आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ३४५
स्तावदस्तीति चेन्न, भिन्नजन्मज्ञानाव्याप्तेः । अनुपलब्धपितृकेणा-
पि बालेनातिप्रसङ्गात्, घटकपालक्षणयोरतथाभावप्रसङ्गाच्च ।
एकाधारतया नियम¹ इति चेन्न, तस्य वास्तवस्य क्षणिकत्वपक्षे-
पूर्वापर प्रतीतियोंमें भी भेदका अग्रह नहीं रहता किन्तु भेदका ग्रह ही
रहता है। इसलिए उनमें भी आपका अभिमत उपादानोपादेयभाव
नहीं बन सकेगा। यदि कहो कि—बुद्धि सन्तानमे भी शरीरभेदका तो
अग्रह है ही। अर्थात् बुद्धियोंमे भेदग्रह होनेपर भी उपाधिभूत शरीर
तो अभिन्न ही रहता है। अत पूर्वापर प्रतीतियोंमे उपादानोपादेयभाव
होनेमे कोई आपत्ति नहीं है। शिष्याचार्यमे ऐसी बात नहीं है, क्योंकि
वहा उपाधिभूत शरीर भिन्न भिन्न हैं, अत उनकी बुद्धियोंमे उपादानो-
पादेयभावका प्रसङ्ग नहीं हो सकेगा—तो यह भी नहीं कह सकते हो।
क्योंकि भिन्न जन्मकी ज्ञानधारामे उपादानोपादेयभावकी अव्याप्ति हो
जायगी। अर्थात् जातिस्मरताके अनुरोधसे अन्य जन्मकी ज्ञानसन्ततिमें
भी तुम उपादानोपादेयभाव मानते हो किन्तु वहा पूर्वजन्मके शरीरका
इस जन्मके शरीरके साथ भेदका ग्रह होनेसे उन बुद्धियोंमे उपादानो-
पादेयभाव नहीं हो सकेगा।
एव, जिस बालकने पिताका प्रत्यक्ष नहीं हुआ है, वहा पिता-पुत्रके
शरीरोंमे भेदका अग्रह सुतरा सिद्ध है। फिर भी पिता पुत्रके ज्ञानोंमें
उपादानोपादेयभाव नहीं होता है, किन्तु तुम्हारे नियमानुसार शरीरमे
भेदरा अग्रह रहनेसे वहाँ भी उपादानोपादेयभाव होने लगेगा। यदि
वहाँ उपादानोपादेयभाव इष्ट मानो तो पिताके अनुभवसे पुत्रको स्मरण
होने लगेगा। एव, सजातीयमें ही उपाद्योपादेयभाव माननेपर घट
और कपालमें साजात्य नहीं होनेसे वहा उपादानोपादेयभावकी अव्याप्ति
भी हो जायगी।
यदि कहो कि—एकाधारताके साथ साथ जहा कार्यकारणभाव हो,
वहीं उपादानोपादेयभावका नियम है। इसके अनुसार घट कपालका
तथा अपनी बुद्धिधाराका एक आधार होते हुए कार्यकारणभाव होनेसे
उनमे तो उपादानोपादेयभाव होगा। किन्तु शिष्याचार्य एव पिता पुत्रकी
१ तथा नियम इति २ पु० पा०