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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

हेतुः, अनैकान्तात् । अभास्वरं रूपं भास्वरेण सह नियमे-
नोपलभ्यते भिन्नं चेति ।
देशाविच्छेद इति चेन्न, असिद्धेः देहदेहिभ्यामनैका-
न्ताच्च । न तयोरविच्छेदस्तदनुपलम्भेऽप्युपलम्भादिति चेत् ,
तुल्यम्, रूपायनुपलम्भेऽपि तद्गतामुपलब्धेः ।
है । जैसे, घटका अभास्वर ( नहीं चमकनेवाला ) रूप आलोकके
भास्वर ( चमकनेवाले ) रूपके साथ ही नियमत उपलब्ध होता है,
फिर भी घटका रूप और आलोकका रूप परस्परमे अभिन्न नहीं बल्कि
भिन्न ही हैं ।
यदि कहो कि—सहोपलब्भ के साथ साथ देशका भी विच्छेद नहीं
होना चाहिये । इसलिये घटरूप और आलोकरूपका सहोपलम्भ होनेपर
भी उनका देश भिन्न भिन्न है । अर्थात् घटरूपका देश ( आश्रय ) घट
है और आलोकरूपका देश आलोक है । अत भिन्न देश होनेके कारण
सहोपलम्भ होनेपर भी घटरूप और आलोकरूप परस्पर अभिन्न नहीं
होंगे । गुण गुणीका तो सहोपलम्भके साथ साथ देश भी एक है, इस
लिये इनके अभेदमें कोई बाधा नहीं है—तो देशाविच्छेद भी यहाँ
असिद्ध है । क्योंकि गुणका देश ( आश्रय ) द्रव्य है और गुणीका
( द्रव्यका ) देश उसका अवयव है । इस प्रकार देशका विच्छेद (भेद)
होनेके कारण गुण गुणीमे अभेद नहीं सिद्ध हो सकेगा । एव, देशा-
विच्छेद हेतु भी देह देहीमे व्यभिचरित है । अर्थात् देह और देहीकी
एक देशमे प्रतीति होनेपर भी अप्रकाशात्मक देह भिन्न है और स्वप्रकाश-
ज्ञानात्मक देही भिन्न वस्तु है । इस प्रकार देशाविच्छेद होनेसे अभिन्न
होनेका नियम यहीं व्यभिचरित हो गया ।
यदि कहो कि—देह देहीको लेकर उक्त नियम व्यभिचरित नहीं
होगा, क्योंकि देह देहीमे अविच्छेद ही नहीं है । कारण, देहका
अनुपलम्भ होनेपर भी "अहम्" रूपमे स्वप्रकाशज्ञानात्मक देहीका
उपलब्ध होता रहता है, इसलिये इनमें भेद होनेपर भी हमारे पूर्वोक्त
नियममे व्यभिचार नहीं है—तो यह बात गुण गुणीके लिये भी तुल्य
है । क्योंकि रूपादिको अनुपलब्धि होनेपर भी आधारभूत गुणीकी

? No, it's डorइ! If it's इ: इhas a loop and tail at the bottom. Does this letter have a loop and tail? No! It just ends likeड! Wait, could it be ड र स े? -> डरसे! Wait, why डरसे? Wait! Look at the word before it: Is it दृष्ट्या? Wait! Look at the first letter of that word: Does IT have a vertical stem? Wait, look at: दृ? Wait, could the phrase be: दृष्टबाधाके डरसे? No, it's too short. Wait, what if the word is: दृष्टहानिके डरसे? No, it's: द ृ ष ्ट... wait, look at the letters: दृ ष्ट के डरसे? Look at the letters between अर्थात्andदेह`:

  1. द ृ
  2. ष ्ट
  3. य ा (or ह ा? व ा?)
    Wait, look at letter 3: it is य with ा? Or ा `र

यहाँ पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३८९
धर्मविरोध एव कोऽत्रेति चेत्, तदुपलम्भेऽप्यनुपलम्भः,
तदभिधानेऽप्यनभिधानं, तन्निषेधेऽप्यनिषेध इत्यादि। नील-
मुत्पलं चलतीत्यादौ च व्यावृत्तिभेदनिराकरणे पूर्वक एव
न्यायोऽनुसन्धेयः, अन्यत्रोपाधिभेदात्।
अभेदे च धर्मधर्मिणोर्दूरादूरवया ग्रहणे पट्वपटुनी कुतः?
यदि पूछो कि गुण गुणीमे विरोधी धर्म ही कहाँ हैं? तो यही
उत्तर होगा कि इनमें एकका उपलम्भ होनेपर भी दूसरेका अनुपलब्ध
होना, एकका कथन होनेपर भी दूसरेका अकथन होना तथा एकका
निषेध होनेपर भी दूसरेका अनिषेध होना आदि ही विरोधी धर्म हैं।
अर्थात् रूपगुणका ग्रहण नहीं होनेपर भी शङ्खका ग्रहण होता है, शङ्ख
कहनेपर भी उसका रूप नहीं कहा जाता तथा रूपका निषेध होनेपर भी
शङ्खका निषेध नहीं होता। ये सब बातें गुण गुणीके भेदपक्षमें ही
बन सकती हैं।
एवं, "नीलमुत्पलं चलति" यह व्यवहार होता है। इसमें गुण,
जाति और क्रियाका सामानाधिकरण्य सूचित होता है, और वह समान
अधिकरण द्रव्य ही है इस प्रकार गुणसे पृथक् गुणी द्रव्यकी सत्ता
सिद्ध होती है। यह नहीं कह सकते कि-उस व्यवहारमें अनीलादि-
व्यावृत्ति ही सूचित होती है-क्योंकि व्यावृत्तिविशेषके खण्डनमें पहले
ही बहुतसे न्याय दिये जा चुके हैं, उन्हें ही स्मरण करना चाहिये। हाँ,
जहाँ उपाधिविशेषसे विशिष्ट व्यवहार होता है, वहाँ अतद्व्यावृत्तिका
निराकरण नहीं करते। जैसे, कार्यत्व-उपाधिसे अवश्य ही अकार्यकी
व्यावृत्ति समझी जाती है तथा नित्यत्व उपाधिसे अवश्य ही अनित्यकी
व्यावृत्ति समझी जाती है।
एवं, धर्म और धर्मीमें यदि परस्पर अभेद है तो दूरसे किया
गया प्रत्यक्ष अपटु (अस्पष्ट) होता है तथा निकटसे किया गया प्रत्यक्ष
पटु (स्पष्ट) क्यों होता है? अर्थात् धर्मीके अधिकांश धर्मोंका ग्रहण
पटुत्व है तथा अल्प धर्मोंका ग्रहण अपटुत्व है। यदि धर्मी और
धर्म अभिन्न ही हैं तो धर्मीका ग्रहण तो दूर और निकट दोनों दशाओंमें

