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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 80 में से

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पृष्ठ 43

शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
▪ इयं = यह।
▪ धंमलिपी = धर्म से संसिक्त अक्षररचना (अथवा अक्षरसंस्थान)। सँ.-
धर्मलिपी। 'धर्म:'-'ध्रियते लोकोऽनेन, धरति लोकं वा। 'लिपी', 'लिपि:'-
√लिप् से। इनके अन्य रूप 'लिबी', 'लिबि:' भी देखने को मिलते हैं।
'अक्षरन्यासे लिपिर्लिबि:' (अभिधान० ४८४)।
▪ देवानंप्रियेन प्रियदसिना राजा = देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा।
'देवानांप्रिय'-मौर्य राजाओं की उपाधि। 'प्रियदर्शी'-राजा अशोक का
विशेषण। 'देव:'-दीपनात्, द्योतनात्, दानात् (नि० ७.१५)।
'प्रिय:'-प्रीणातीति। मनोरम, मञ्जुल, हृद्य। 'राजा'-राजतेः (नि० २.३)।
Lat. 'Rex' (a king)
▪ लेखापिता = लिखवायी गयी।
▪ इध = यहां (अर्थात, मेरे साम्राज्य में)। सँ.-'इह'। पालि-'इध'। (हिंदी
का 'इधर' शब्द इसी से निष्पन्न हुआ प्रतीत होता है।)
▪ किंचि = कोई। सँ.- किञ्चित्।
▪ जीवं = प्राणी को। सँ.- जीवः (जीवतीति 'जीव् प्राणधारणे')। 'जीवः
पुरुषपुद्गलौ' (त्रिकाण्ड० ११९)।
▪ आरभित्पा = मार कर। सँ.- आलभ्य। आलम्भः, आलम्भनं -पकड़ना,
स्पर्श करना, चीरना, फाड़ना, यज्ञ में बलिदान के लिए पशु का वध करना,
यथा 'अश्वालम्भं, गवाल्म्भं'। (सँस्कृत०)। ('प्रातर्वै पशूनालभन्ते।' शतपथ०
३.७.२.४)
▪ प्रजूहितव्यं = होम किया जाय। (प्र - √हु से)।
▪ च = और। सँ.- च। पालि = च। 'च पादपूरणे पक्षान्तरे हेतौ विनिश्चये'
(त्रिकाण्ड० १०१८)
▪ समाजो = समाज (अर्थात, इंद्रियलोलुपता बढ़ाने वाले जमघट अथवा
उत्सव)। सँ.- समाजः (संवीयतेऽत्रेति)। 'पशुभिन्ननां सङ्घ:' (हलायुध०)।
'समजस्तु पशूनां स्यात् समाजस्त्वन्यदेहिनाम्' (अभिधान० ३.४८१)।