सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

( २० )
स्टेटमे एक जैनमुनिको न्याय पढ़ानेके लिए उनके आग्रहपर कुछ
समयके लिये वहाँ गया था। वहाँ अनेक न्यायग्रन्थोंके अध्यापनके
साथ साथ आत्मतत्त्वविवेकके भी अध्यापनका सुअवसर प्राप्त हुआ।
अनुवादकार्यकी पूर्णता मैंने गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज, भागलपुर (बिहार)
में अपने कार्यकालमें कर ली थी। किन्तु प्रकाशनकी चेष्टा काशी-हिन्दू
विश्वविद्यालयमें आनेके बाद ही की।
अनुवादकी पाण्डुलिपि मैंने वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालयमे
अनुसन्धान विभागके तत्कालीन डाइरेक्टर श्रीक्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय
को दिखलाई। इस कार्यसे बहुत प्रसन्न हो उन्होंने सुझाव दिया कि
आत्मतत्त्वविवेकमें आये पूर्वपक्षोंके मूलवचनोंका ससन्दर्भ उल्लेख
टिप्पणीमें या स्वतन्त्ररूपमें कर देना महत्त्वपूर्ण होगा। उनके निर्देश-
नुसार मैंने उसे भी यथाप्राप्त बौद्धग्रन्थोंका आलोडन कर परिशिष्टके रूप-
मे सन्निविष्ट कर दिया। बादमें इस पाण्डुलिपिको मैंने सम्पूर्णानन्द
संस्कृत विश्वविद्यालयके प्रकाशनविभागको प्रकाशनकी स्वीकृतिहेतु दे
दिया। पाण्डुलिपि लगभग दो वर्ष रखी रह गई और प्रकाशनके लिए
पहलेसे स्वीकृत पुस्तकोंकी लम्बी परम्परामें इसके शीघ्र प्रकाशनकी आशा
न देखकर मैंने अपनी पाण्डुलिपि वहाँसे वापस ले ली। अन्तत उत्तर-
प्रदेश संस्कृत अकादमी, लखनऊकी आर्थिक सहायता पाकर मैंने स्वयं
प्रकाशनका निर्णय कर लिया। प्रकाशनके पूर्व विद्वानोंके प्राप्त सुझावके
अनुसार इसकी भाषाको भी यथासम्भव परिमार्जित किया। फलतः
बहुत कालके अन्तरालमे भी इसका प्रकाशनकार्य सम्पन्न हो सका यह
भगवान् विश्वनाथकी कृपा ही थी।
विषयकी दृष्टिसे गम्भीर एव भाषाकी दृष्टिसे दुरूह इस महत्त्वपूर्ण
ग्रन्थका अनुवादकार्य मैंने अध्यापनके साथ साथ लगभग दो वर्षों में पूर्ण
किया था। उस समय मेरे पास महामहोपाध्याय लक्ष्मणशास्त्री द्राविड़
द्वारा सम्पादित एशियाटिक सोसाइटी, बङ्गालसे प्रकाशित हुई शङ्कर-
मिश्र, रघुनाथशिरोमणि एव भगीरथठक्कुरकी टीकाओंसहित आत्मतत्त्व
विवेक पुस्तक प्राप्त थी। उसमे शङ्करमिश्रकी कल्पलता, भगीरथठक्कुरकी
प्रकाशिका एव रघुनाथशिरोमणिकी दीधिति टीकायें सन्निविष्ट थी।
मथुरानाथ तर्कवागीशकी भी 'रहस्य' नामक टीका प्रारम्भकी कुछ
पंक्तियों तक ही होकर रह गयी मिली, यह आश्चर्य है। प्रकाशिका एव