आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 31, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तुत ग्रन्थ आत्मतत्त्वविवेकमे आत्मतत्त्वका विशद विवेचन
किया गया है। क्योंकि आस्तिक नास्तिक सभी अध्यात्मवादियोंको
इस बातमे समान मान्यता है कि सर्वानुभवसिद्ध दुःखके नाशका एक-
मात्र उपाय तत्त्वज्ञान ही है। और वह ज्ञेय तत्त्व आत्मा ही है। भले
ही वह ज्ञेय आत्मा निरात्मवादियोंके लिये निषेध्यरूपमे ज्ञेय हो या
आत्मवादियोंके लिये विधिरूपमे ज्ञेय हो । अर्थात् वह आत्मा क्या
है ? जिसका नैरात्म्यवादी निषेध करते हैं और आत्मवादी अस्तित्व
प्रतिपादित करते हैं। इस प्रकार उभयदृष्टिसे उस आत्मतत्त्वका विवेचन
करना आवश्यक होनेसे इस ग्रन्थमें उसका विवेचन किया गया है।
इसीलिये इसका नाम आत्मतत्त्वविवेक रखा गया है। इसका अन्य
नाम बौद्धाधिकार या बौद्धधिकार भी है। यद्यपि उदयनाचार्यके सभी
ग्रन्थ बौद्धोंकी आलोचना करते हैं, किन्तु उन सबोंमे आत्मतत्त्वविवेक
बौद्धमत खण्डनमें अकेला तत्पर है।
यह ग्रन्थ चार अधिकरणोंमें पूर्ण होता है—क्षणभङ्गवाद, बाह्यार्थ
भङ्गवाद, गुणगुणिभेदभङ्गवाद एव अनुपलम्भवादके रूपमे । उक्त
चारो वाद बौद्धोंके हैं, जिनका श्रीमदुदयनाचार्यने प्रबल प्रतिवाद
प्रस्तुत किया है। सिद्धान्तकी दृष्टिसे इन चारो अधिकरणों को क्षण
भङ्गभङ्ग बाह्यार्थभङ्गभङ्ग गुणगुणिभेदभङ्गभङ्ग और अनुपलम्भभङ्ग
प्रकरण नामसे भी कहा जाता है।
क्षणभङ्गवाद—
इस प्रकरणमें क्षणिकवाद का खण्डन किया गया है, जिससे नित्य
आत्मा स्वतः सिद्ध हो जाता है। बौद्धमतके अनुसार जब सभी पदार्थ
क्षणिक हैं, तो आस्तिकोंका नित्य आत्मा कैसे सिद्ध हो सकता है। उनका
यह अनुमान है कि—"यत् सत् तत् क्षणिक यथा जलधर, सन्तश्च भावा
अमी। इत्यादि। अर्थात् जो सत् है, वह क्षणिक है, जैसे मेघ और
घटादि। विवादका विषय शब्दादि भी सत् हैं, इस लिये वे सभी क्षणिक
हैं। इस अनुमानप्रमाण से जब सभी पदार्थ क्षणिक सिद्ध हैं तब
नित्य आत्माके अस्तित्वका प्रश्न ही कहाँ है। यह बौद्धका पूर्वपक्ष है।
यहाँ सिद्धान्तीका कहना है कि "जो सत् है वह क्षणिक है" यह
व्याप्ति ही असिद्ध है। यदि कहा जाय कि क्षेत्रस्थ बीज अङ्कुर जननमें