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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

खंड ३ (लघु स्तंभ अभिलेख)
मूल अभिलेख + हिंदी रूपांतर
लघु स्तंभः सारनाथ ........................................................... ४२
लघु स्तंभः रुम्मिनदेई ........................................................... ४४
लघु स्तंभः निगली सागर ........................................................... ४४
खंड ४ (स्तंभ अभिलेख)
मूल अभिलेख + हिंदी रूपांतर
स्तंभः देहली-टोपरा प्रथम अभिलेख ................................................. ४८
स्तंभः देहली-टोपरा द्वितीय अभिलेख ................................................ ४८
स्तंभः देहली-टोपरा तृतीय अभिलेख ................................................ ५०
स्तंभः देहली-टोपरा चतुर्थ अभिलेख ................................................. ५०
स्तंभः देहली-टोपरा पंचम अभिलेख ................................................. ५२
स्तंभः देहली-टोपरा षष्ठ अभिलेख ................................................... ५४
स्तंभः देहली-टोपरा सप्तम अभिलेख ................................................ ५६
खंड ५ (गुहा बराबर)
मूल अभिलेख + हिंदी रूपांतर
प्रथम अभिलेख ................................................................... ६४
द्वितीय अभिलेख .................................................................. ६४
तृतीय अभिलेख .

सम्राट अशोक : संक्षिप्त परिचय
भारतवर्ष के लिए यह अत्यंत गौरव की बात है कि उसकी धरती पर जन्मे
सम्राट अशोक का नाम केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में, बहुत ही
आदर के साथ लिया जाता है। ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध लेखक एच. जी. वेल्स ने
अशोक की गणना विश्व इतिहास के छः महानतम व्यक्तियों में की है। यूनेस्को
कलिंग प्राईज १९८५ के लारिएट सर एग्गरमोंट ने इसके बारे में अपने उद्गार
व्यक्त करते हुए कहाः 'अशोक को आज विश्व का सम्राट होना चाहिए था।'
इसी विभूति का संक्षिप्त परिचय नीचे की चंद पंक्तियों में दिया जा रहा है।
अशोक के जीवन के बारे में मुख्य-मुख्य जानकारी निम्न स्रोतों से मिलती है -
१. दिव्यावदान (असोकावदान) २. दीपवंस ३. महावंस ४. पुराण ५.
सम्राट अशोक के शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख
सम्राट के प्रारंभिक जीवन के बारे में अनेक दंतकथाएं भी प्रचलित हैं पर
इनमें से कितनी ही निःसार प्रतीत होती हैं। इनमें से कुछ तो भारतीय मूल की
हैं और शेष अधिकतर श्रीलंका से प्रसरित हुई हैं। एक कथा के अनुसार
अशोक पहले बड़े चंड स्वभाव का था, पर बाद में भगवान बुद्ध की शिक्षा को
अपनाने से बड़ा धार्मिक व्यक्ति बन गया। इस प्रकार वह 'चंडाशोक' से
'धम्माशोक' बन गया।
सम्राट के जीवन के घटनाक्रम के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। फिर भी
प्रायःकर वे सभी इसका प्रामाणिक स्रोत उन अभिलेखों को तो मानते ही हैं जिन्हें
अशोक ने अपने शासनकाल में समय समय पर अपने विशाल साम्राज्य में
महत्त्वपूर्ण स्थानों पर शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाया था। स्वर्गीय श्री
रवींद्रनाथ टैगोर का भी चिंतन है कि सम्राट अशोक ने चट्टानों पर लेख इसीलिए
खुदवाये कि वह जो आवाज इनमें भरे वही आवाज सदियों तक लोगों के
श्रवणगोचर होती रहे। इन अभिलेखों को पढ़ते समय बहुत बार सचमुच ऐसे
लगने लगता है मानों अशोक स्वयं अपनी धर्मलिपि पढ़ कर हमें सुना रहा हो।
अशोक मौर्य वंश का तीसरा बड़ा सम्राट था। चंद्रगुप्त इसके पितामह और
बिंदुसार इसके पिता थे। शासन की बागडोर संभालने से पहले अपने पिता के

