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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 530 में से

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पृष्ठ 387

३३८ आत्मतत्त्वविवेके

अनादिवासनावशादनादिरयमवस्तुको विकल्प इत्यपि न
युक्तम्, नीलादिविकल्पसाधारण्यात् । इह वासनामुपादा-
यानाश्वासे प्रमाणान्तरेऽपि कः समाश्वासो यतो नीलादि-
विकल्पेषु समाश्वासः स्यात् ।
तस्माद् वासनामात्रवादं विहायागन्तुकमपि किञ्चित्
कारणं वाच्यम्, तच्चाप्तानाप्तशब्दौ वा लिङ्गतदाभासौ वा
प्रत्यक्षतदाभासौ वेति । तत्र यथा प्रथममध्यमप्रकाराभावा-
न्नीलविकल्पश्चरमं कल्पमालम्बते, तथाऽहमिति विकल्पोऽपि ।

उसके लिये मूलभूत अनुभवकी अपेक्षा है। किन्तु अनादिवासनाके
कारण होनेवाला "अहम्" यह विकल्प अनादि है और वस्तुशून्य है—
तो यह कथन भी युक्त नहीं है। क्योंकि अनादि वासनाको मानकर
यदि 'अहम्' प्रतीतिको वस्तुशून्य और अविश्वसनीय माना जाय तो और
प्रमाणोंका भी क्या विश्वास कि उनके द्वारा होनेवाली नीलादि-प्रतीतियों
पर विश्वास किया जा सके। अर्थात् प्राणीमात्रको होने वाली "अहम्"
इस प्रत्यक्ष प्रतीतिको अविश्वसनीय माननेपर नीलादिविषयक सभी
प्रतीतियाँ अविश्वसनीय हो जायेंगी और हमारा सम्पूर्ण व्यवहार लुप्त
हो जायगा।
इसलिये "उक्त प्रतीतियोंका कारण वासनामात्र है" इस बातको
छोड़कर कुछ आगन्तुक भी कारण मानना होगा। और वह आगन्तुक
कारण आप्त और अनाप्त शब्द हो या लिङ्ग और लिङ्गाभास हो अथवा
प्रत्यक्ष और प्रत्यक्षाभास हो। इन आगन्तुक कारणोंमें जैसे प्रथम
और द्वितीय प्रकारोंको छोड़कर नीलादि-प्रतीतिका आधार प्रत्यक्ष और
प्रत्यक्षाभासरूप अन्तिम प्रकार है, वैसे ही "अहम्" प्रतीतिका भी
आधार निर्विकल्पात्मक प्रत्यक्ष या प्रत्यक्षाभास होगा। इन दोनोंमें भी
यदि "अहम्" प्रतीतिको निर्विकल्पक प्रत्यक्षके अव्यवहित उत्तरकालमें
उत्पन्न माना जाय तो उस निर्विकल्पके समान ही "अहम्" यह
सविकल्पक प्रतीति भी साक्षात् ही सवस्तुक सिद्ध हो जाती है। यदि
तो "अहम्" प्रतीतिका मूल निर्विकल्पक प्रत्यक्षको न मानकर प्रत्यक्षा-