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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 530 में से

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पृष्ठ 39

( २८ )

इसके विपरीत अनुमानद्वारा आत्माकी उपलब्धि होती है । यह
अनुमान प्रतिसन्धान है । जैसे, "स एवाय देवदत्त, यमह पाटलि-
पुत्रेऽद्राक्षम्" इत्यादि । यहाँ पूर्वमे पाटलिपुत्रमें देवदत्तको देखनेवाला
और यहाँ काशीमें उसका प्रतिसन्धान करनेवाला एक ही स्थिर
आत्मा है । अर्थात् यहाँ स्मरण और प्रत्यक्षका कर्त्ता एक ही स्थिर
आत्मा है ।
उक्त प्रतिसन्धानका कर्ता देह है यह नहीं कह सकते, क्योंकि
देहके प्रतिदिन परिवर्तित होनेसे वह दूसरेके द्वारा दृष्टका प्रतिसन्धान
नहीं कर सकता है । "नान्यदृष्ट स्मरत्यन्य यह नियम है ।
न्यायाभिमत आत्माके सम्बन्धमे तर्क भी हैं। जैसे, आत्मा यदि
सादि हो तो इष्टसाधनताज्ञानके अभावमें प्रथम प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
ऐसी स्थितिमें सर्वथा अप्रवृत्तिका प्रसङ्ग हो जायगा । अतः आत्मा
अनादि है । आत्मा यदि सान्त हो तो अनादि सान्त होनेसे वह अभाव
( प्रागभाव ) बन जायगा । अत आत्मा अनन्त भी है । यदि वह
द्रव्य न हो तो निर्गुण हो जायगा । अत आत्मा द्रव्य भी है । यदि
वह व्यापक न हो तो अग्नि पवनादिमे क्रिया नहीं हो सकेगी । अत
आत्मा व्यापक है । यदि वह मूर्त हो तो मूर्त नित्य परमाणुकी तरह
अस्मदादिको प्रत्यक्ष होनेवाले सुख दु खादिका वह आधार नहीं हो
सकेगा । अतः आत्मा अमूर्त है। यदि वह सक्रिय हो तो मूर्त
होने लगेगा । अतः आत्मा निष्क्रिय है।
यहाँ यह शङ्का करना कि—आत्मा यदि कथञ्चित् सिद्ध भी हो तो
वह हेय ही है । क्योंकि आत्मदर्शी व्यक्ति उसके उपकारीके प्रति राग
करेगा और उसके अपकारीके प्रति द्वेष करेगा। राग द्वेष ससारका
मूल है । अत मुमुक्षुजन को भी नैरात्म्यकी ही भावना करनी चाहिये—
ठीक नहीं है। क्योंकि अनात्मदर्शीका मुमुक्षु होना ही अनुपपन्न है।
कारण, आत्माको विना स्वीकार किये कोई न तो दुख को छोडना
चाहेगा और न सुखको प्राप्त करना चाहेगा । साथ ही यह नैरात्म्य
दृष्टि नास्तिक्यको बढावा देगी । एव प्रबल विषयतृष्णाको जगाता
हुई अनन्त अनर्थको पैदा करेगी। इसीलिये तो "यावज्जीवेत् सुख
जीवेत्" ,त्यादि निश्शङ्क प्रलाप होते हैं। यह जो कहा कि आत्म-
दर्शी व्यक्ति उपकारीमें राग और अपकारीमे द्वेष करेगा—तो यह