सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० / सम्राट अशोक के अभिलेख
समाजः - 'पशुमित्राणां समूहे, समभ्यायाम्, हस्तिनि च।' (शब्द०)। पालि-
समज्ज, समज्जा। [सं.- $\sqrt{अज्}$ (हांकना)।]
• कतव्यो = किया जाना चाहिए। सं.- कर्तव्यः। पालि-कतब्बो।
• बहुकं = बहुत। ('बहु' से)। सं.- बहु (वंहुते इति)। 'प्रभूतं प्रचुरं
प्राज्यमदभ्रं बहुलं बहु' (अमर० ३.१०८०)।
• हि = क्योंकि। (वाक्य के आरंभ में इसका प्रयोग वर्जित है)। 'हि
हेताववधारणे' (अमर० ३.१४३१)।
• दोसं = दोष। सं.- दोषः (दूष्यते इति दूषणम् अथवा दुष्यत्यनेनेति
पापम्)। 'दोष आर्त्तितवौ मतः' (हाला०-१९८)। 'दोषः दूषणे पापे च'
(शब्द०)।
• समाजम्हि = समाज में।
• पसति = देखता है। सं.- पश्यति। पालि-पस्सति।
• अस्ति = (इस प्रकरण में) 'हैं' (अन्यथा 'है')।
• पि = भी। सं.- अपि। पालि-पि।
• एकुचा = कोई-कोई। पालि-एकच्चे।
• साधुमत्ता = अनिन्द्य माने गये। सं.- साधु (साध्नोति परकार्यमिति)
'साध्वनिन्दिते' (त्रिकाण्ड० ५२०)। 'मतं तु संमतेऽभिहिते' (अनेकार्थ०
२.१९८)।
• पुरा = पूर्व काल में। सं.- पुरा (पुरति अग्रे गच्छतीति)।
• महानसम्हि = पाकशाला में। सं.- महानसम् (महत्त्वं तदनश्वरीतीति
'महदनः। पाकस्थानम्।' (शब्द०) (महत्-महति पूज्येऽसन्निविते)। (महता
मंहनीयो भवतीति-नि० ३.१३)। 'सूदशाला रसवती पाकस्थानं महानसम्'
(अभिधान० १९८)।
• अनुदिवसं = प्रतिदिन। सं.- दिवसः (दीव्यत्यत्रेति)।
• बहूनि = बहुत से। सं.- बहु (प्रभवतिती सतः-नि० ३.१३)। 'प्रभूतं
प्रचुरं प्राज्यमदभ्रं बहुलं बहु' (अमर० ३.१०८०)।
• पाणसतसहसानि = सैकड़ों-हजारों प्राणी। सं.- शतं (शतं दशदशतः-
नि० ३.१०)। सं.- सहस्रं (सहस्रं सहदन्-नि० ३.१०)। 'प्राणात्तु जीवितेन्द्रियं'
(अनेकार्थ० २.१६३)। 'दशशतसंख्यायां, बहुसंख्यायां, तरुसख्यान्विते च'
(शब्द०)
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ७१
• आरभिंसु = मारे जाते थे। (आ-$\sqrt{रभ्}$ से लुङ् लकार में। कर्मवाच्य,
प्रथम पुरुष, बहुवचन)।
• सूपथाय = सूप के लिए। सं.- सूपः (सुखेन पीयते)।
• ते = परंतु। सं.- तुद्।
• अज = अब। सं.- अद्य। (अस्मिन्नहनि इदंशब्दस्य निपातः सप्तम्यर्थे)
(शब्द०)। पालि - अज्ज।
• ती = तीन। सं.- त्रि।
• पाणा = प्राणी।
• आरभरे = मारे जाते हैं।
• द्वे = दो। सं.- द्वौ।
• मोरा = मोर। सं.- मयूरः (मयूरिव रौति शब्दायते इति। यद्वा मिनाति
हन्ति सर्पानिती1) 'छत्रमांसी मयूरस्तु' (त्रिकाण्ड० २.२८७)।
• एको = एक। सं.- एक (एक इता सङ्ख्या-नि० ३.१०)। Persian yak.
• मगो = मृग। सं.- मृगः (मार्गयन्तिकर्मिणः-नि० १.२०)। (मृग्यते
अन्वेष्यति तृणादिकम्। यद्वा मृग्यते अन्विष्यतेऽसौ व्याधैः)। मृगः कुरङ्गः
सारङ्गो वातायुर्हरिणोऽपि (अभिधान० ४.१२९३)। 'पशु'-मात्र को भी 'मृग'
कहते हैं, देखिए अमर० ३.११९३) - 'पशवोऽपि मृगाः' (३.११९३)।
• धुवो = निश्चित। सं.- ध्रुव (ध्रु गतियेर्थे। यद्वा ध्रुवति स्थिरीभवतीति।)
'ध्रुवो निश्चितनित्ययोः' (शब्दरत्न० III.२०)।
• पछा = पीछे, उत्तर काल में। वैदिक रूप-पश्चा, पश्चात्। 'पश्चात्ततीच्यां
चरमे' (अनेकार्थ० १७९२)। पालि-पच्छा।
• आरभिंसरे = मारे जायेंगे।
गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख
• सर्वत = सर्वत्र। सब स्थानों पर।
• विजितम्हि = राज्य में।
• एवमपि = इसी प्रकार।
• प्रचंतेसु = सीमा से सटे हुए पड़ोसी राज्यों में। सं.- प्रत्यन्तेषु। 'प्रत्यन्तो
म्लेच्छदेशः' (अमर० २८७) म्लेच्छदेशे।