आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 390, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ३४१
बुद्धौ मुख्य एवेति चेन्न, तस्याः क्रियात्वेनानुभूयमानाया
भिन्नस्य कर्तुरहं छिनद्मीतिवत् अहं जानामीत्यनुभवात् । नीलादि-
प्रत्येतव्याकारवत् प्रतिपत्त्या¹कारोऽपि प्रतिपत्तेरेवायमात्मा तथा
भासत इति चेत्, तर्हि प्रत्येतव्यप्रतिपत्त्या¹कारयोस्तुल्ययोगक्षेम-
त्वात् सिद्धं नः समीहितम् ।
अस्तु स्वोपादानमात्रमिति चेन्न, तत्प्रतिभासने तदाकार-
स्यापि प्रतिभासप्रसङ्गात्, आकारमन्तरेणाकारिणोऽनवभासात् ।
यदि कहो कि—बुद्धिरूपविषयमें 'अहं' प्रत्यय मुख्य ही है।
अर्थात् 'अहं' प्रत्ययका विषय बुद्धि है, अतः अतिप्रसङ्गदोष भी नहीं
होगा—तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि बुद्धि तो छिदा आदिके
समान क्रियारूपमें ही अनुभूयमान होती है। इसलिये जैसे 'छिनद्मि'
इस व्यवहारमें छिदाक्रियासे भिन्न कर्त्ताका अनुभव होता है, वैसे ही
“जानामि” इस व्यवहारमें भी ज्ञानक्रियासे भिन्न कर्त्ताका अनुभव होता
है, और वही ज्ञानका आधारभूत आत्मा है।
यदि कहो कि—जैसे, नीलादिरूप प्रत्येतव्यका आकार प्रतिपत्ति
(ज्ञान) का ही आत्मा है, उसी प्रकार प्रतिपत्ताका आकारभूत अहन्त्व
भी प्रतिपत्तिका ही आत्मा होता हुआ “जानामि” इति व्यवहारमें
भासित होता है—तब तो नीलादि प्रत्येतव्य-आकार और अहरूप प्रति-
पत्ता-आकार इन दोनोंका तुल्य योगक्षेम होनेसे हमारा अभीष्ट सिद्ध ही
हो गया। अर्थात् जैसे, नीलादि विषय प्रतीतिसे भिन्न है, वैसे ही
प्रतिपत्ता (आत्मा) भी प्रतीतिसे भिन्न ही प्रतीतिको आकार भासित
होता है, यह सिद्ध हो गया। नीलका प्रतीतिसे भिन्नत्व द्वितीय प्रकरणमें
सिद्ध किया जा चुका है।
यदि कहो कि—अहमाकार प्रतिपत्तिका उपादानकारणभूत जो
प्रतिपत्त्यन्तर है, वही अहरूपसे भासित होता है, अतिरिक्त आत्मा नहीं—
तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि उपादानभूत उस प्रतिपत्तिका भासित
होनेपर उसके नीलादि-आकारका भी अहं-प्रतीतिमें भान होने लगेगा।
१ प्रतिपत्त्राकार इति पाठ उचितः ।