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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 530 में से

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पृष्ठ 385

३३६ आत्मतत्त्वविवेके
सिद्धेरदोष इति चेन्न, स्वतन्त्रसाधनत्वात् । यदि परः सहसैव
नैवमभ्युपगच्छेत्, नूनं साधनमिदं मूच्र्छेत् । यदि च परो
दृष्टिमवधूय दृश्यं तमभ्युपगच्छेत्, एवमपि सम्भवेत् । न चैवं
शक्यम्, तस्य तदुपहितरूपत्वादिति संक्षेप । विस्तरस्त्व-
सन्तोऽक्षणिका इतिवदूहनीयम् ।
यदि कहो कि—नैयायिक आत्माको दृश्य मानते हैं इसलिये उनके
अभ्युपगमको लेकर दृश्यत्व विशेषण होनेसे कोई दोष नहीं है—तो यह
नहीं कह सकते । क्योंकि अनुमान एक स्वतन्त्र साधन है, अतः
दूसरेके अभ्युपगमके आधारपर उसकी प्रवृत्ति नहीं हुआ करती । तर्क
ही ऐसी वस्तु है, जो दूसरेके अभ्युपगमके आधार पर प्रवृत्त होता है ।
क्योंकि उसके द्वारा दूसरेके अभ्युपगममें अनिष्टका आपादान ( प्रसङ्ग )
किया जाता है । इसका कारण यह है कि यदि दूसरेके अभ्युपगमके
आधारपर अनुमान किया जाय तो कदाचित् वह दूसरा व्यक्ति वैसा
अभ्युपगम ही न करे तो निश्चय ही यह हेतु मूच्छित हो जायगा, अर्थात्
स्वरूपासिद्ध हो जायगा ।
एव, यदि दूसरा ( नैयायिक ) दृष्टिके ( उपलब्धके ) अभावमें भी
आत्माको दृश्य माने तो "दृश्यत्वे सति अनुपलब्धे" इस हेतुको
नैयायिकके अभ्युपगमके आधारपर ही सिद्ध मानकर उक्त अनुमान
संभव होता । किन्तु नैयायिक भी दृष्टि ( उपलब्धि ) के अभावमें अर्थात्
अनुपलब्धिकी दशामें तो आत्माको दृश्य मान ही नहीं सकता है ।
क्योंकि दृश्य वही है जो दृष्टिसे उपहित हो । अर्थात् जिसका दर्शन
( उपलम्भ ) होगा, वही दृश्य कहा जा सकता है । इसलिये यदि आत्मा
दृश्य होगा तो उसकी अनुपलब्धि नहीं हो सकती और यदि अनुपलब्धि
होगी तो उसमें दृश्यत्व विशेषण नहीं सिद्ध हो सकता । इस प्रकार
' दृश्यत्वे सति अनुपलब्धे ' यह हेतु सर्वथा असिद्ध है । यह संक्षेपमें
कहा गया । विशेष विस्तारको तो पूर्वमें कहे गये ' जो क्षणिक नहीं है
अर्थात् स्थिर है, वह असत् है" इस अनुमानके समान ही स्वयं समझ
लेना चाहिये । अर्थात् जिस प्रकार वहां कहा गया है कि 'यदि स्थिर-
वस्तुरूप पक्ष सिद्ध है, तो उसमें असत्त्व साध्यका बाध हो जायगा,