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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 530 में से

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पृष्ठ 393

३३४ आत्मतत्त्वविवेके
पूर्वोपधियामेककर्त्तृतया विनिश्चयः। एषोऽपि तासामुपादानोपा-
देयभावेनाप्युपपद्यत इति चेन्न, स्थैर्य्यस्थितौ तदभावात्। क्षणि-
कत्वेऽपि नैकजातीयत्वे सति तदुत्पत्तिरेवोपादानोपादेयभावः,
शिष्याचार्य्यधियामपि तथाभावप्रसङ्गात्।
भेदाग्रहे सतीति चेन्न, प्रकृतेऽपि तदभावात्। शरीरभेदाग्रह-
प्रतीति नियत भिन्न होती है। इसलिये पूर्व्वापर प्रतीतियोंके सन्तानसे
भी एक अभिन्न स्थिर आत्मा सिद्ध नहीं हो सकता है—तो यह भी मेरा
विवक्षित नहीं है। किन्तु “योऽहं रूपमद्राक्षं सोऽहं स्पृशामि, योऽहं
घटमन्वभवं सोऽहं स्मरामि” इत्यादि व्यवहारोंमें पूर्व्वापर प्रतीतियोंका
एककर्त्तृत्व निश्चय ही स्थिर आत्माकी सिद्धिमें हेतु है। अर्थात् उक्त
पूर्वापर प्रतीतियोंका विषय एक स्थिर आत्मा है, क्योंकि उनका अनेक
कर्ता नहीं होनेसे एक ही कर्त्ता निश्चित होता है। कारण, चैत्रके
अनुभवसे मैत्रको कदापि स्मरण नहीं होता।
यदि कहो कि—यह भी उन प्रतीतियोंमें परस्पर उपादानोपादेयभाव
होनेसे भी बन सकता है। अर्थात् पूर्व्वापर ज्ञानोंमें जो एककर्तृकत्वका
निश्चय होता है वह इसलिये भी हो सकता है कि उत्तरज्ञानके प्रति
पूर्वज्ञान नियत उपादानकारण होता है। इसलिये पूर्वापर ज्ञानोंका
आश्रयभूत एकस्थिर आत्माकी कल्पना करना व्यर्थ है—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि भावोंका स्थिरत्व सिद्ध किया जा चुका है।
अत स्थिर-पक्षमें पूर्वज्ञान उत्तरज्ञानका उपादान कारण नहीं हो सकता
है, बल्कि स्थिर आत्मा ही पूर्वापरज्ञानोंका उपादान होगा। क्षणिकवादमें
भी यह नहीं कहा जा सकता कि 'सजातीयसे सजातीयकी उत्पत्तिका
होना ही उपादानोपादेयभाव है' क्योंकि तब शिष्य और आचार्यके
ज्ञानोंमें भी उपादानोपादेयभाव होने लगेगा। कारण, आचार्यके ज्ञानसे
शिष्यका ज्ञान उत्पन्न होता है और वह उसके सजातीय भी होता है।
यदि कहो कि—भेदाग्रहके साथ साथ सजातीयसे सजातीयकी
उत्पत्ति जहां होती है, वहीं उपादानोपादेयभाव होता है। शिष्याचार्य
में तो भेदका ग्रह होनेसे उनके ज्ञानोंमें साजात्य होनेपर भी उपादानोपा
देयभावका प्रसङ्ग नहीं होगा—तो यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि