आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलब्धवादः ३३७
अथात्मसद्भावे किं प्रमाणम् ? प्रत्यक्षमेव तावत् , अह-
मिति विकल्पस्य प्राणभृन्मात्रसिद्धत्वात् । न चायमवस्तुकः
सन्दिग्धवस्तुको वा, अशाब्दत्वादप्रतिषेधाच्च । न च लैङ्गिकः,
अननुसंहितलिङ्गस्यापि स्वप्रत्ययात् । न च स्मृतिरियम् ,
अननुभूते तदनुपपत्तेः ।
यदि असिद्ध है तो आश्रयासिद्धि हो जायगी” वैसे ही यहाँ भी समझना
चाहिये कि “आत्मा नास्ति, अनुपलब्धेः” इस अनुमानमे आत्मारूप पक्ष
यदि सिद्ध है तो आत्माका अस्तित्व ही सिद्ध हो जाता है, इससे “नास्ति”
इस साध्यका बाध हो गया । यदि आत्मारूप पक्ष सिद्ध नहीं है तो पक्षके
असिद्ध होनेसे उक्त अनुमान ही नहीं हो सकेगा ॥
आत्माके सद्भावमें साधक प्रमाण
इसके बाद प्रश्न उठता है कि—आत्माके सद्भावमे पूर्वोक्त बाधक
भले ही न हो सके, किन्तु उसके सद्भावका (अस्तित्वका) साधक
प्रमाण क्या है ? अर्थात् आत्माके अस्तित्वमे प्रमाण नहीं होनेसे भी
नैरात्म्यवाद स्वतः सिद्ध हो जायगा—तो इसका उत्तर यही है कि
आत्माकी सत्तामे प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । क्योंकि “अहम्” ऐसा
सविकल्पक प्रत्यक्ष प्राणीमात्रको होता है, जिसमें विषयरूपमे आत्मा ही
भासित होता है । यह नहीं कह सकते कि—उक्त “अहम्” यह प्रतीति
वस्तुके बिना ही होती है, अथवा सन्दिग्ध वस्तु ही उसका विषय बनता
है—क्योंकि “अहम्” यह प्रतीति न तो शाब्द ही है और न तो आगे चल
कर कभी बाधित ही होती है, जिससे वह प्रतीति अवस्तुक हो या सन्दि-
ग्धवस्तुक हो । अर्थात् यदि अबाधित होनेपर भी “अहं-प्रत्यय” अवस्तुक
हो तो सभी नीलादि प्रत्यय अवस्तुक होने लगेंगे ।
“अहं-प्रत्यय” लैङ्गिक (अनुमान) भी नहीं है, क्योंकि लिङ्ग
(व्याप्य) का अनुसन्धान हुए बिना भी “अहम्” ऐसी अपनी प्रतीति
सबको हुआ करती है । अहम् प्रतीति स्मृतिरूप भी नहीं है, क्योंकि
पूर्वमे अनुभव हुए बिना स्मृति नहीं हो सकती है ।
यदि कहो कि—आधुनिक वासनाके प्रभावसे जो स्मृति होती है,
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