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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 391

३५२ आत्मतत्त्वविवेके
प्रवृत्तिसन्तानान्यो बुद्धिमन्तानः प्रतिपत्ता, वयं तमालयविज्ञान-
माचक्ष्मह इति चेत्, अस्तु तर्हि प्रवृत्तिविज्ञानोपादानमनादि-
निधनः प्रतिपत्ता । स किं सन्तन्यमानज्ञानरूपस्तद्विपरीतो चेति
चिन्ताऽवशिष्यते, निःशेषिता चासौ प्रागिति ॥
कः पुनरत्र न्यायः ? प्रतिसन्धानम् ॥
क्योंकि आकारको छोड़कर आकारीका भान नहीं होता है । अर्थात्
अहमाकार प्रतिपत्तिका उपादानकारणभूत प्रतिपत्त्यन्तर यदि नीलादि-
विज्ञान हो और वही अह प्रतीति मे भासित होता हो तो नीलादिविज्ञान-
के साथ साथ नीलादि-विषयका भी अहं-प्रतीतिमे नियमत उल्लेख होना
चाहिये ।
यदि कहो कि—नीलादिविज्ञान प्रवृत्तिविज्ञान है, अतः प्रवृत्ति-
विज्ञानकी धारासे भिन्न जो विज्ञानधारा है, वही अहं-प्रत्ययका उपा-
दानकारण है तथा वही 'प्रतिपत्ताके रूपमें अह-प्रतीतिमे भासित होता
है । उस विज्ञानधाराको हम आलयविज्ञानकी धारा कहते हैं । एव
उस आलयविज्ञानका आकार अहन्त्वमात्र होनेसे अह-प्रतीतिमे नीला-
कारका भानप्रसङ्ग नहीं होगा—तो जिस प्रकार प्रवृत्तिविज्ञान अनादि
अनन्त होता है, वैसे ही उसका उपादानकारणभूत आलयविज्ञानसन्तान
भी अनादि अनन्त ही होगा । ऐसी स्थितिमें वह आलयविज्ञानका
सन्तान (धारा) सन्तन्यमान-विज्ञानरूप होगा या उससे भिन्न
होगा ? यह चिन्ता शेष रह जाती है और उसे भी क्षणभङ्गका
निराकरण करते समय प्रथम प्रकरणमें ही दूर कर चुका हूँ । अर्थात्
आत्माका ज्ञानरूपत्व और क्षणिकत्व खण्डित किया जा चुका है, इसी
लिये सन्तन्यमान ज्ञानसे अतिरिक्त अनादि-अनन्त स्थिर आत्माकी सिद्धि
हो जाती है ॥
आत्मसिद्धिमे अनुमानप्रमाण
( प्रश्न )—क्षणभङ्ग सिद्ध हो या नहीं, स्थिर आत्माकी सिद्धिमें
अनुमान क्या है ?
( उत्तर )—प्रतिसन्धान ( प्रत्यभिज्ञा ) ही वह अनुमान प्रमाण है,