचार्यका जन्मकाल
( १०१२-१२० = ) ८९२ शकवर्ष सिद्ध होता है। लक्षणावलीके
अनुसार सर्वमान्य ९०६ शकाब्दके बाद भी उदयनाचार्यकी स्थिति हो
सकती है। ऐसी स्थितिमे ९०६ शकाब्दमे और उसके बादमें भी
वर्तमान उदयनाचार्य “त्रिदण्डिमतोपसहारः” ऐसा उल्लेख कर सकते
हैं। अतः उदयनाचार्यकी ९०६ शकवर्षमे स्थिति होनी सर्वथा
प्रामाणिक है।
किसीके अनुसार उदयनाचार्य १०२९ शकवर्षमें अवस्थित लक्ष्मण-
सेनकी सभामें थे। क्योंकि गोवर्धनाचार्यने शृङ्गारसप्तशतीके अन्तमे
लिखा है—
उदयनबलभद्राभ्या सप्तशती शिष्यसोदराभ्या मे ।
द्यौरिव रविचन्द्राभ्यां प्रकाशिता निर्मलीकृत्य ॥
यहाँपर आनन्दपण्डितने इसकी व्याख्यामे उदयनका अर्थ उदयनाचार्य
किया है। तथा गोवर्धनाचार्य राजा लक्ष्मणसेनके पञ्चरत्नोंमें थे।
जैसा कि "पञ्चरत्न" ग्रन्थमे कहा है—