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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 530 में से

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पृष्ठ 30

पुनः एकबार उदयनाचार्य भगवान् जगन्नाथका दर्शन करनेकी
इच्छासे पुरी गये । वहाँपर मार्कण्डेय हृद आदि तीर्थजलसे स्नानकर
मन्दिरके द्वारपर आ गये । भगवान्के दर्शनहेतु जब मन्दिरके भीतर
प्रवेश करना चाहे तो अपने आप कपाट बन्द हो गया । यह देखकर
उदयनाचार्य दूसरे द्वारपर गये, वहाँ भी वैसा ही हुआ । तीसरे द्वारपर
जानेपर भी वैसा ही हुआ । तब आचार्य चतुर्थ द्वारपर जाकर मन्दिर मे
जानेको तत्पर हुए । किन्तु उस कपाटको भी बन्द देखे ।
इस कौतुकको देखकर वे सभी जन खड़े रहे । किन्तु उदयनाचार्य
जी मुस्कुराते हुए बोले—
जगन्नाथ ! सुरश्रेष्ठ !
ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मामवज्ञाय वर्तसे ।
उपस्थितेषु बौद्धेषु मदधीना तव स्थिति ॥ ६८-६९ ॥
( भवि० पु० परिशिष्ट अ० ३० )
इतना कहते ही तुरन्त सभी बन्द कपाट खुल गये । जगन्नाथके सभी
पुजारी चकित हो गये तथा आदरपूर्वक उदयनाचार्यको ले जाकर
मन्दिरमें भगवान् जगन्नाथका दर्शन कराये । उदयनाचार्यने भगवानका
दर्शन, पूजन और स्तुति करते हुए वहाँ कई रात निवास किया । तथा
भगवान्ने स्वप्नमे पूजारियोंसे कहा कि मेरा उत्कृष्ट पीताम्बर उदयनाचार्य
को दो, वह मेरा अत्यन्त प्रिय है और मेरा ही अश है, इसमे सन्देह
नहीं है । बौद्धसिद्धान्तवादियोंद्वारा तिरस्कृत होनेपर इसने ही मुझे
कायम रखा है । तब प्रात उठ कर पुजारीजन जगन्नाथकी आज्ञासे
उनका पीताम्बर लाकर आचार्यको दे दिये । आचार्यने उस प्रसादको
शिरोधार्य कर लिया । और प्रसाद प्राप्त कर मिथिलामे आ गये ।
और वहाँ सर्वशास्त्रोंको पढाने लगे । बहुत समयके बाद वृद्ध हो
काशी आकर कुछ दिन रहकर उन्होंने मणिकर्णिकामे मङ्गानालमें लीला-
पूर्वक प्राणत्याग कर दिया । इस प्रकार उदयनाचार्य धर्मकी स्थापना
तथा नास्तिक्यकी निवृत्तिके लिये पृथिवीपर अवतरित हुए थे ।
( भवि० पु० परिशिष्ट अध्याय ३० )
प्रस्तुत पुस्तक आत्मतत्त्वविवेकका अनुवाद करने एव इसके प्रका-
शनकी प्रवृत्ति मेरे अन्दर तभी हुई थी, जब मैं मारवाड़के सिरोही