सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 80 में से
संदर्भ में पढ़ें.
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(अन्यो नानार्थो भवति-नि० १.६) (कर्म कस्मात्, क्रियत इति सतः-नि०
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३.१)। पालि-अञ्ञो। कम्मं।
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• सूस्रूसा = आराधना। कहना मानना। सं.- शुश्रूषा
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'शुश्रूषापारचर्यानोपवित्तिव्यासपारीत्ययः' (अभिधान० ३.४१७)। 'शुश्रूषा श्रोतु
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चैव ग्रहणं धारणं तथा' (अभिधान० २.३९०)। पालि - सुस्सूसा।
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• मितसंस्तुतज्ञातीनं बाम्हणसमणानं = मित्रों, परिचितों, संबंधियों और
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ब्राह्मणों तथा श्रमणों को। सं.- मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। मित्र-निधीयते
Wait, look at line 23-24:
मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। 'मित्र-निधीयते
Wait, does line 23 have a quote?
मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। 'मित्र-निधीयते or मित्र-निधीयते?
In line 23: `सं.- मित्रम् (मेद्यति खिद्यति