३३० आत्मतत्त्वविवेक
न च पुरुषभेदेन तथैवान्यस्योत्पादः, एकस्य द्वैरूप्याभावात् ।
न चान्यान्य एवासौ, एकदेशतया तत्त्वेन प्रतिसन्धानात् ।
न च सा भ्रान्ता, भिन्नदेशस्य तथाभूतस्य प्रत्यासीदताऽप्यनु-
पलम्भात् । न च निरालम्ब एव तदुपलम्भः, वृक्षादिदेश-
प्रतिनियमानुपपत्तेः ।
होता ही है, इसलिये उससे अभिन्न सभी धर्मोंका ग्रहण भी हो ही
जायगा । ऐसी स्थितिमें ज्ञानोंमें पटुत्व-अपटुत्वका भेद नहीं होना
चाहिये ।
यदि कहो कि—पुरुषभेदसे वृक्षादि वस्तु (धर्मी) ही किसी व्यक्ति
के लिये पटुरूपमें तथा किसी व्यक्तिके लिये अपटुरूपमें उत्पन्न हो जाती
है। अर्थात् पटुत्व-अपटुत्व वस्तुका धर्म है और उसका ग्राहक होनेसे
ज्ञानमें भी पटुत्व-अपटुत्वका व्यवहार हो जाता है । इसलिये एक ही
वस्तु निकटवर्ती पुरुषके प्रति पटरूपमें तथा दूरवर्ती पुरुषके प्रति अपटु-
रूपमें उत्पन्न होती है । अतः पटुत्वअपटुत्वका कारण धर्म-धर्मीका
भेद नहीं है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि एक वस्तु पुरुषभेदसे
भी दो नहीं हो सकती ।
यदि कहो कि—एक ही दो नहीं हो जाता, किन्तु एक पटु और
दूसरा अपटु, इसप्रकार भिन्न भिन्न दो वृक्ष ही पैदा होते हैं—तो यह भी
नहीं हो सकता । क्योंकि एक ही जगह पर अभिन्नरूपमें उस वृक्षकी
प्रत्यभिज्ञा होती है । अर्थात् निकट जानेपर जिसे दूरसे देखा था,
वही यह वृक्ष है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा निकटस्थ व्यक्तिको होती है। यह
बात भी नहीं है कि एकदेशता की और अभिन्नता की प्रतीति भ्रमात्मिका
हो, क्योंकि दूरी और नजदीकीके कारण अपटु और पटु मालूम पड़ने
वाला भी वह वृक्ष निकटस्थ होनेपर भी भिन्न देशस्थ नहीं मालूम पड़ता
किन्तु उसी स्थानमें और वही मालूम पड़ता है । यह भी नहीं हो
सकता कि पटुत्व-अपटुत्वकी उपलब्धि निर्विषयक (शशविषाणज्ञानके
समान असद्विषयक) हो, क्योंकि वैसा होनेपर वृक्षादि-देशके साथ
पटुत्व-अपटुत्वका कोई प्रतिनियम नहीं बन सकेगा । अर्थात् नियतरूपसे
वृक्षादिमें ही पटुत्व-अपटुत्वकी प्रतीति होती है । सर्वथा निर्विषयक

गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३३१
न चाधिपतिप्रत्ययत्वात्तस्येति युक्तम्, अनुभवानां तद्-
देशोल्लेखानुरोधात् । उल्लेखे वा स एवालम्बनप्रत्ययः,
तावन्मात्रानुबन्धित्वादलम्बनव्यवहारस्य । न च देशोऽ-
स्त्वालम्बनं न तु वृक्षादिरिति साम्प्रतम्, अनुपलब्धविशेषतया
देशदेशिनोरविशेषात् ।
शशविषाणादि प्रतीतिमे तो पटुत्व अपटुत्वका कभी भान ही नहीं
होता है।
यदि कहो कि—वृक्षादिदेशके साथ नियतरूपसे होनेवाला पटुत्व-
अपटुत्वका उपलम्भ अनादिवासनारूप अधिपतिके कारण होता है।
सभी विकल्पोंका कारण होनेसे अनादिवासना ही अधिपति कही गयी
है। इसलिये वही प्रतिनियत देशमे पटुत्व-अपटुत्वके उपलम्भका प्रत्यय
अर्थात् कारण है—तो यह कथन भी युक्त नहीं है। क्योंकि अनुभवों
मे जब तुम प्रतिनियत देशका उल्लेख नहीं मानते हुए उन्हें निरालम्बन
कहते हो तो उससे होनेवाली वासनामे भी देशका उल्लेख नहीं हो
सकेगा। यदि अनुभवोंमें देशका उल्लेख मानो तो फिर वही आलम्बन-
प्रत्यय (विषय) सिद्ध हो गया। इसप्रकार वृक्षादि देश और उसमें
पटुत्व अपटुत्वका ग्रहण सिद्ध हो जाता है। अत पटुत्व-अपटुत्वज्ञान
को निरालम्बन (निर्विषयक) नहीं बता सकते हो। क्योंकि अनुभव-
का विषय होनेसे ही वस्तुमे आलम्बनत्व व्यवहार होता है।
यह भी कथन उचित नहीं है कि—पटु अपटु ग्रहणका विषय देश
ही है, वृक्षादि नहीं है—क्योंकि पटु अपटु ग्रहण वृक्षादिके समान ही
उस देशमे भी उसके विशेषधर्मोंकी उपलब्धि और अनुपलब्धिके कारण
ही होता है। अर्थात् देशमें भी दूरवर्ती व्यक्तिको विशेषधर्मोंकी
अनुपलब्धिके कारण अपटु (अस्पष्ट) तथा निकटवर्तीको विशेषधर्मोंकी
उपलब्धिके कारण पटु (स्पष्ट) ग्रहण होता है। यह बात भी तभी ही
हो सकती है, जब धर्म धर्मीमे भेद होगा। इस प्रकार देश
(भूतलादि) और देशी (वृक्षादि) दोनोंकी अविशेष (समान) ही
... है।

३३२ आत्मतत्त्वविवेके

न च दवीयांसोऽपि विशेषाः स्फुरन्त्येव न तु निश्चीयन्त
इति युक्तम्, न हि योगविमलाञ्जनधौतदृष्टेरन्यस्य ताराव्यूह-
गतयः प्रतिभान्तीति शक्यं प्रतिपादयितुम्।
अनिश्चयानुपपत्तेश्च। अनुभूतो ह्यात्मा न निश्चीयत
इत्यत्र हेतुर्वाच्यः। वासनानुद्भव इति चेन्न, निःशेषविशेष-
वन्तं धर्मिणमुपलभ्य विदूरवर्तिनस्तदखिलस्मरणेऽपि अनुभव-
व्यापारानुसारिनिश्चयानुदयात्।