An exact line-by-line transcription of the Hindi text from both pages:


[Left Page]

[ii] सम्राट अशोक के अभिलेख
जीवनकाल में यह अवन्ति नाम के जनपद का प्रशासक रह चुका था जिसकी
राजधानी उज्जयिनी (उज्जैन) थी। उस समय वह अठारह वर्ष का ही था। इस
प्रकार बाल्यकाल से ही इसे प्रशासन का अच्छा-खासा अनुभव हो गया था जो
बाद में इसके लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ।
अशोक का जन्म ईसापूर्व ३०४ में हुआ था। मास्की में पाये गये अभिलेख
से इसका नाम 'अशोक' होना विदित होता है, अन्यथा अन्य अभिलेखों में इसे
'देवानांप्रिय' अथवा 'प्रियदर्शी राजा' कहा गया है। ये दोनों अशोक के नाम न
होकर उसकी मानपदवियां थीं, जैसे आजकल 'His Majesty'।
अशोक की पहली पत्नी का नाम देवी था जिससे उसे पुत्र महेंद्र और पुत्री
संघमित्रा संतान के रूप में प्राप्त हुए। दूसरी पत्नी कारुवाकी से इसे तीवर नाम
का पुत्र प्राप्त हुआ। असंधिमित्रा इसकी अग्रमहिषी मानी जाती है। दिव्यावदान
के अनुसार धर्मविवर्धन (कुणाल) नाम का पुत्र पद्मावती की को

तीनों की विद्यमानता • हाथी, बैल और घोड़े के बीचोंबीच एक 'धर्मचक्र' का अंकन [यह 'धर्मचक्र' भगवान बुद्ध द्वारा प्रदान उन चौबीस प्रत्ययों का सूचक प्रतीत होता है जिनसे यह सृष्टि का व्यापार चलता है।]`

Next section:
सम्राट अशोक की प्रसिद्धि जिन कारणों से है, वे हैं:
• कुशलतम प्रशासन
• नगरों का निर्माण
• बहुत बड़ी संख्या में विहारों, स्तंभों एवं स्तूपों का निर्माण
• प्रस्तर शिलाओं और स्तंभों पर प्रजाजन एवं अधिकारियों के निमित्त अपने आदेशों, अनुदेशों, अपेक्षाओं का उत्कीर्णन
• पत्थरों पर कलाकारी
• समाज सेवा के कार्य
• लोगों में 'विपश्यना ध्यान' की प्रवृत्ति जगाना


Let's check the exact line breaks on both pages from the image to do a precise line-by-line transcription.

Page [iv] line breaks:
[iv] सम्राट अशोक के अभिलेख
आज के एशियाई देशों में बुद्ध की शिक्षा में विश्वास रखने वाले लोग बहुत
बड़ी संख्या में मिलते हैं।
किस देश में किस स्थविर को भेजा गया, इसकी तालिका नीचे दी गयी है -
स्थविर देश
१. मज्झन्तिक कश्मीर एवं गंधार
२. महारक्षित यवन (

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:


[पृष्ठ vi]

[vi] सम्राट अशोक के अभिलेख
यह ज्ञातव्य है कि अशोक ने अल्पाय काल में ही अपने साम्राज्य में यत्र
तत्र ८४,००० स्मारक खड़े करवा दिये थे। यह मान्यता है कि भगवान बुद्ध
एवं उनके प्रमुख शिष्यों के उपदेशों की संख्या इतनी ही होने के कारण उसके
द्वारा ८४,००० स्मारकों का निर्माण-कार्य हाथ में लिया गया था।
सम्राट अशोक द्वारा शिलाओं, स्तंभों, गुफाओं पर उत्कीर्ण अभिलेखों की
संख्या ४२ तक पहुँच चुकी है। इनमें से ३६ भारत में, २ नेपाल में, २
पाकिस्तान में और २ अफगानिस्तान में हैं। अफगानिस्तान में पाये गये
अभिलेख 'खरोष्ठी' लिपि में हैं। इन सभी अभिलेखों को ऐसे स्थानों पर
उत्कीर्ण किया गया था जहां पर अधिक-से-अधिक लोगों का ध्यान इनकी ओर
आकृष्ट हो सके। विद्वानों ने अभिलेखों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया है:
• शिला अभिलेख (गिरनार, कालसी, मानसेहरा, धौली, जौगड़, इत्यादि)

