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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 530 में से

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पृष्ठ 395

ऽपि विषमसमयानां क्षणानामभावात्, काल्पनिकश्चेत्त्वतिप्रसञ्ज-
कत्वात्, शरीरबुद्ध्योरपि समानदेशताभिमानात् । एतेन—
“अश्रान्तमसत्तैकावमायः प्रकृतिविक्रिये ।
ततौ हेतुफलस्योपादानोपादेयलक्षणम् ॥”
इति निरस्तम् ।
बुद्धियोंका एक आधार नहीं होनेसे उनमें उपादानोपादेयभावका प्रसङ्ग
नहीं हो सकेगा—तो यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि क्षणिकवादमें
असमानकालिक वस्तुओंका वास्तविक एक आधार नहीं हो सकता ।
अर्थात् घट कपालमें देशकृत एकाधारता नहीं हो सकती तथा कालकृत
भी एकाधारता नहीं हो सकती है । क्योंकि तुम्हारे मतमें देशकालके
क्षणिक होनेसे घट कालमें कपालका देश और काल दोनों ही नष्ट हो
गया रहेगा । ऐसी स्थितिमें दैशिक और कालिक दोनों प्रकारकी
एकाधारता नहीं होनेसे घट कपालमें भी उपादानोपादेयभाव नहीं बन
सकेगा ।
यदि घटकपालमे काल्पनिक एकाधारता मानो तो अतिप्रसङ्गदोष
हो जायगा । अर्थात् तन्तु घट और कपाल पटमें भी कदाचित् एका-
धारताका भ्रम हो सकनेसे तन्तु और घटमे तथा कपाल और पटमें भी
उपादानोपादेयभाव होने लगेगा । इसी प्रकार शरीर और बुद्धिमे
भी एकदेशताका भ्रम होनेसे शरीर बुद्धिमें भी उपादानोपादेयभाव
होने लगेगा । क्योंकि शरीरके अवयवमें शरीर और बुद्धि दोनोंके
आश्रित होनेका भ्रम हो सकता है ।
उक्त दोषके कारण यह कथन भी खण्डित हो गया कि—कारण
और कार्यकी सन्ततिमें ( परम्परामें ) दो प्रकारका उपादानोपादेयभाव
होता है । प्रथम, कारण और कार्यमे समानताके कारण अभ्रमात्मक
एकाकारताकी प्रतीति और दूसरा, प्रकृति विकृतिभाव । अर्थात् जहाँ
प्रकृति विकृतिभाव होता है वहा कारण कार्यमें उपादानोपादेयभाव होता
है । जैसे, काष्ठ और अङ्गारमें । एव, समानरूपसे होनेवाली भ्रम
रहित नीलाद्याकार बुद्धिकी सन्तति ( धारा ) में भी उपादानोपादेयभाव
होता है—क्योंकि घट कपालमें एकाकारताकी प्रतीति नहीं होनेसे तथा