यह भी कथन युक्त नहीं है कि—अतिदूरस्थ भी विशेषधर्म स्फुरित
(निर्विकल्पकज्ञानके विषय) होते ही हैं किन्तु निश्चय (सविकल्पकज्ञान)
भर नहीं हो पाता। अर्थात् ग्रहणोंमे पटु अपटुका विरोध नहीं है।
क्योंकि अपटु ग्रहण होता ही नहीं है। किन्तु सभी ग्रहण पटु (स्पष्ट)
ही होते हैं। इसलिये पटु अपटु ग्रहणके विरोधके आधारपर धर्म
(गुण) और धर्मी (गुणी) में भेदका साधन नहीं हो सकता है—
क्योंकि ऐसा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता है कि योगरूपी निर्मल
अञ्जनसे जिनकी दृष्टि पवित्र हो चुकी है, ऐसे योगियोंके अतिरिक्त
दूसरे व्यक्तिको भी तारासमूहकी गतियोंका ज्ञान होता हो, केवल
निश्चय भर न होता हो। अर्थात् दूरवर्तीको विशेषधर्मोंका अग्रहण
होता ही है और वह ज्ञान भी अस्पष्ट होता ही है, इसमें सन्देह
नहीं है।
यह जो कहा कि-निर्विकल्पक ज्ञान तो होता है, किन्तु उस विषयका
सविकल्पात्मक निश्चय नहीं होता—तो यह अनिश्चय कहना भी अनुप
पन्न है। क्योंकि सूक्ष्म आत्माका अनुभव तो तुम्हें हो रहा है, किन्तु
उसका निश्चय नहीं होता, इसका कारण तुम्हें कहना चाहिये। यदि
कहो कि—सरकारका उद्बुद्ध न होना ही अनिश्चयका कारण है—तो
यह नहीं कह सकते। क्योंकि सम्पूर्ण विशेषधर्मोंके साथ धर्मीको
जान लेनेके बाद जब कोई व्यक्ति विशेष दूर चला जाता है, उस
अवस्थामें उसके सम्पूर्ण विशेष धर्मोंका स्मरण करा देने वाली वासनाके
उद्बुद्ध रहने पर भी पूर्वोक्त अनुभव-व्यापारके अनुसार निश्चय

गुणगुणिभेदभङ्गवाद ३३३
तथापि चानुभवकल्पनायां सर्वः सर्वदा सर्वं जानाति न'
तु निश्चिनोतीति किं न स्यात् ? भ्रान्तिवशात् तद्विपरीत-
विशेषनिश्चयेऽनुभूतविशेषाऽनिश्चय इति चेन्न, अनुभववैपरीत्ये
निश्चयस्य सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गात् । यत्र च विपरीतस्याप्य-
निश्चयस्तत्र का वार्ता ? यथा पराचीनैर्भागैरर्वाचीनानां संयोग-
( साक्षात्कारी ज्ञान ) नहीं होता है । अतः वासनाका उद्भव निश्चयका
हेतु नहीं हो सकता ।
एव अनुभवानुरूप निश्चय नहीं होनेपर भी यदि अनुभवकी कल्पना
की जाय तो यह भी क्यों न हो जाय कि-सभी सर्वदा सबको जानते
हैं, किंतु उसका केवल निश्चय भर नहीं करते । अर्थात् सभी सर्वज्ञ
हो जायेंगे । यदि कहो कि-अनुभवके बाद निश्चय होता ही है, यह
नियम नहीं हो सकता, क्योंकि अनुभवके अनन्तर भ्रमवश जहाँ विपरीत
निश्चय हो जाता है, वहाँ अनुभूत विषयका निश्चय नहीं होता है । जैसे,
शुक्तिविषयक निर्विकल्पक अनुभवके बाद रजतका भ्रमात्मक निश्चय
हो जानेपर शुक्तिविषयक सविकल्पक निश्चय नहीं होता-तो यह भी
नहीं कह सकते । क्योंकि अनुभव कुछ और निश्चय कुछ, इस प्रकार
निर्विकल्पक अनुभवके विपरीत भी सविकल्पक निश्चय हुआ करे तो
सर्वत्र निर्विकल्पक अनुभवोंके प्रति अविश्वास हो जायगा । क्योंकि
निर्विकल्पकके स्वय अतीन्द्रिय होनेसे उसकी कल्पनाका एकमात्र सवि-
कल्पक ही आधार होता है । इसलिये ज्ञापक ही जब विपरीत हो
जायगा तब उसके आधारपर अतीन्द्रिय निर्विकल्पकका ज्ञान कैसे हो
सकेगा ? अपने पक्षमे जो शुक्ति-रजतका दृष्टान्त दिये हो, वह उपयुक्त
नहीं है । क्योंकि रजतभ्रमस्थलमें शुक्तिका निर्विकल्पक अनुभव
पहले हुआ ही नहीं रहता है, बल्कि धर्मी-इन्द्रियके सन्निकर्ष होते
ही स्मर्यमाण रजतका एक ध एक विपरीत निश्चय ही उत्पन्न हो
जाता है ।
एव, जहाँ अनुभवानन्तर विपरीतका भी निश्चय नहीं हुआ, वहाँपर
अनुभवानुरूप निश्चयके नहीं उत्पन्न होनेका क्या हेतु बताओगे ? जैसे,

३३४ आत्मतत्त्वविवेके
विभागयोरिति ॥
॥ इति गुणगुणिभेदमङ्गवादः ॥
किसी पदार्थके परवर्ती भागोंके साथ अर्वाग्वर्ती भागोंका जो संयोग
विभाग होता है, वह प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष वस्तुवृत्ति होनेके कारण वायु
वनस्पतिके संयोग-विभागके समान अप्रत्यक्ष होता है तथा उसका
निर्विकल्पक ग्रहण तुम मानते हो, साथ ही वहाँ कोई विपरीत निश्चय
भी नहीं होता है । ऐसी परिस्थितिमें उस संयोग विभागका अनुभवानु
रूप निश्चय क्यों नहीं होता है ? अतः पूर्वोक्त अनुभवोंके द्वारा गुण
गुणिभेदके निश्चित हो जानेसे गुण गुणिभेदभङ्गके आधारपर आत्माकी
सत्ताका खण्डन नहीं किया जा सकता है ॥
इति गुण-गुणिभेदभङ्गवादनिरास

अथानुपलम्भवादः
अस्तु तर्हि नैरात्म्यम्, अनुपलब्धेरिति चेन्न—
सर्वदृष्टेश्च सन्देहात् स्वादृष्टेर्व्यभिचारतः ।
दृश्यत्वविशेषणान्नैवमिति चेन्न तदसिद्धेः । परोपगम-
अनुपलम्भवादका खण्डन
आशङ्का—पूर्वोक्त तीनों हेतुओंसे आत्माका अभाव भले ही सिद्ध
न हो सके फिर भी अनुपलब्धि हेतुसे ही आत्माका अभाव सिद्ध हो
जायगा । अर्थात् आत्मा नहीं है, क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती
है, जैसे उपलब्धि नहीं होनेसे शशविषाणका अभाव होता है ।
समाधान—अनुपलब्धिसे भी आत्माका अभाव नहीं सिद्ध हो
सकता है । क्योंकि यहाँ अनुपलब्धिसे सब व्यक्तियोंकी अनुपलब्धि
विवक्षित है ? अथवा पुरुषविशेष (बौद्धादि) की ? यदि प्रथमकल्प
हो तो अनुपलब्धि हेतु सन्दिग्धासिद्ध हो जायगा । क्योंकि सभीको
आत्माकी अनुपलब्धि है—यह निश्चय कैसे हो सकेगा ? कारण, दूसरेके
ज्ञान अज्ञानको दूसरा नहीं समझ सकता है । यदि दूसरा कल्प हो
तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि, पुरुषविशेषकी अनुपलब्धि व्यभिचारी
है । अर्थात् व्यक्तिविशेषको अनुपलब्ध होनेसे भी वस्तुका अभाव
नहीं हो जाता है । कारण, सम्भव है, इन्द्रिय दोषादिके कारण उसे
उपलब्धि नहीं होती हो ।
यदि कहो कि—दृश्यत्व विशेषणके साथ अनुपलब्धिको हेतु मानने-
से उक्त व्यभिचारदोष नहीं होगा । अर्थात् प्रत्यक्षद्वारा देखने योग्य
होनेपर भी जिस वस्तुकी उपलब्धि नहीं होती है, उसका निश्चित ही
अभाव होता है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि तुम्हारे मतमें आत्मा-
का दृश्यत्व असिद्ध है । अर्थात् तुम आत्माको दृश्य नहीं मानते हो ।
यदि दृश्य मानो तो वह सिद्ध ही हो गया, उसका अभाव कहाँ हुआ ?

