आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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है कि नैषधकाव्यके प्रणेता श्रीहर्ष ९७२ शकवर्षसे पूर्वमें थे । और
इन्होंने खण्डनखण्डखाद्यमें उदयनाचार्यकी "शङ्का चेदनुमास्त्येव'
इस कारिकाके उद्धरणके साथ न्यायमतका खण्डन किया है । इससे
भी पुष्ट है कि उदयनाचार्यका ९०६ शकवर्ष काल माननेमें कोई भी
अनुपपत्ति नहीं है ।
उदयनाचार्यने न्यायवार्तिकतात्पर्यपरिशुद्धिमें लिखा है "प्रपञ्चि-
तोऽयं न्यायकुसुमाञ्जलाविति' ( न्या० वा० अ० २ आ० २ ) । एव,
वहीं अ० ३ आ० १ में "विद्यासन्ध्योदयोद्रेकात्" इत्यादि श्लोक लिखा
है, जो किरणावलीके प्रारम्भमें भी है । एव "अपसिद्धान्तस्तु यथा
विरोधाद्भिद्यते तथा तत्रैव वक्ष्यते, शेष परिशिष्टे" यह लिखकर 'न्याय-
परिशिष्ट" ग्रन्थका उल्लेख किया है । किरणावलीमें "विस्तरस्तु न्याय-
कुसुमाञ्जलावात्मतत्त्वविवेके चानुसन्धेय" ऐसा लिखा है । तात्पर्य-
परिशुद्धि और किरणावलीमे लिखा 'विद्यासन्ध्योदयोद्रेकात्" इत्यादि
श्लोक लक्षणावलीमे भी है ।
उपर्युक्त लेखोंसे यह निर्विवाद सिद्ध है कि न्यायकुसुमाञ्जलि
आत्मतत्त्वविवेक किरणावली न्यायवार्तिकतात्पर्यपरिशुद्धि—न्यायपरिशिष्ट
और लक्षणावली ये छहों ग्रन्थ उदयनाचार्यके ही लिखे हैं । न्याय
परिशिष्टनामक न्यायसूत्रवृत्तिका ही अन्य नाम प्रबोधसिद्धि बोधशुद्धि
है, यह बात श्रीवरदराजाचार्यने तार्किकरक्षामें निरूपित की है ।
उपर्युक्त ग्रन्थोंमें सबसे पहिले आत्मतत्त्वविवेक लिखा ऐसा प्रतीत
होता है । क्योंकि उसके ईश्वरसिद्धिप्रसङ्गमे न्यायकुसुमाञ्जलिके
प्रसङ्गोंका कुछ भी संकेत नहीं है । उसके बाद क्रमशः न्यायकुसुमाञ्जलि,
परिशिष्ट, तात्पर्यपरिशुद्धि, किरणावली, अनन्तर लक्षणावली लिखी गयी,
ऐसा प्रतीत होता है ।
त्रिदण्डिवेदान्तियोंका कहना है कि उदयनाचार्यने आत्मतत्त्वविवेकके
अन्तमें "अत एव त्रिदण्डिवेदान्तमतोपसंहार " ऐसा लिखा है । तथा
रामानुजाचार्यके बाद ही त्रिदण्डिवेदान्तियोंका मत प्रचलित होनेसे
रामानुजाचार्यके बाद ही उदयनाचार्यकी स्थिति सिद्ध होती है ।
'प्रपन्नामृत' ग्रन्थके आधारपर रामानुजाचार्यका स्थितिकाल १०१२ शकवर्ष
था । अतः लक्षणावलीग्रन्थमे प्रतिपादित ९०६ शाकाब्दमे उदयनाचार्य
की स्थिति सम्भव नहीं है ।