संकेतचिन्ह
अनेकार्थसंग्रह अनेकार्थ०
अभिधानचिन्तामणि अभिधान०
अभिधानचिन्तामणिपरिशिष्ट अभिधान०परिशिष्ट
अभिधानचिन्तामणिशिलोञ्छः अभिधान०शिला
अमरकोष अमर०
अव्यय अव्य०
उपसर्गार्थचन्द्रिका उपसर्गार्थ०
एकादशीतत्त्वम् एकादशी०
कविकल्पलता कवि०
चरियापिटक चरिया०
चाणक्यशतक चाणक्य०
चुल्लनिद्देसपालि चुल्ल०
त्रिकाण्डशेष त्रिकाण्ड०
द्विरूपकोष द्विरूप०
धातुपाठ (पाणिनि) धातुपाठ०
नपुंसकलिङ्ग न०
निघण्टुशेष (हेमचन्द्रविरचित) निघण्टु०
निरुक्त नि०
पञ्चतन्त्र पञ्च०
पाराजिकपालि पाराजिक०
पुँल्लिङ्ग पुँ.
बहुवचन ब. व.
ब्रह्मपुराण ब्रह्मपु०
ब्रह्मवैवर्त ब्रह्म०
भावप्रकाश भाव०
मनुस्मृति मनु०
महाभारत महाभा०

[xi] संकेतचिह्न
धम्मपदमाधव धम्मती०
धर्मशास्त्रविषयक धर्मशा०वि०
मुद्राराक्षस मुद्रा०
मेदिनीकोष मेदिनी०
रामायण रामा०
वाशिष्ठस्मृतिवचन वशिष्ठ०
वेणीसंहार वेणी०
वैद्यकरत्नमाला वैद्यक०
शतपथब्राह्मण शतपथ०
शब्दरत्नप्रदीप शब्दरत्न०
शब्दस्तोममहानिधि शब्द०
शिष्टोपदेशः शिष्ट०
संस्कृत सं०
संस्कृतगद्यग्रंथकुसुम संस्कृत०
सङ्क्रन्तसङ्ग्रह सङ्क्रन्त०
समन्तपासादिका समन्त०
साहित्यदर्पण साहित्य०
सुनोवमङ् सुनो०
स्त्रीलिङ्ग स्त्री०
हलायुधकोष हलायुध०
हारावली हारा०
हितोपदेश हितोप०
Late Lat


खंड (१)
शिलाओं पर उत्कीर्ण अभिलेख

Here is the complete and precise transcription of the provided image containing the Prakrit text and Hindi translation of Ashoka's Major Rock Edicts (Girnar Shila: First and Second Edicts):


