आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 23, कुल 530 में से
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प्रस्तुत ग्रन्थ 'आत्मतत्त्वविवेक' के रचयिता सुगृहीतनामधेय
आस्तिकशिरोमणि श्रीमान् उदयनाचार्य दार्शनिकगगनमण्डलमें अत्यन्त
तेजस्वी सूर्यके समान विराजमान थे । जिन्होंने न्याय लोक एवं
आगमोंके ऊपर छाये प्रतिपक्षियोंके व्याघातरूप घोर अन्धकारको दूर
कर मुक्तिके मार्गको प्रशस्त किया । ग्रन्थके अन्तमें उनकी यह उक्ति है-
'तदिदमुदयनेन न्यायलोकागमानां व्यतिहतिरवधूय व्यञ्जित धर्म्म मुक्तेः' ।
उनकी प्रसिद्धि अनेक नामोंसे थी । उदयन, उदयनाचार्य
न्यायाचार्योदयन, उदयकर या उदयाकार, उदयंकर एवं उदयनाचार्य
भादुड़ी आदि । अपने 'उदयन' नामका उल्लेख उदयनाचार्यने स्वयं
अपने वैशेषिकसूत्र प्रशस्तभाष्यकी किरणावलीनामक व्याख्याग्रन्थमें
किया है । "व्यतेने किरणावलीमुदयनः" । प्रस्तुत ग्रन्थके उपसंहार-
श्लोकमें भी "तदिदमुदयनेन न्यायलोकागमानाम्" ऐसा उल्लेख किया
है । कलकत्तामुद्रित "आत्मतत्त्वविवेक" के उपसहार-वाक्यमें
"इदमुदयकरेण न्यायलोकागमानाम्" ऐसा पाठ है । इसका उल्लेख
महामहोपाध्याय विन्ध्येश्वरी प्रसाद द्विवेदीने न्यायवार्तिककी भूमिकामें
किया है । इस प्रकार उदयकर भी इनका नाम था । उदयनाचार्य या
न्यायाचार्योदयन ऐसा विद्वानोंद्वारा व्यवहृत नाम भी इन्हीं का है ।
किन्तु ईश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रग्रन्थमे देखा गया 'उदयाका रसूनुना' यह वाक्य
किसी औरको उदयाकरनाभसे अभिहित करता है, उदयनाचार्यको नहीं ।
"शब्देन्दुशेखरे ज्योत्स्नां प्रकरोत्युदयंकरः" श्लोकमे आया उदयंकर-
नाम तो किसी अत्यन्त अर्वाचीनका है, यह सुतरा स्पष्ट है । उदयनाचार्य
भादुड़ी भी प्रस्तुत उदयनाचार्यसे भिन्न थे । क्योंकि चाटुर्जी वानुर्जी
गाङ्गुली भादुड़ी आदि उपाधियाँ बल्लालसेनकी दी हुई हैं, जिनका
समय "अद्भुतसागर आदि ग्रन्थोंके आधारपर १०८५ शकाब्द था ।
जबकि उदयनाचार्यने लक्षणावलीमे इसके निर्माणका काल ९०६ शकाब्द
लिखा है । इस प्रकार उदयन उदयकर-उदयनाचार्य,एवं न्यायाचार्यो-
दयन यही नाम इनके वस्तुतः थे । (द्रष्टव्य--म० म० विन्ध्येश्वरीप्रसाद
द्विवेदीकृत न्यायवार्तिकभूमिका पृष्ठ १५१-५२)
आत्मतत्त्वविवेकके रचयिता श्रीमान् उदयनाचार्य वङ्गदेशीय या
'दाक्षिणात्य नहीं थे किन्तु मैथिल थे, इसका स्पष्ट उल्लेख भविष्यपुराण-
के परिशिष्टमे हुआ है । जैसे -