आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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बुद्धितत्समुदायालम्बनत्वेऽतिप्रसङ्गात् स्वसम्बन्धिशरीरादायं
स्यादिति वाच्यम्, तत्र कः स्वार्थ इति वचनीयम् । अन-
न्यत्वं स्वत्वं सर्वभावानाम्, तथा च यदा तेनैव तदनुभूयते
तदा प्रत्येतुः प्रत्येतव्याद्व्यतिरेकादहमिति स्यात् । अतएव
घटादयो न कदाचिदनन्यानुभवितृका इति न कदाप्यहमास्पद-
मिति चेत्, एवन्तर्हि त्वन्मतेऽप्यहंप्रत्ययः शरीरादावारोपरूप एव,
ततः प्रत्येतुरन्यत्वात् ।
के शरीरादिके लिये भी "अहं गौर- काणः" आदि प्रतीति होने लगेगी ।
अतः इस दोषसे बचनेके लिये स्वसम्बन्धी जो शरीरादि, उसे ही इस
'अहम्' प्रत्ययका विषय कहना होगा । अत उसमे स्वशब्दका क्या अर्थ
है?—यह कहना चाहिये । अर्थात् वहां स्वशब्दका अर्थ आत्मा ही
कहना होगा । इसलिए जिस आत्मा का जो शरीर सम्बन्धी होगा,
उस आत्माको उस शरीरमें "अहं गौरः" यह प्रतीति होगी । इस प्रकार
शरीरसे अतिरिक्त आत्माकी सिद्धि हो गयी ।
यदि कहो कि—अनन्य ( अभिन्न ) होना ही सभी भाव-पदार्थोंका
स्वत्व है। अर्थात् अभिन्नमें स्वशब्दका प्रयोग होता है। यद्यपि
सामान्यत अभिन्न कहनेमे भी अतिप्रसङ्गदोषसे छुटकारा नहीं हो पाता
है, फिर भी विशेषरूपसे यों कहा जायगा कि जब उसीके द्वारा उसीका
अनुभव होता है, तब अनुभवित्रा और अनुभूयमानके अभिन्न होनेसे
उस अनुभवित्राके लिये वह अनुभूयमान पदार्थ 'स्व' कहा जायगा तथा
उसमें 'अहं' की प्रतीति होगी । यही कारण है कि घट आदि कभी भी
अनन्यसे अर्थात् अपने आप अनुभूयमान नहीं होते, इसीलिये कभी भी
वे अह-प्रतीतिके आस्पद ( विषय ) नहीं होते हैं—तो इस प्रकार तुम्हारे
मतमे भी शरीरादिमें अहंप्रत्यय आरोपात्मक ही है, वास्तविक नहीं ।
क्योंकि घटादिके समान शरीरादिका भी अनुभवित्रा दूसरा ही है, स्वयं
शरीर नहीं है। इसलिये अह-प्रतीतिका विषय शरीर आदि को
कहना असङ्गत है ।