३३६ आत्मतत्त्वविवेके
सिद्धेरदोष इति चेन्न, स्वतन्त्रसाधनत्वात् । यदि परः सहसैव
नैवमभ्युपगच्छेत्, नूनं साधनमिदं मूच्र्छेत् । यदि च परो
दृष्टिमवधूय दृश्यं तमभ्युपगच्छेत्, एवमपि सम्भवेत् । न चैवं
शक्यम्, तस्य तदुपहितरूपत्वादिति संक्षेप । विस्तरस्त्व-
सन्तोऽक्षणिका इतिवदूहनीयम् ।
यदि कहो कि—नैयायिक आत्माको दृश्य मानते हैं इसलिये उनके
अभ्युपगमको लेकर दृश्यत्व विशेषण होनेसे कोई दोष नहीं है—तो यह
नहीं कह सकते । क्योंकि अनुमान एक स्वतन्त्र साधन है, अतः
दूसरेके अभ्युपगमके आधारपर उसकी प्रवृत्ति नहीं हुआ करती । तर्क
ही ऐसी वस्तु है, जो दूसरेके अभ्युपगमके आधार पर प्रवृत्त होता है ।
क्योंकि उसके द्वारा दूसरेके अभ्युपगममें अनिष्टका आपादान ( प्रसङ्ग )
किया जाता है । इसका कारण यह है कि यदि दूसरेके अभ्युपगमके
आधारपर अनुमान किया जाय तो कदाचित् वह दूसरा व्यक्ति वैसा
अभ्युपगम ही न करे तो निश्चय ही यह हेतु मूच्छित हो जायगा, अर्थात्
स्वरूपासिद्ध हो जायगा ।
एव, यदि दूसरा ( नैयायिक ) दृष्टिके ( उपलब्धके ) अभावमें भी
आत्माको दृश्य माने तो "दृश्यत्वे सति अनुपलब्धे" इस हेतुको
नैयायिकके अभ्युपगमके आधारपर ही सिद्ध मानकर उक्त अनुमान
संभव होता । किन्तु नैयायिक भी दृष्टि ( उपलब्धि ) के अभावमें अर्थात्
अनुपलब्धिकी दशामें तो आत्माको दृश्य मान ही नहीं सकता है ।
क्योंकि दृश्य वही है जो दृष्टिसे उपहित हो । अर्थात् जिसका दर्शन
( उपलम्भ ) होगा, वही दृश्य कहा जा सकता है । इसलिये यदि आत्मा
दृश्य होगा तो उसकी अनुपलब्धि नहीं हो सकती और यदि अनुपलब्धि
होगी तो उसमें दृश्यत्व विशेषण नहीं सिद्ध हो सकता । इस प्रकार
' दृश्यत्वे सति अनुपलब्धे ' यह हेतु सर्वथा असिद्ध है । यह संक्षेपमें
कहा गया । विशेष विस्तारको तो पूर्वमें कहे गये ' जो क्षणिक नहीं है
अर्थात् स्थिर है, वह असत् है" इस अनुमानके समान ही स्वयं समझ
लेना चाहिये । अर्थात् जिस प्रकार वहां कहा गया है कि 'यदि स्थिर-
वस्तुरूप पक्ष सिद्ध है, तो उसमें असत्त्व साध्यका बाध हो जायगा,

अनुपलब्धवादः ३३७
अथात्मसद्भावे किं प्रमाणम् ? प्रत्यक्षमेव तावत् , अह-
मिति विकल्पस्य प्राणभृन्मात्रसिद्धत्वात् । न चायमवस्तुकः
सन्दिग्धवस्तुको वा, अशाब्दत्वादप्रतिषेधाच्च । न च लैङ्गिकः,
अननुसंहितलिङ्गस्यापि स्वप्रत्ययात् । न च स्मृतिरियम् ,
अननुभूते तदनुपपत्तेः ।
यदि असिद्ध है तो आश्रयासिद्धि हो जायगी” वैसे ही यहाँ भी समझना
चाहिये कि “आत्मा नास्ति, अनुपलब्धेः” इस अनुमानमे आत्मारूप पक्ष
यदि सिद्ध है तो आत्माका अस्तित्व ही सिद्ध हो जाता है, इससे “नास्ति”
इस साध्यका बाध हो गया । यदि आत्मारूप पक्ष सिद्ध नहीं है तो पक्षके
असिद्ध होनेसे उक्त अनुमान ही नहीं हो सकेगा ॥
आत्माके सद्भावमें साधक प्रमाण
इसके बाद प्रश्न उठता है कि—आत्माके सद्भावमे पूर्वोक्त बाधक
भले ही न हो सके, किन्तु उसके सद्भावका (अस्तित्वका) साधक
प्रमाण क्या है ? अर्थात् आत्माके अस्तित्वमे प्रमाण नहीं होनेसे भी
नैरात्म्यवाद स्वतः सिद्ध हो जायगा—तो इसका उत्तर यही है कि
आत्माकी सत्तामे प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । क्योंकि “अहम्” ऐसा
सविकल्पक प्रत्यक्ष प्राणीमात्रको होता है, जिसमें विषयरूपमे आत्मा ही
भासित होता है । यह नहीं कह सकते कि—उक्त “अहम्” यह प्रतीति
वस्तुके बिना ही होती है, अथवा सन्दिग्ध वस्तु ही उसका विषय बनता
है—क्योंकि “अहम्” यह प्रतीति न तो शाब्द ही है और न तो आगे चल
कर कभी बाधित ही होती है, जिससे वह प्रतीति अवस्तुक हो या सन्दि-
ग्धवस्तुक हो । अर्थात् यदि अबाधित होनेपर भी “अहं-प्रत्यय” अवस्तुक
हो तो सभी नीलादि प्रत्यय अवस्तुक होने लगेंगे ।
“अहं-प्रत्यय” लैङ्गिक (अनुमान) भी नहीं है, क्योंकि लिङ्ग
(व्याप्य) का अनुसन्धान हुए बिना भी “अहम्” ऐसी अपनी प्रतीति
सबको हुआ करती है । अहम् प्रतीति स्मृतिरूप भी नहीं है, क्योंकि
पूर्वमे अनुभव हुए बिना स्मृति नहीं हो सकती है ।
यदि कहो कि—आधुनिक वासनाके प्रभावसे जो स्मृति होती है,
२२