२ / सम्राट अशोक के अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख / ३

मूल अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ हिंदी रूपांतर

गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख

१. इयं धंमलिपी देवानंपियेन प्रियदसिना राञा ले खापिता $\qquad\qquad$ १. यह धर्मलिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवायी गयी है।
२. इध न किंचि जीवं आरभित्पा प्रजूहितव्यं $\qquad\qquad\qquad\qquad$ २. यहां किसी जीव को मार कर होम नहीं किया जाना चाहिए।
३. न च समाजो कतव्यो $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ३. और न ही इन्द्रियलोलुपता को बढ़ावा देने वाला उत्सव किया जाना
४. बहुकं हि दोसं समाजम्हि पसति देवानंपियो प्रियदसि राजा $\qquad\quad$ चाहिए।
५. अस्ति पि तु एकाचा समाजा साधुमता देवानंपियस प्रियदसिनो राञो $\qquad$ ४. क्योंकि ऐसे उत्सव में देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा बहुत बुराई देखते हैं।
६. पुरा महानसम्हि देवानंपियस प्रियदसिनो राञो अनुदिवसं बहूनि $\qquad$ ५. फिर भी कोई-कोई उत्सव तो हैं ही, जो देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के
प्राणसतसहस्रानि आरभिसु सूपाथाय $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ मत में अनिंद्य हैं।
७. से अज यदा अयं धंमलिपी लिखिता ती एव प्राणा आरभरे सूपाथाय द्वो $\quad$ ६. पहले देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के रंधनागार में प्रतिदिन बहुत से,
मोरा एको मगो सो पि मगो न ध्रुवो $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ सैंकड़ों-हजारों, प्राणी सूप के प्रयोजन से मारे जाते थे।
८. एते पि त्री प्राणा पछा न आरभिसरे $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ ७. परंतु आज, जबकि यह धर्मलिपि लिखी गयी है, सूप के प्रयोजन से
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ तीन ही प्राणी मारे जाते हैं - दो मोर और एक पशु - और वह पशु भी
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ नित्यप्रति नहीं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ८. ये तीन प्राणी भी बाद में नहीं मारे जाएंगे।

गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख

१. सर्वत विजितम्हि देवानंपियस पियदसिनो राञो एवमपि प्रचंतेसु यथा $\quad$ १. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के राज्य में सर्वत्र और इसी प्रकार सीमा से
चोडा पाडा सतियपुतो केतलपुतो आ तंबपंणी अंतियको योनराजा ये वा पि $\quad$ सटे हुए पड़ोसी राज्यों में - जैसे चोड, पांड्य, सत्यपुत्र, केरलपुत्र, ताम्रपर्णी
तस अंतियकस सामीपं राजानो सर्वत्र देवानंप्रियस प्रियदसिनो राञो द्वे चिकीछ $\quad$ भी, यवनराजा अंतियोक और जो भी उस अंतियोक के समीपवर्ती राजा हैं -
कता मनुसचिकीछा च पसुचिकीछा च $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ सब जगह देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा की (ओर से) मनुष्यों के लिए चिकित्सा
२. ओसुढानि च यानि मनुसोपगानि च पसोपगानि च यत यत नास्ति $\quad$ और पशुओं के लिए चिकित्सा - दो (प्रकार की) चिकित्सा (व्यवस्थाएं) की हुई
सर्वत्रा हारापितानि च रोपापितानि च $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ हैं।
३. मूलानि च फलानि च यत यत्र नास्ति सर्वत हारापितानि च रोपापितानि च $\quad$ २. और मनुष्यों तथा पशुओं के लिए उपयोगी जो औषधियां जहां जहां
४. पंथेसू कूपा च खानापिता व्रछा च रोपापिता परिभोगाय पसुमनुसानं $\quad$ नहीं हैं उन सब स्थानों पर मंगवायी गयी हैं और लगवा दी गयी हैं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ३. और कंदमूल तथा फल जहां-जहां नहीं हैं उन सब स्थानों पर मंगवाये
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गये हैं और लगवा दिये गये हैं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ४. और पशुओं तथा मनुष्यों के प्रचुर उपयोग के लिए मार्गों पर कुएं
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ खुदवाये गये हैं और वृक्ष लगवाये गये हैं।

[पृष्ठ ४]

४ / सम्राट अशोक के अभिलेख


गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख

मूल पाठ (प्राकृत)

गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
१. देवानंपियो पियदसि राजा एवं आह
२. द्वादसवसाभिसितेन मया इदं आज्ञापितं
३. सर्वत विजिते मम युता च राजुके च प्रादेशिके च पंचसु पंचसु वासेसु
अनुसंयान नियातु एतायेव अथाय इमथ धंमानुसस्तिय यथा अञाय पि कम्माय
४. साधु मातरि च पितरि च सुसूसा मित्रसंस्तुतज्ञातीनं बाम्हण-समणानं
साधु दानं प्राणानां साधु अनांरभो अपव्ययता अपभांडता साधु
५. परिसा पि युते आज्ञापयिसति गणनायं हेतुतो च व्यंजनतो च


गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख

मूल पाठ (प्राकृत)

गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
१. अतिक्रातं अंतरं बहुनि वर्षशतानि वढितो एव प्राणालंभो विहिंसा च
भूतानं ज्ञातीसु असंमतिपती ब्राम्हणसमणानं असंप्रतिपत्ती
२. त अज्ज देवानंपियस पियदसिनो राञो धंमचरणेन भेरीघोसो अहो
धंमघोसो विमानदरंसणा च हथिदसणा च अगिखंधानि च अञानि च दिव्यानि
रूपाणि दर्सयित्वा जनं
३. यारिसे बहुहि वर्षसतेहि न भूतपुवे तारिसे अज्ज वढिते देवानंप्रियस
पियदसिनो राञो धंमानुसस्तिया अनारंभो प्राणांन अविहिंसा भूतानं ज्ञातीनं
संपटिपत्ती ब्राम्हणसमणानं संपटिपत्ती मातरि पितरि सुसूसा थेरसुसूसा
४. एस अञे च बहुविधे धंमचरणे वढिते
५. वढयिसति चेव देवानंपियो पियदसि राजा धंमचरणं इदं
६. पुता च पोता च प्रपोता च देवानंपियस पियदसिनो राञो प्रवर्धयिसंति
इदं धंमचरणं आव संवटकपा धंमंम्हि सीलम्हि चिनिट्ठाय धंमं अनुसासिसंति


[पृष्ठ ५]

गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख / ५


गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख

हिन्दी अनुवाद

गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह आज्ञा जारी की गयी
है।
३. मेरे राज्य में सब जगह युक्त, रज्जुक और प्रादेशिक यह जो धर्म का
अनुशासन है- इसी प्रयोजन के लिए हर पांच वर्षों में (अपने-अपने
क्षेत्राधिकार में) सम्यक् प्रकार से दौरा करने के लिए नियमपूर्वक जाएं जैसे कि
दूसरे कामों के लिए भी जाया करते हैं।
४. माता-पिता की सेवा करना उत्तम है; मित्रों, परिचितों, ज्ञाति-भाइयों,
ब्राह्मणों और श्रमणों को दान देना उत्तम है; प्राणियों की हत्या न करना उत्तम
है; कम खर्च करना और कम संचय करना उत्तम है।
५. संक्षेप में और विस्तार के साथ योग रखने के लिए युक्तों को परिषदें
भी आदेश देंगी।


गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख

हिन्दी अनुवाद

गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
१. कितने ही सैकड़ों वर्षों का अंतराल हो गया है जब से प्राणियों की बलि,
जीवों की विहिंसा तथा ज्ञाति-भाइयों, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति अनादर का
भाव बढ़ता ही गया गया है।
२. परंतु आज लोगों को देवयान दिखाया कर, हाथी दिखाया कर, अग्नि की
मशालों और अन्य अलौकिक दृश्यों को दिखाया कर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा
के धर्माचरण से भेरी का नाद धर्म का नाद हो गया है।
३. जैसा कि कितने ही सैकड़ों वर्षों में पहले कभी नहीं हुआ वैसा आज
देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के धर्मानुशासन से प्राणियों का अ-वध, जीवों की
अविहिंसा, ज्ञाति-भाइयों, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति आदर का भाव और
माता-पिता तथा वृद्धजनों के प्रति सेवा का भाव बढ़ने लगा है।
४. यह और अन्य बहुत प्रकार से धर्म का आचरण बढ़ गया है।
५. और बढ़ना ही रहेगा। देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा का यह धर्माचरण।
६. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र सृष्टि के विनाश
तक इस धर्मचरण को बढ़ाते चले जाएंगे और धर्म तथा शील में प्रतिष्ठित
हुए-हुए वे धर्म का अनुशासन करेंगे।

