आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंठीक ही हैं। क्योंकि जो मोक्षको उपकार मानता है, वह उसके
हेतुके प्रति रागवान् हो और उसके बाधकके प्रति द्वेषवान् हो तो यह
समुचित ही है।
ऐसे (शरीरादिसे भिन्न) आत्मामें न्याय (अनुमान) और आम्नाय
दोनों ही प्रमाण हैं। न्याय प्रतिपादित ही हो चुका है। आम्नाय-
प्रमाणका सार तो "अशरीरं वाव सन्तम्" इत्यादि है, जो शरीरसे भिन्न
आत्माको प्रतिपादित करता है। आप्तोक्त होनेसे उक्त आम्नाय प्रमाण
है। क्योंकि विश्वका कर्ता सर्वज्ञ ईश्वर अनुमानसे सिद्ध है और उसीके
द्वारा आम्नाय उक्त है। अतः उसमे अप्रामाण्य नहीं है। उपर्युक्त
प्रमाणोंसे अवधारित ऐसे आत्माकी आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्ति ही मोक्ष
है। यह न्यायशास्त्रका सारभूत अर्थ है।
कृतज्ञताज्ञापन—
सर्वप्रथम मैं अपने शिवसायुज्यप्राप्त प्रात स्मरणीय गुरुओ सर्वतन्त्र-
स्वतन्त्र पण्डितप्रवर श्रीसूर्यनारायणशुक्ल एव विद्यानिधि महामहो-
पाध्याय पण्डितपञ्चानन श्रीहरिहरकृपालुद्विवेदीका ऋणी हूँ, जिन्होंने
क्रमशः मुझे न्यायवैशेषिक एव वेदान्तका निरतिशयस्नेहपूर्वक अध्यापन
कर मेरी आखें खोल दीं। उनके लिये इतना ही कहना पर्याप्त होगा
"चक्षुरुन्मीलितं याभ्याम्"। वस्तुत जो कुछ मैं ज्ञान प्राप्त कर सका हूँ,
उनकी अपारकृपा एवं स्नेहका सुफल है।
उत्तरप्रदेश सस्कृत अकादमीके वर्तमान अध्यक्ष एव सम्पूर्णानन्द
संस्कृतविश्वविद्यालयके भू० पू० कुलपति पण्डित श्रीकरुणापतिजी त्रिपाठी
का उपकार भूल नहीं सकता, जिन्होंने अपने कुलपतित्वकालमे ही इस
ग्रन्थके सानुवाद प्रकाशनको आवश्यक समझा था और इसके लिये
उ० प्र० सस्कृत अकादमीके माध्यमसे पाँच हजार रुपयोंका सरकारी
साहाय्य-अनुदान स्वीकृत कर इसके प्रकाशनार्थ हमे प्रोत्साहित किया
और इसका प्रकाशन सम्भव हो सका।
मैं उन मनीषियोंका अत्यन्त ही अनुगृहीत हूँ, जिन्होंने मौखिक या
लेखनबद्ध अपनी अमूल्य सम्मतियाँ देकर मुझे प्रोत्साहित एव मेरी इस
कृतिको गौरवान्वित किया है। इनमे अनन्तश्रीविभूषित स्वामीकरपात्री-
जी महाराज, सम्पूर्णानन्द सस्कृत विश्वविद्यालयके वर्तमान कुलपति