३३८ आत्मतत्त्वविवेके

अनादिवासनावशादनादिरयमवस्तुको विकल्प इत्यपि न
युक्तम्, नीलादिविकल्पसाधारण्यात् । इह वासनामुपादा-
यानाश्वासे प्रमाणान्तरेऽपि कः समाश्वासो यतो नीलादि-
विकल्पेषु समाश्वासः स्यात् ।
तस्माद् वासनामात्रवादं विहायागन्तुकमपि किञ्चित्
कारणं वाच्यम्, तच्चाप्तानाप्तशब्दौ वा लिङ्गतदाभासौ वा
प्रत्यक्षतदाभासौ वेति । तत्र यथा प्रथममध्यमप्रकाराभावा-
न्नीलविकल्पश्चरमं कल्पमालम्बते, तथाऽहमिति विकल्पोऽपि ।

उसके लिये मूलभूत अनुभवकी अपेक्षा है। किन्तु अनादिवासनाके
कारण होनेवाला "अहम्" यह विकल्प अनादि है और वस्तुशून्य है—
तो यह कथन भी युक्त नहीं है। क्योंकि अनादि वासनाको मानकर
यदि 'अहम्' प्रतीतिको वस्तुशून्य और अविश्वसनीय माना जाय तो और
प्रमाणोंका भी क्या विश्वास कि उनके द्वारा होनेवाली नीलादि-प्रतीतियों
पर विश्वास किया जा सके। अर्थात् प्राणीमात्रको होने वाली "अहम्"
इस प्रत्यक्ष प्रतीतिको अविश्वसनीय माननेपर नीलादिविषयक सभी
प्रतीतियाँ अविश्वसनीय हो जायेंगी और हमारा सम्पूर्ण व्यवहार लुप्त
हो जायगा।
इसलिये "उक्त प्रतीतियोंका कारण वासनामात्र है" इस बातको
छोड़कर कुछ आगन्तुक भी कारण मानना होगा। और वह आगन्तुक
कारण आप्त और अनाप्त शब्द हो या लिङ्ग और लिङ्गाभास हो अथवा
प्रत्यक्ष और प्रत्यक्षाभास हो। इन आगन्तुक कारणोंमें जैसे प्रथम
और द्वितीय प्रकारोंको छोड़कर नीलादि-प्रतीतिका आधार प्रत्यक्ष और
प्रत्यक्षाभासरूप अन्तिम प्रकार है, वैसे ही "अहम्" प्रतीतिका भी
आधार निर्विकल्पात्मक प्रत्यक्ष या प्रत्यक्षाभास होगा। इन दोनोंमें भी
यदि "अहम्" प्रतीतिको निर्विकल्पक प्रत्यक्षके अव्यवहित उत्तरकालमें
उत्पन्न माना जाय तो उस निर्विकल्पके समान ही "अहम्" यह
सविकल्पक प्रतीति भी साक्षात् ही सवस्तुक सिद्ध हो जाती है। यदि
तो "अहम्" प्रतीतिका मूल निर्विकल्पक प्रत्यक्षको न मानकर प्रत्यक्षा-

अनुपलब्धवादः ३३९
तत्रायं प्रत्यक्षपृष्ठभावित्वे साक्षादेव सवस्तुकः, तदाभासे तु
मूलेऽस्य पारम्पर्यात् सवस्तुतेति ।
न च बाह्यप्रत्यक्षनिवृत्तावेव निर्मूलत्वम् , बुद्धिविकल्प-
स्यापि तथात्वप्रसङ्गात् । तत्र स्वसंवेदनं मूलमिहापि मानस-
प्रत्यक्षमिवि न कश्चिद् विशेषः ।
शरीरादिवस्तुको भविष्यतीति चेन्न, निरूपाधिशरीरेन्द्रिय-
भासको माना जाय तो भी परम्परा "अहम्" प्रतीति सवस्तुक सिद्ध हो
जाती है । क्योंकि किसी भी भ्रमात्मक ज्ञानके मूलमें प्रमात्मक ज्ञान
भी अवश्य होता है । जैसे, मिथ्यासर्पका ज्ञान तभी होता है, जबकि
वास्तविक सर्पज्ञान भी कहीं है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—यदि आत्मा होता तो नीलादिके समान
बहिरिन्द्रियोंके द्वारा जाना जाता । किन्तु आत्मविषयक बाह्यप्रत्यक्षकी
निवृत्ति होनेसे ही यह समझा जाता है कि "अहम्" यह विकल्प सर्वथा
निर्मूल है । अर्थात् परम्परा भी कोई निर्विकल्पकज्ञान इसका मूल
नहीं है । अतः मूलभूत निर्विकल्पकके अभावमे 'अहम्' प्रतीति वस्तुशू-न्य
है—क्योंकि आपका बुद्धि-विकल्प ( बुद्धिकी प्रतीति ) भी तब निर्मूल
हो जायगा और बुद्धिकी भी सत्ता नहीं सिद्ध हो सकेगी । कारण,
उसका भी बाह्य-प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
यदि कहो कि—बुद्धि स्वप्रकाश है, इसलिये अपनी सत्तामें वह
स्वयं प्रमाण है । आत्मा तो जड़ होनेसे अपनी सत्तामें अपने आप
प्रमाण नहीं हो सकता, अतः बुद्धि-प्रतीतिका मूल है उसका स्वप्रकाश
होना—तो "अहम्" प्रतीतिका भी मूल आत्माका मानस-प्रत्यक्ष ही है ।
इस प्रकार दोनोंके समूल होनेमें कोई अन्तर नहीं है । अर्थात् आत्मा-
की सत्तामें मानस प्रत्यक्ष ही प्रमाण है ।
यदि कहो कि—'अहम्' प्रतीतिका विषय शरीर आदि होगा न कि
अतिरिक्त चेतन आत्मा—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि बिना किसी
उपाधि ( विशेषण ) के शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि या इनका समुदाय यदि
"अहम्" प्रतीतिका विषय हो तो अतिव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् दूसरे

३४० आत्मतत्त्वविवेके

बुद्धितत्समुदायालम्बनत्वेऽतिप्रसङ्गात् स्वसम्बन्धिशरीरादायं
स्यादिति वाच्यम्, तत्र कः स्वार्थ इति वचनीयम् । अन-
न्यत्वं स्वत्वं सर्वभावानाम्, तथा च यदा तेनैव तदनुभूयते
तदा प्रत्येतुः प्रत्येतव्याद्व्यतिरेकादहमिति स्यात् । अतएव
घटादयो न कदाचिदनन्यानुभवितृका इति न कदाप्यहमास्पद-
मिति चेत्, एवन्तर्हि त्वन्मतेऽप्यहंप्रत्ययः शरीरादावारोपरूप एव,
ततः प्रत्येतुरन्यत्वात् ।


