सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
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६० / सम्राट अशोक के अभिलेख
३१. एस हि धंमपदाने धंमपटीपति च या इयं दया दाने सचे सोचवे मदवे साधवे च लोकस हेव वढिसति ति
३२. देवानंपिये प.....स लाजा हेव आहा
३३. यानि हि कानिचि ममिया साधवानि कटानि तं लोके अनूपटीपने तं च अनुविधीयंति
३४. तेन वढिता च वढिसति च मातापितिसु सुसुसाया गुरुसु सुसुसाया वयोमहालकानं अनुपटीपतीया बाभनसमनेसु कपनवलकेसु आव दासभटकसु संपटीपतीया
३५. देवानंपिय.... यदति लाजा हेव आहा
३६. मुनिसानं चु या इयं धंमवढि वढिता दुवीहि येव आकालेहि धंमनियमेन च निझतिया च
३७. तत चु लघु से धंमनियमे निझतिया व भूये
३८. धंमनियमे चु खो एस ये मे इयं कटे इमानि च इमानि जातानि अवधियानि
३९. अंनानि पि चु बहुक.... धंमनियमानि यानि मे कटानि
४०. निझतिया व चु भूये मुनिसानं धंमवढि वढिता अविहिंसाये भूतानं अनालंभाये पानानं
४१. से एताये अथाये इयं कटे पुतापपोतिके चंदमसुलियिके होतु ति तथा च अनूपटीपजंतु ति
४२. हेवं हि अनूपटीपजंतं हिदतपालते आलधे होति
४३. सतविसतिवसाभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापापिता ति
४४. एतं देवानंपिये आहा
४५. इयं धंमलिपि अत अथि सिलाथंभानि वा सिलाफलकानि वा तत कटविया एन एस चिलठितीके सिया
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स्तंभ देहली-टोपरा : सप्तम अभिलेख / ६१
३१. क्योंकि धर्म-संबंधी उत्तम कार्य और धर्माचरण यह है जो ये दया, दान, सत्य, पवित्रता, मृदुता और साधुता इस विधि से लोगों में बढ़ेंगी।
३२. देवानंप्रिय (प्रियदर्शी) राजा ऐसा कहते हैं-
३३. मेरे द्वारा जो कोई भले काम किये गये हैं लोगों ने उनका अनुसरण किया है और (आगे भी) करते रहेंगे।
३४. इससे (उनकी) बढ़ोतरी हुई है और माता-पिता की सेवा, गुरुजनों की सेवा, वयोवृद्धों के अनुसरण, ब्राह्मणों, श्रमणों, दीन-हीनों - यहां तक कि दासों और भृत्यों - के प्रति सम्यक व्यवहार से (और) बढ़ोतरी होगी।
३५. देवानंप्रिय (प्रि)यदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
३६. मनुष्यों में जो यह धर्म की बढ़ोतरी हुई है वह दो प्रकार से हुई है- धर्म के नियमों से और (विपश्यना) ध्यान करने से।
३७. और इनमें भी धर्म के नियमों से कम और (विपश्यना) ध्यान करने से कहीं अधिक (हुई है।)
३८. धर्म के नियम तो यह हैं जो मैंने यह (विधान) किया कि अमुक-अमुक प्राणी अवध्य हैं।
३९. और दूसरे भी अनेकानेक धर्म के नियम हैं जिनका मैंने (विधान) किया है।
४०. परंतु (विपश्यना) ध्यान करने से मनुष्यों की धर्म में खूब बढ़ोतरी हुई है (क्योंकि) इससे जीवों की अ-विहिंसा और प्राणियों का अ-वध होता है।
४१. तो इस उद्देश्य से यह किया गया है जिससे कि यह (मेरे) बेटों-पोतों (के शासनकाल) तक (और) चंद्रमा या सूर्य (के भासमान रहने) तक टिकने वाली हो और (लोग) इसका अनुसरण करें।
४२. क्योंकि इस प्रकार अनुसरण करने वाले को इहलोक तथा परलोक (का सुख) प्राप्त होता है।
४३. मेरे अभिषेक के २७ वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है।
४४. इस बारे में देवानंप्रिय कहते हैं-
४५. यह धर्मलिपि जहां शिला-स्तंभ अथवा शिला-फलक हों वहां लिखवायी जानी चाहिए जिससे कि यह चिर-स्थायी हो।