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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 80 में से

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पृष्ठ 38

पृष्ठ ५८

५८ / सम्राट अशोक के अभिलेख

१७. देवानंपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
१८. मंगुसु पि मे निगोहानि लोपापितानि छायोपगानि होसंति पसुमुनिसानं
अंबावडिक्या लोपापिता
१९. अड्ढकोसिक्यानि पि मे उदुपानानि खानापितानि निसिढिया च
कालापिता
२०. आपानानि मे बहुकानि तत तत कालापितानि पटीभोगाये पसुमुनिसानं
२१. ल.... एस पटीभोगे नाम
२२. विविधाया हि सुखायनाया पुलिमेहि पि लाजीहि ममया च सुखीयिते
लोके
२३. इमं चु धंमानुपटीपती अनुपटीपजंतु ति एतदथा मे एस कटे
२४. देवानंपिये पियदसि हेवं आहा
२५. धंममहामाता पि मे ते बहुविधेसु अठेसु आनुगहिकेसु वियापटासे
पवजीतानं चेव गिहिथानं च सव... डेसु पि च वियापटासे
२६. संघठसि पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति हेवेव बाभनेसु
आजीविकेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति निगंठेसु पि मे कटे इमं
वियापटा होहंति नानापासंडेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति पटीविसिटं
पटीविसिटं तेसु तेषु ते.... माता
२७. धंममहामाता चु मे एतेसु चेव वियापटा सवेसु च अंनेसु पासंडेसु
२८. देवानंपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
२९. एते च अंने च बहुका मुखा दानविसगसि वियापटासे मम चेव देविनं
च सवसि च मे ओलोधनसि ते बहुविधेन आकारेन तानि तानि तुठायतनानि
पटी..... हिद चेव दिसासु च
३०. दालकानं पि च मे कटे अंनानं च देविंकुमालानं इमे दानविसगेसु
वियापटा होहंति ति धंमापदानठाये धंमानुपटिपतिये


पृष्ठ ५९

स्तंभ देहली-टोपरा : सप्तम अभिलेख / ५९

१७. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
१८. मार्गों पर भी मेरे द्वारा वट-वृक्ष लगवाये गये हैं जिससे वे पशुओं
और मनुष्यों को छाया दे सकें (और) आम के बगीचे (भी) लगवाये गये हैं।
१९. आधे-आधे कोस पर मेरे द्वारा कुएं खुदवाये गये हैं (और)
विश्राम-स्थल बनवाये गये हैं।
२०. पशुओं और मनुष्यों के उपभोग के लिए मेरे द्वारा जहां-तहां बहुत से
प्याऊ बनवाये गये हैं।
२१. (परंतु) यह तथाकथित 'उपभोग' तुच्छ है।
२२. क्योंकि (मेरे) पूर्ववर्ती राजाओं ने और मैंने भी विविध प्रकार से
(सांसारिक) सुख पहुँचाने वाले कार्यों से लोगों को सुखी बनाया था।
२३. इस धर्मचरण का लोग अनुसरण करें - इस प्रयोजन से यह (कार्य)
मैंने (ही) किया है।
२४. देवानंप्रिय प्रियदर्शी ऐसा कहते हैं -
२५. मैंने वे धर्ममहामात्र भी गृह-त्यागियों तथा गृहस्थों के अनेक प्रकार के
कल्याणकारी कार्यों में लगे हुए हैं और सब संप्रदायों में भी व्याप्त हैं।
२६. मेरे द्वारा (ऐसी) व्यवस्था की गयी है कि वे संघ के कार्यों के लिए भी
व्यापृत रहेंगे; इसी प्रकार मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे ब्राह्मणों तथा
आजीविकों में भी व्यापृत रहेंगे; मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे निर्ग्रन्थों में
भी व्यापृत रहेंगे; मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे विभिन्न संप्रदायों में भी
व्यापृत रहेंगे- (इस प्रकार) प्रत्येक प्रकार की विशेषता के अनुसार उन-उन
(वर्गों) में वे महामात्र (व्यापृत रहेंगे)।
२७. और मेरे धर्ममहामात्र इनमें तथा अन्य सब संप्रदायों में व्याप्त हैं।
२८. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
२९. ये तथा अन्य बहुत से मुख्य (अधिकारी) मेरा तथा रानियों का दान
बांटने में लगे रहते हैं और यहां तथा प्रांतों में, मेरे समूचे रनिवास में अनेक
विधियों से भिन्न-भिन्न प्रकार के तुष्टि प्रदान करने वाले कार्य करते रहते हैं।
३०. और मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे धर्म-संबंधी उत्तम कार्यों
(की बढ़ोत्तरी) के लिए और धर्मचरण के लिए (मेरे) लड़कों और अन्य
रानियों के लड़कों का दान बांटने में भी लगे रहें।