आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक समुदाय या समुदायातिरिक्त कोई विषय गृहीत होता है ? अथवा
वस्तुविहीन ज्ञानका ही आकारविशेष उल्लिखित होता है ? या वस्तु-
शून्य अलीक ही भासित होता है ? जैसे रज्जुसर्पभासित होता है।
इनमें प्रथम पक्ष नहीं हो सकता है। क्योंकि जो ही रूप है, वही
स्पर्श नहीं है।
द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है। क्योंकि उक्त समुदाय एकदेश-
प्रयुक्त या एककालप्रयुक्त या एककार्यप्रयुक्त अथवा एककारणप्रयुक्त
होगा ? प्रथम कोटिमें अन्योन्याश्रयदोष हो जायगा। क्योंकि एक
आधारताका प्रतिसन्धान होनेपर समुदायका अनुसन्धान होगा और
समुदायका प्रतिसन्धान होनेपर एकदेशताका प्रतिसन्धान हो सकेगा।
एककालता रूप द्वितीयकोटि तब होती यदि रूप और स्पर्श एक ही
इन्द्रियसे ग्राह्य होता। एककार्यता रूप तृतीय कोटि भी संभव नहीं है।
क्योंकि रूप और स्पर्शका एक कार्य नहीं है। एककारणतारूप चतुर्थ
कोटि भी नहीं हो सकती है, क्योंकि रूप-स्पर्शादिका एक कारण होनेमें
प्रमाण नहीं है।
चतुर्थ आकारपक्षमें या पञ्चम अलीकपक्षमें रूप स्पर्शादिका विलोप-
प्रसङ्ग हो जायगा। इसलिये तृतीयपक्ष हो सकता है। अर्थात् उक्त
प्रतिसन्धानका विषय रूपस्पर्शादिसे अतिरिक्त एक अवयवी है। ऐसी
स्थितिमें उस एक अवयवी वस्तुका ग्रहण करनेवाला अतिरिक्त आत्मा
सिद्ध हो जाता है।
गुण और गुणीका सहोपलम्भ होनेसे दोनोंमें अभेद है, यह नहीं
कह सकते। क्योंकि 'पीतः शङ्खः' इस स्थलमें श्वेत्यगुणका अनुपलब्ध
होनेपर भी शङ्खका उपलब्ध होता है।
अनुपलम्भाद्—
इस प्रकरणमें "आत्मा नहीं है, क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती
है" इस बौद्धपक्षका खण्डन किया गया है। जैसे, सभीको आत्माकी
उपलब्धि नहीं होती है, इसमें सन्देह है। यदि कहो कि एक व्यक्तिको
उपलब्धि नहीं होती है, तो यह व्यभिचारदोषसे ग्रस्त है। क्योंकि
किसी एक व्यक्तिको उपलब्धि न होनेपर उस वस्तुका अभाव नहीं हो
जाता है।