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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 530 में से

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पृष्ठ 388

अनुपलब्धवादः ३३९
तत्रायं प्रत्यक्षपृष्ठभावित्वे साक्षादेव सवस्तुकः, तदाभासे तु
मूलेऽस्य पारम्पर्यात् सवस्तुतेति ।
न च बाह्यप्रत्यक्षनिवृत्तावेव निर्मूलत्वम् , बुद्धिविकल्प-
स्यापि तथात्वप्रसङ्गात् । तत्र स्वसंवेदनं मूलमिहापि मानस-
प्रत्यक्षमिवि न कश्चिद् विशेषः ।
शरीरादिवस्तुको भविष्यतीति चेन्न, निरूपाधिशरीरेन्द्रिय-
भासको माना जाय तो भी परम्परा "अहम्" प्रतीति सवस्तुक सिद्ध हो
जाती है । क्योंकि किसी भी भ्रमात्मक ज्ञानके मूलमें प्रमात्मक ज्ञान
भी अवश्य होता है । जैसे, मिथ्यासर्पका ज्ञान तभी होता है, जबकि
वास्तविक सर्पज्ञान भी कहीं है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—यदि आत्मा होता तो नीलादिके समान
बहिरिन्द्रियोंके द्वारा जाना जाता । किन्तु आत्मविषयक बाह्यप्रत्यक्षकी
निवृत्ति होनेसे ही यह समझा जाता है कि "अहम्" यह विकल्प सर्वथा
निर्मूल है । अर्थात् परम्परा भी कोई निर्विकल्पकज्ञान इसका मूल
नहीं है । अतः मूलभूत निर्विकल्पकके अभावमे 'अहम्' प्रतीति वस्तुशू-न्य
है—क्योंकि आपका बुद्धि-विकल्प ( बुद्धिकी प्रतीति ) भी तब निर्मूल
हो जायगा और बुद्धिकी भी सत्ता नहीं सिद्ध हो सकेगी । कारण,
उसका भी बाह्य-प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
यदि कहो कि—बुद्धि स्वप्रकाश है, इसलिये अपनी सत्तामें वह
स्वयं प्रमाण है । आत्मा तो जड़ होनेसे अपनी सत्तामें अपने आप
प्रमाण नहीं हो सकता, अतः बुद्धि-प्रतीतिका मूल है उसका स्वप्रकाश
होना—तो "अहम्" प्रतीतिका भी मूल आत्माका मानस-प्रत्यक्ष ही है ।
इस प्रकार दोनोंके समूल होनेमें कोई अन्तर नहीं है । अर्थात् आत्मा-
की सत्तामें मानस प्रत्यक्ष ही प्रमाण है ।
यदि कहो कि—'अहम्' प्रतीतिका विषय शरीर आदि होगा न कि
अतिरिक्त चेतन आत्मा—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि बिना किसी
उपाधि ( विशेषण ) के शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि या इनका समुदाय यदि
"अहम्" प्रतीतिका विषय हो तो अतिव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् दूसरे