[पृष्ठ ६ : बायाँ स्तम्भ]

६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
७. एस हि सेटं कंमं य धंमानुसासनं
८. धंमचरणे पि न भवति असीलस
९. त इमानि अयठि वधी च अहिनी च साधु
१०. एताय अथाय इदं लेखापितं इमस अथस वधि युजुंतु हीनि च ने
लोचेतव्या
११. द्वादसवासाभिसितेन देवानंपियेन पियदसिना राजा इदं लेखापितं
कालसी शिला : पंचम अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि लाजा अहा
२. कल्यानं दुकरं
३. ए आदिकले कल्यानस से दुकरं करोति
४. से ममया बहु कल्याने कटे
५. ता ममा पुता चा नताले चा परं चा तेहि ये अपतिये मे आवकप तथा
अनुवतिसंति से सुकटं कछंति
६. ए चु हेता देसं पि हापयिसति से दुकटं कछति
७. पापे हि नामा सुपदालये
८. से अतिक्रंतं अंतरं नो हुतुपूल धंममहामाता नामा
९. तेदसवसाभिसितेना ममया धंममहामाता कटा
१०. ते सवपासंडेसु वियापटा धंमाधियानंये वा धंमावढिया हिदसुखाये वा
धंमयुतसा योनकंबोजगंधालनं ए वा पि अंने अपलंता


[पृष्ठ ७ : दायाँ स्तम्भ]

कालसी शिला : पंचम अभिलेख / ७
७. क्योंकि यह जो धर्मानुशासन है, यह श्रेष्ठ कर्म है।
८. शील-हीन (व्यक्ति) द्वारा धर्म का आचरण संभव नहीं होता है।
९. तो इस प्रयोजन के उत्कर्ष का होना और अपकर्ष का न होना अच्छा है।
१०. इस उद्देश्य से यह लिखवाया गया है कि वे (अर्थात, मेरे उत्तराधिकारी)
इस प्रयोजन के उत्कर्ष में लगे रहें और इसके अपकर्ष में रुचि न लें।
११. अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
यह लिखवाया गया है।
[स्पष्टीकरण पंक्ति (२) : डा. भंडारकर ने 'विमानवत्थु' का उद्धरण दिया
है जिसके अनुसार धार्मिक मनुष्य को परलोक में स्वर्ग का सुख मिलता है जहां
(१) चलता-फिरता महल, (२) हस्ती=ऐरावत की सवारी, और (३) सितारों
की तरह भास्वर रूप की प्राप्ति होती है। अशोक ने इनके प्रदर्शन से लोगों का
ध्यान धार्मिक जीवन बिताने की ओर आकृष्ट किया प्रतीत होता है।]
कालसी शिला : पंचम अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा कहते हैं।
२. भलाई का काम करना कठिन होता है।
३. जो भलाई के काम में पहल करता है वह कठिन काम करता है।
४. तो मेरे द्वारा बहुत से भलाई के काम किये गये हैं।
५. यदि मेरे पुत्र, नाती और उनसे आगे जो संतान होगी कल्पांत तक वैसा
ही अनुवर्तन करेंगे तो सुकृत (अर्थात्, पुण्य का कार्य) करेंगे।
६. और जो इसका तनिक भी अपकर्ष करेगा वह दुष्कृत (अर्थात, पाप का
कार्य) करेगा।
७. वस्तुतः पाप का तो खूब दलन किया जाना चाहिए।
८. तो एक अंतराल हो गया है जबकि पहले 'धर्ममहामात्र' नाम के
(अधिकारी) नहीं हुआ करते थे।
९. अभिषेक के तेरह वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा धर्ममहामात्र (नियुक्त)
किये गये हैं।
१०. वे सब संप्रदायों में धर्म की स्थापना और धर्म की वृद्धि के लिए और
यवनों, कंबोजों, गंधारों और जो भी अन्य अपरांत (पश्चिमी सीमा पर रहने
वाले लोग) हैं उनमें जो धर्मपरायण हैं उनके हित-सुख के लिए लगाये गये हैं।