के शरीरादिके लिये भी "अहं गौर- काणः" आदि प्रतीति होने लगेगी ।
अतः इस दोषसे बचनेके लिये स्वसम्बन्धी जो शरीरादि, उसे ही इस
'अहम्' प्रत्ययका विषय कहना होगा । अत उसमे स्वशब्दका क्या अर्थ
है?—यह कहना चाहिये । अर्थात् वहां स्वशब्दका अर्थ आत्मा ही
कहना होगा । इसलिए जिस आत्मा का जो शरीर सम्बन्धी होगा,
उस आत्माको उस शरीरमें "अहं गौरः" यह प्रतीति होगी । इस प्रकार
शरीरसे अतिरिक्त आत्माकी सिद्धि हो गयी ।
यदि कहो कि—अनन्य ( अभिन्न ) होना ही सभी भाव-पदार्थोंका
स्वत्व है। अर्थात् अभिन्नमें स्वशब्दका प्रयोग होता है। यद्यपि
सामान्यत अभिन्न कहनेमे भी अतिप्रसङ्गदोषसे छुटकारा नहीं हो पाता
है, फिर भी विशेषरूपसे यों कहा जायगा कि जब उसीके द्वारा उसीका
अनुभव होता है, तब अनुभवित्रा और अनुभूयमानके अभिन्न होनेसे
उस अनुभवित्राके लिये वह अनुभूयमान पदार्थ 'स्व' कहा जायगा तथा
उसमें 'अहं' की प्रतीति होगी । यही कारण है कि घट आदि कभी भी
अनन्यसे अर्थात् अपने आप अनुभूयमान नहीं होते, इसीलिये कभी भी
वे अह-प्रतीतिके आस्पद ( विषय ) नहीं होते हैं—तो इस प्रकार तुम्हारे
मतमे भी शरीरादिमें अहंप्रत्यय आरोपात्मक ही है, वास्तविक नहीं ।
क्योंकि घटादिके समान शरीरादिका भी अनुभवित्रा दूसरा ही है, स्वयं
शरीर नहीं है। इसलिये अह-प्रतीतिका विषय शरीर आदि को
कहना असङ्गत है ।

अनुपलम्भवादः ३४१
बुद्धौ मुख्य एवेति चेन्न, तस्याः क्रियात्वेनानुभूयमानाया
भिन्नस्य कर्तुरहं छिनद्मीतिवत् अहं जानामीत्यनुभवात् । नीलादि-
प्रत्येतव्याकारवत् प्रतिपत्त्या¹कारोऽपि प्रतिपत्तेरेवायमात्मा तथा
भासत इति चेत्, तर्हि प्रत्येतव्यप्रतिपत्त्या¹कारयोस्तुल्ययोगक्षेम-
त्वात् सिद्धं नः समीहितम् ।
अस्तु स्वोपादानमात्रमिति चेन्न, तत्प्रतिभासने तदाकार-
स्यापि प्रतिभासप्रसङ्गात्, आकारमन्तरेणाकारिणोऽनवभासात् ।
यदि कहो कि—बुद्धिरूपविषयमें 'अहं' प्रत्यय मुख्य ही है।
अर्थात् 'अहं' प्रत्ययका विषय बुद्धि है, अतः अतिप्रसङ्गदोष भी नहीं
होगा—तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि बुद्धि तो छिदा आदिके
समान क्रियारूपमें ही अनुभूयमान होती है। इसलिये जैसे 'छिनद्मि'
इस व्यवहारमें छिदाक्रियासे भिन्न कर्त्ताका अनुभव होता है, वैसे ही
“जानामि” इस व्यवहारमें भी ज्ञानक्रियासे भिन्न कर्त्ताका अनुभव होता
है, और वही ज्ञानका आधारभूत आत्मा है।
यदि कहो कि—जैसे, नीलादिरूप प्रत्येतव्यका आकार प्रतिपत्ति
(ज्ञान) का ही आत्मा है, उसी प्रकार प्रतिपत्ताका आकारभूत अहन्त्व
भी प्रतिपत्तिका ही आत्मा होता हुआ “जानामि” इति व्यवहारमें
भासित होता है—तब तो नीलादि प्रत्येतव्य-आकार और अहरूप प्रति-
पत्ता-आकार इन दोनोंका तुल्य योगक्षेम होनेसे हमारा अभीष्ट सिद्ध ही
हो गया। अर्थात् जैसे, नीलादि विषय प्रतीतिसे भिन्न है, वैसे ही
प्रतिपत्ता (आत्मा) भी प्रतीतिसे भिन्न ही प्रतीतिको आकार भासित
होता है, यह सिद्ध हो गया। नीलका प्रतीतिसे भिन्नत्व द्वितीय प्रकरणमें
सिद्ध किया जा चुका है।
यदि कहो कि—अहमाकार प्रतिपत्तिका उपादानकारणभूत जो
प्रतिपत्त्यन्तर है, वही अहरूपसे भासित होता है, अतिरिक्त आत्मा नहीं—
तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि उपादानभूत उस प्रतिपत्तिका भासित
होनेपर उसके नीलादि-आकारका भी अहं-प्रतीतिमें भान होने लगेगा।
१ प्रतिपत्त्राकार इति पाठ उचितः ।

३५२ आत्मतत्त्वविवेके
प्रवृत्तिसन्तानान्यो बुद्धिमन्तानः प्रतिपत्ता, वयं तमालयविज्ञान-
माचक्ष्मह इति चेत्, अस्तु तर्हि प्रवृत्तिविज्ञानोपादानमनादि-
निधनः प्रतिपत्ता । स किं सन्तन्यमानज्ञानरूपस्तद्विपरीतो चेति
चिन्ताऽवशिष्यते, निःशेषिता चासौ प्रागिति ॥
कः पुनरत्र न्यायः ? प्रतिसन्धानम् ॥
क्योंकि आकारको छोड़कर आकारीका भान नहीं होता है । अर्थात्
अहमाकार प्रतिपत्तिका उपादानकारणभूत प्रतिपत्त्यन्तर यदि नीलादि-
विज्ञान हो और वही अह प्रतीति मे भासित होता हो तो नीलादिविज्ञान-
के साथ साथ नीलादि-विषयका भी अहं-प्रतीतिमे नियमत उल्लेख होना
चाहिये ।
यदि कहो कि—नीलादिविज्ञान प्रवृत्तिविज्ञान है, अतः प्रवृत्ति-
विज्ञानकी धारासे भिन्न जो विज्ञानधारा है, वही अहं-प्रत्ययका उपा-
दानकारण है तथा वही 'प्रतिपत्ताके रूपमें अह-प्रतीतिमे भासित होता
है । उस विज्ञानधाराको हम आलयविज्ञानकी धारा कहते हैं । एव
उस आलयविज्ञानका आकार अहन्त्वमात्र होनेसे अह-प्रतीतिमे नीला-
कारका भानप्रसङ्ग नहीं होगा—तो जिस प्रकार प्रवृत्तिविज्ञान अनादि
अनन्त होता है, वैसे ही उसका उपादानकारणभूत आलयविज्ञानसन्तान
भी अनादि अनन्त ही होगा । ऐसी स्थितिमें वह आलयविज्ञानका
सन्तान (धारा) सन्तन्यमान-विज्ञानरूप होगा या उससे भिन्न
होगा ? यह चिन्ता शेष रह जाती है और उसे भी क्षणभङ्गका
निराकरण करते समय प्रथम प्रकरणमें ही दूर कर चुका हूँ । अर्थात्
आत्माका ज्ञानरूपत्व और क्षणिकत्व खण्डित किया जा चुका है, इसी
लिये सन्तन्यमान ज्ञानसे अतिरिक्त अनादि-अनन्त स्थिर आत्माकी सिद्धि
हो जाती है ॥
आत्मसिद्धिमे अनुमानप्रमाण
( प्रश्न )—क्षणभङ्ग सिद्ध हो या नहीं, स्थिर आत्माकी सिद्धिमें
अनुमान क्या है ?
( उत्तर )—प्रतिसन्धान ( प्रत्यभिज्ञा ) ही वह अनुमान प्रमाण है,

