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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 80 में से

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पृष्ठ 42

शब्द-विवेचन
स्पष्टीकरण
शब्दों के विवेचन का क्रम प्रायःकर निम्न प्रकार से रखा गया है –
१. अभिलेख में प्रयुक्त हुए शब्द-विशेष
२. उनका हिंदी में अर्थ
३. इन शब्दों का सँस्कृत स्वरूप
४. सँस्कृत पदों का विश्लेषण (यथासंभव शब्दकोषों की सहायता से)
५. पालि शब्द अपने सामान्य रूप में (कोष्ठक में तत्सम सँस्कृत शब्द
सहित)
उदाहरण -
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
(पृष्ठ ६९-७०)
१. समाजो
२. समाज (अर्थात इंद्रियलोलुपता को बढ़ाने वाले जमघट अथवा उत्सव)
३. समाजः (संवीयते अत्रेति)।
४. ‘पशुभिन्नानां सङ्घः’ (हलायुध०)। ‘समजस्तु पशूनां स्यात्
समाजस्त्वन्यदेहिनाम्’ (अभिधान० ३.४८१)। समाजः- ‘पशुभिन्नानां
समूहे, सभायाम्, हस्तिनि च’ (शब्द०)।
५. समज्ज समज्‍जा। [सँ.- √अज् (हांकना)]
[नोट - संदर्भ-ग्रंथों के लिए कृपया देखें संदर्भ-सूची पृष्ठ सं (ix) पर]