पृष्ठ ८

८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
११. भटमयेसु वंभनेसु अनथेसु वुधेसु हितसुखाये धंमयुताये
अपलिबोधाये वियापटा ते
१२. बंधनबधसा पटिविधानाये अपलिबोधाये मोखाये चा एष अनुबधं
पजाव ति वा कताभिकाले ति वा महालके ति वा वियापटा ते
१३. हिदा बाहिरेसु चा नगरेसु सवेसु ओरोधनेसु भातिनं च ने भगिनिना
ए वा पि अंने नातिक्ये सवता वियापटा
१४. ए इयं धंमनिसितो ति वा दानयुतो ति वा सवता विजितम्हि ममा
धंमयुतासि वियापटा ते धंममहामाता
१५. एताये अठाये इयं धंमलिपि लेखिता चिरठितीक्या होतु तथा च मे
पजा अनुवततु

गिरनार शिला : षष्ठ अभिलेख
१. देवा........................ सि राजा एवं आह............
२. अतिक्रांतं अंतर

or stha written as sra). In the text: "उस्रानम्हि" - yes, उ, स, ्र, ा, न, म्, ह, ि.

  • "अथसंतीरणाय व" - yes.
  • "कतव्यमते हि मे सर्वलोकहितं" - yes.
  • "तस च पुन एस मूले उस्रानं च अथसंतीरणा च" - yes.
  • "नास्ति हि कम्मतं सर्वलोकहितत्या" - wait, is it सर्वलोकहितत्या or सर्वलोकहितत्पा?
    Text has: "सर्वलोकहितत्या" (त, ्, य, ा or त, ्, प, ा - looks like तत्या).
  • "य च किंचि पराक्रमामि अहं किति भूर्तानं आनणं गछेयं इध च नानि" - wait, भूर्तानं or भूतानं?
    Text: "भूर्तानं" - wait, looks like "भूर्तानं" (भ, ू with repha on त? No, भूतानं with a mark or भूर्तानं). Let's look closely: "भूतानं" - actually it looks like भूतानं, but wait, there is a repha? No, it's just भूतानं. Wait, look at: "भूतानं आनणं गछेयं".
  • "सुखापयामि परत्रा च स्वर्गं आराधयंतु त" - wait, "आराधयंतु त" or

[पृष्ठ ४२]

४२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
४. तेनेसा धंमयात्रा
५. एतयं होति बाम्हणसमणानं दसणे च दाने च थेरानं दसणे च
हिरंणपटीविधानो च जानपदस च जनस दसनं धंमानुसस्टी च धंमपरीपुछा च
तदोपया
६. एसा भुये रति भवति देवानामपियस प्रियदसिनो राजो भागे अंजे

गिरनार शिला : नवम अभिलेख
१. देवानंपियो पियदसि राजा एव आह
२. अस्ति जनो उचावचं मंगले करोते आबाधेषु वा आवाहवीवाहेसु वा
पुजनलाभेसु वा प्रवासासि वा एतम्हि च अञम्हि च जनो उचावचं मंगले करोते
३. एत तु महिडायो बहुकं च बहुविधं च छुदं च निरथं च मंगले करोते
४. त कतव्यमेव तु मंगले
५. अप्फले तु खो एतारिसं मंगले
६. अयं तु महाफले मंगले य धंममंगले
७. ततेत दासभतकम्हि सम्याप्रतीपती गुरूनां अपचिति साधु पाणेसु सयमो
साधु बम्हणसमणानं साधु दानं एत च अञ च एतारिसं धंममंगले नाम
८. त वतव्यं पिता व पुतेन वा भात्रा वा स्वामिकेन वा इदं साधु इदं कतव्य
मंगलं आव तस अथस निस्टानाय
९. अस्ति च पि वुतं साधु दान इति
१०. न तु एतारिसं अस्ता दानं व अनुगहो व यारिसं धंमदानं व अम्रनुगहो व
११. त तु खो मित्रेन व सुहृदयेन वा ज्ञातिकेन व सहायन व ओवादितव्यं
तंम्हि तंम्हि पकरणे इदं कतं इदं साध्व इति इमिना सक स्वर्गे आराधेतु इति
१२. कि व इमिना कतव्वतरं यथा स्वर्गारधी