अनुपलब्धवादः ३४३
तथ्यमिदमित्यसिद्धमतथ्यञ्च विरुद्धम्, अविशिष्टमनेकान्ति-
कमिति चेन्न, हेत्वर्थानवबोधात् । न हि प्रत्यभिज्ञानमात्रमत्र
विवक्षितम् । तत् किं कार्यकारणयोरेकसन्तानप्रतिनियमः ?
सोऽपि विरुद्ध इति चेत्, एषोऽपि न विवक्षितो नः । कस्तर्हि ?
जिसके द्वारा स्थिर आत्माकी सिद्धि होती है। अर्थात् प्रतिसन्धान भी
यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण ही है, फिर भी उसका प्रयोग अनुमानकी छायासे
ही करना चाहिये । जैसे, 'योऽहं रूपमद्राक्षं स एवाहमधुना स्पृशामि"
इस अहम्प्रतीतिका विषय कोई स्थिर आत्मा है, क्योंकि पूर्वकाल और
परकालमे "अहम्" यह प्रत्यभिज्ञा होती है। जिस प्रकार "वही यह
घट है, जिसे कल देखा था" इस प्रत्यभिज्ञाका विषय घट स्थिर होता
है। इस प्रकार प्रत्यभिज्ञारूप हेतुसे अनुमानद्वारा भी स्थिर आत्माकी
सिद्धि हो जाती है।
यदि यह कहो कि-तथ्य (प्रमात्मक) प्रत्यभिज्ञाको हेतु माना
जाय तो यह स्वरूपासिद्ध होगा । क्योंकि क्षणिकविज्ञानको आत्मा
मानने वालेकी दृष्टिमें आत्माविषयक उक्त प्रतिसन्धान (प्रत्यभिज्ञा)
तथ्य नहीं है। कारण, उक्त प्रतिसन्धानद्वारा आत्माका स्थिरत्व प्रति-
पादित हो जाता है, जो उसे अमान्य है। यदि उक्त प्रतिसन्धान अतथ्य
हो तो यह विरुद्ध हेतु होगा। कारण, जो प्रतिसन्धान स्वयं अतथ्य
(भ्रम) है, उससे स्थिर आत्मा कैसे सिद्ध होगा ? यदि उक्त प्रति-
सन्धान न यथार्थ हो और न भ्रम ही हो, किन्तु अविशिष्ट अर्थात् भ्रम-
प्रमा उभय साधारण हो तो वह व्यभिचारी हेतु होगा। अर्थात् जैसे,
"सैवेयं दीपकलिका" यह प्रत्यभिज्ञा क्षण क्षणमे परिवर्तनशील
दीपज्वालाके स्थिरत्वमे प्रमाण नहीं होती है, वैसे ही उक्त प्रत्यभिज्ञा भी
आत्माके स्थिरत्वमे प्रमाण नहीं हो सकती है-तो ऐसा नहीं कह
सकते । क्योंकि तुम हमारे प्रत्यभिज्ञारूप हेतुका अर्थ नहीं समझ सके
हो। कारण, यहा हेतुके रूपमे प्रत्यभिज्ञानमात्र नहीं विवक्षित है
किन्तु "योह रूपमुपलब्धवान सोऽह स्पृशामि" इन पूर्वापर प्रतीतियोँका
एक सन्तान (धारा) गत होना ही विवक्षित है। अर्थात् इससे एक-
धारावाही स्थिर वस्तुका नियमत रहना सूचित होता है।
यदि कहो कि-यह भी हेतु विरुद्ध ही है। अर्थात् पूर्व प्रतीतिसे पर-

३३४ आत्मतत्त्वविवेके
पूर्वोपधियामेककर्त्तृतया विनिश्चयः। एषोऽपि तासामुपादानोपा-
देयभावेनाप्युपपद्यत इति चेन्न, स्थैर्य्यस्थितौ तदभावात्। क्षणि-
कत्वेऽपि नैकजातीयत्वे सति तदुत्पत्तिरेवोपादानोपादेयभावः,
शिष्याचार्य्यधियामपि तथाभावप्रसङ्गात्।
भेदाग्रहे सतीति चेन्न, प्रकृतेऽपि तदभावात्। शरीरभेदाग्रह-
प्रतीति नियत भिन्न होती है। इसलिये पूर्व्वापर प्रतीतियोंके सन्तानसे
भी एक अभिन्न स्थिर आत्मा सिद्ध नहीं हो सकता है—तो यह भी मेरा
विवक्षित नहीं है। किन्तु “योऽहं रूपमद्राक्षं सोऽहं स्पृशामि, योऽहं
घटमन्वभवं सोऽहं स्मरामि” इत्यादि व्यवहारोंमें पूर्व्वापर प्रतीतियोंका
एककर्त्तृत्व निश्चय ही स्थिर आत्माकी सिद्धिमें हेतु है। अर्थात् उक्त
पूर्वापर प्रतीतियोंका विषय एक स्थिर आत्मा है, क्योंकि उनका अनेक
कर्ता नहीं होनेसे एक ही कर्त्ता निश्चित होता है। कारण, चैत्रके
अनुभवसे मैत्रको कदापि स्मरण नहीं होता।
यदि कहो कि—यह भी उन प्रतीतियोंमें परस्पर उपादानोपादेयभाव
होनेसे भी बन सकता है। अर्थात् पूर्व्वापर ज्ञानोंमें जो एककर्तृकत्वका
निश्चय होता है वह इसलिये भी हो सकता है कि उत्तरज्ञानके प्रति
पूर्वज्ञान नियत उपादानकारण होता है। इसलिये पूर्वापर ज्ञानोंका
आश्रयभूत एकस्थिर आत्माकी कल्पना करना व्यर्थ है—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि भावोंका स्थिरत्व सिद्ध किया जा चुका है।
अत स्थिर-पक्षमें पूर्वज्ञान उत्तरज्ञानका उपादान कारण नहीं हो सकता
है, बल्कि स्थिर आत्मा ही पूर्वापरज्ञानोंका उपादान होगा। क्षणिकवादमें
भी यह नहीं कहा जा सकता कि 'सजातीयसे सजातीयकी उत्पत्तिका
होना ही उपादानोपादेयभाव है' क्योंकि तब शिष्य और आचार्यके
ज्ञानोंमें भी उपादानोपादेयभाव होने लगेगा। कारण, आचार्यके ज्ञानसे
शिष्यका ज्ञान उत्पन्न होता है और वह उसके सजातीय भी होता है।
यदि कहो कि—भेदाग्रहके साथ साथ सजातीयसे सजातीयकी
उत्पत्ति जहां होती है, वहीं उपादानोपादेयभाव होता है। शिष्याचार्य
में तो भेदका ग्रह होनेसे उनके ज्ञानोंमें साजात्य होनेपर भी उपादानोपा
देयभावका प्रसङ्ग नहीं होगा—तो यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि

