आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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७८ = ९७६ ई० वर्ष न्यायसूचीनिबन्धका रचनाकाल होता है । अर्थात्
ईसाकी दशम शताब्दीके अन्तमें वाचस्पतिमिश्र थे । एवं ११०० शक-
वर्षमें वर्तमान हम्मीरराजाके सभापण्डित श्रीदामोदरके पुत्र श्रीशार्ङ्गधर-
ने नृगनृपतिका निर्देश शार्ङ्गधरसंहितामें किया है । इससे ११००
शकवर्षसे २०० वर्ष पूर्व ८९८ शकवर्षसे नृगराजाका और वाचस्पति-
मिश्रका समय सिद्ध होता है । इसके अनुसार ७८ वर्ष जोड़नेपर
९७६ ई० वर्ष तथा १३५ वर्ष जोड़नेपर १०३३ वि० संवत् वाचस्पतिमिश्र-
का समय आता है ।
किन्तु उपर्युक्त द्विवेदी प्रभृतिके मतका विरोध करते हुए डा० गङ्गा-
नाथझा प्रभृति अन्य विद्वान् न्यायसूचीनिबन्धके उपसंहारमें लिखे उक्त
श्लोकमें वत्सरपदसे विक्रमवत्सर मानकर वाचस्पतिमिश्रका समय
( ८९८-५७ = ) ८४१ ई० वर्ष निश्चित करते हैं । डा० कीथ एवं
डा० वुडश महाशय भी डा० झा के मतका ही समर्थन करते हैं । उभय-
पक्षका सम्यक् विचारकर श्रीउदयवीरशास्त्री भी झामतका ही समर्थन
करते हैं । तथा श्रीद्विवेदी एवं महामहोपाध्याय हरप्रसादशास्त्रीके
मतका खण्डन करते हैं ।
मेरे विचारसे भी डा० झाका ही मत ठीक प्रतीत होता है । क्योंकि
उक्त निबन्धमें वर्षका नामोल्लेख न होनेसे सामान्यत प्रसिद्ध वि०
संवत् ही मानना उचित है । आज भी ईसाका नाम लिये बिना केवल
वर्षसंख्या १८४७, १९४२, १९४७ आदि लिख दिया जाता है, किन्तु
प्रसिद्धिवशात् ई० वर्ष समझा जाता है । वैसे ही वहाँ प्रसिद्धिवश
विक्रमसंवत् ही मानना चाहिये ।
यह इसलिये भी उचित है कि यदि ८९८ शकवर्ष होता तो ९०६
शकवर्षमे वर्तमान उदयनाचार्य वाचस्पतिमिश्रके अत्यन्त समानकालिक
हो जानेसे उनकी न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकापर तात्पर्यपरिशुद्धि कैसे
लिखते ? वाचस्पतिमिश्रलिखित ८९८ को विक्रमवर्ष माननेपर उदयना-
चार्यका समय ( ९०६ शकवर्ष + १३५ = ) १०४१ विक्रमसंवत् होनेसे
वाचस्पतिमिश्रसे लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद उदयनाचार्यद्वारा तात्पर्य-
परिशुद्धिका लिखना सर्वथा संगत होगा । मेरे गुरुदेव श्रीसूर्यनारायण-
शुक्लजीने भी न्यायमञ्जरीकी भूमिकामें ९४१ ई० वर्ष ही वाचस्पति-
मिश्रका समय निर्धारित किया है ।