अनुपलम्भवादः ३४५

स्तावदस्तीति चेन्न, भिन्नजन्मज्ञानाव्याप्तेः । अनुपलब्धपितृकेणा-
पि बालेनातिप्रसङ्गात्, घटकपालक्षणयोरतथाभावप्रसङ्गाच्च ।
एकाधारतया नियम¹ इति चेन्न, तस्य वास्तवस्य क्षणिकत्वपक्षे-

पूर्वापर प्रतीतियोंमें भी भेदका अग्रह नहीं रहता किन्तु भेदका ग्रह ही
रहता है। इसलिए उनमें भी आपका अभिमत उपादानोपादेयभाव
नहीं बन सकेगा। यदि कहो कि—बुद्धि सन्तानमे भी शरीरभेदका तो
अग्रह है ही। अर्थात् बुद्धियोंमे भेदग्रह होनेपर भी उपाधिभूत शरीर
तो अभिन्न ही रहता है। अत पूर्वापर प्रतीतियोंमे उपादानोपादेयभाव
होनेमे कोई आपत्ति नहीं है। शिष्याचार्यमे ऐसी बात नहीं है, क्योंकि
वहा उपाधिभूत शरीर भिन्न भिन्न हैं, अत उनकी बुद्धियोंमे उपादानो-
पादेयभावका प्रसङ्ग नहीं हो सकेगा—तो यह भी नहीं कह सकते हो।
क्योंकि भिन्न जन्मकी ज्ञानधारामे उपादानोपादेयभावकी अव्याप्ति हो
जायगी। अर्थात् जातिस्मरताके अनुरोधसे अन्य जन्मकी ज्ञानसन्ततिमें
भी तुम उपादानोपादेयभाव मानते हो किन्तु वहा पूर्वजन्मके शरीरका
इस जन्मके शरीरके साथ भेदका ग्रह होनेसे उन बुद्धियोंमे उपादानो-
पादेयभाव नहीं हो सकेगा।
एव, जिस बालकने पिताका प्रत्यक्ष नहीं हुआ है, वहा पिता-पुत्रके
शरीरोंमे भेदका अग्रह सुतरा सिद्ध है। फिर भी पिता पुत्रके ज्ञानोंमें
उपादानोपादेयभाव नहीं होता है, किन्तु तुम्हारे नियमानुसार शरीरमे
भेदरा अग्रह रहनेसे वहाँ भी उपादानोपादेयभाव होने लगेगा। यदि
वहाँ उपादानोपादेयभाव इष्ट मानो तो पिताके अनुभवसे पुत्रको स्मरण
होने लगेगा। एव, सजातीयमें ही उपाद्योपादेयभाव माननेपर घट
और कपालमें साजात्य नहीं होनेसे वहा उपादानोपादेयभावकी अव्याप्ति
भी हो जायगी।
यदि कहो कि—एकाधारताके साथ साथ जहा कार्यकारणभाव हो,
वहीं उपादानोपादेयभावका नियम है। इसके अनुसार घट कपालका
तथा अपनी बुद्धिधाराका एक आधार होते हुए कार्यकारणभाव होनेसे
उनमे तो उपादानोपादेयभाव होगा। किन्तु शिष्याचार्य एव पिता पुत्रकी


१ तथा नियम इति २ पु० पा०

ऽपि विषमसमयानां क्षणानामभावात्, काल्पनिकश्चेत्त्वतिप्रसञ्ज-
कत्वात्, शरीरबुद्ध्योरपि समानदेशताभिमानात् । एतेन—
“अश्रान्तमसत्तैकावमायः प्रकृतिविक्रिये ।
ततौ हेतुफलस्योपादानोपादेयलक्षणम् ॥”
इति निरस्तम् ।
बुद्धियोंका एक आधार नहीं होनेसे उनमें उपादानोपादेयभावका प्रसङ्ग
नहीं हो सकेगा—तो यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि क्षणिकवादमें
असमानकालिक वस्तुओंका वास्तविक एक आधार नहीं हो सकता ।
अर्थात् घट कपालमें देशकृत एकाधारता नहीं हो सकती तथा कालकृत
भी एकाधारता नहीं हो सकती है । क्योंकि तुम्हारे मतमें देशकालके
क्षणिक होनेसे घट कालमें कपालका देश और काल दोनों ही नष्ट हो
गया रहेगा । ऐसी स्थितिमें दैशिक और कालिक दोनों प्रकारकी
एकाधारता नहीं होनेसे घट कपालमें भी उपादानोपादेयभाव नहीं बन
सकेगा ।
यदि घटकपालमे काल्पनिक एकाधारता मानो तो अतिप्रसङ्गदोष
हो जायगा । अर्थात् तन्तु घट और कपाल पटमें भी कदाचित् एका-
धारताका भ्रम हो सकनेसे तन्तु और घटमे तथा कपाल और पटमें भी
उपादानोपादेयभाव होने लगेगा । इसी प्रकार शरीर और बुद्धिमे
भी एकदेशताका भ्रम होनेसे शरीर बुद्धिमें भी उपादानोपादेयभाव
होने लगेगा । क्योंकि शरीरके अवयवमें शरीर और बुद्धि दोनोंके
आश्रित होनेका भ्रम हो सकता है ।
उक्त दोषके कारण यह कथन भी खण्डित हो गया कि—कारण
और कार्यकी सन्ततिमें ( परम्परामें ) दो प्रकारका उपादानोपादेयभाव
होता है । प्रथम, कारण और कार्यमे समानताके कारण अभ्रमात्मक
एकाकारताकी प्रतीति और दूसरा, प्रकृति विकृतिभाव । अर्थात् जहाँ
प्रकृति विकृतिभाव होता है वहा कारण कार्यमें उपादानोपादेयभाव होता
है । जैसे, काष्ठ और अङ्गारमें । एव, समानरूपसे होनेवाली भ्रम
रहित नीलाद्याकार बुद्धिकी सन्तति ( धारा ) में भी उपादानोपादेयभाव
होता है—क्योंकि घट कपालमें एकाकारताकी प्रतीति नहीं होनेसे तथा