[पृष्ठ ५३]

गिरनार शिला : नवम अभिलेख / ५३
४. उससे यह धर्म-यात्रा (का चलन आरंभ हुआ)।
५. इसमें होता है - ब्राह्मणों तथा श्रमणों का दर्शन और (उनके निमित्त)
दान, वयोवृद्धों का दर्शन और (उनका) सुवर्ण से पोषण, जनपद के लोगों का
दर्शन, धर्मदेशना और इस (अवसर) के अनुकूल धर्म के बारे में परिप्रश्न
(विस्तृत पूछताछ)।
६. यह आनन्दातिरेक देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के (शासन-काल के) अपर
भाग में प्राप्त होता है।

गिरनार शिला : नवम अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. ऐसे लोग हैं जो विपत्ति के समय, पुत्र-पुत्री के परिणय के समय,
पुत्र-जन्म के समय अथवा प्रवास-काल में नाना प्रकार के मंगलाचार करते हैं।
इन और इसी प्रकार के अन्य (अवसरों) पर लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के
मंगलाचरण करते हैं।
३. परंतु इनमें महिलाएं बहुदें और अनेक प्रकार के ओछे और निरर्थक
मंगलाचार करती हैं।
४. तो भी, मंगलाचार तो करने ही चाहिएं।
५. परंतु इस प्रकार के मंगलाचार निश्चय ही अल्प फल देने वाले होते हैं।
६. यह जो "धर्ममंगल" है वह मंगलाचार बहुत फल देने वाला होता है।
७. उसमें होता है-दासों तथा भृत्यों के प्रति शिष्ट व्यवहार, बड़ों के प्रति
आदर का भाव, प्राणियों के प्रति संयम (और) ब्राह्मणों तथा श्रमणों के निमित्त
दान-दक्षिणा। ये और इसी प्रकार के अन्य (आचरण) 'धर्ममंगल' कहलाते हैं।
८. तो पिता, पुत्र, भाई अथवा भर्तार को कहना चाहिए कि यह उत्तम है,
उस (अर्थात्, अभीष्ट) प्रयोजन की सिद्धि-पर्यंत यह मंगल करना चाहिए।
९. और कहा भी गया है: "दान देना उत्तम है।"
१०. ऐसा कोई दान अथवा उपकार नहीं होता है जैसा कि धर्म का दान
अथवा धर्म का उपकार।
११. इसलिए मित्र, सुहृद, ज्ञाति-भाई अथवा सहायी द्वारा दृढ़तापूर्वक कहा
जाना चाहिए कि ऐसे-ऐसे प्रसंग में यह करना चाहिए, यह उत्तम है, इससे स्वर्ग
की प्राप्ति संभव है।
१२. और इससे बढ़ कर करने के लिए रखा ही क्या है कि स्वर्ग मिल
जाय।

चतुर्दश मुख्य शिलालेख (१ से १४ शिलालेख - अहिंसा, धम्म-विजय व सर्वधर्म-समभाव)

१४ / सम्राट अशोक के अभिलेख

गिरनार शिला : दशम अभिलेख

१. देवानंपियो प्रियदसि राजा यसो व कीति व न महाथावहा मञते अञत्र
तदायत्वो दिघाय च मे जनो धंमसुसुसा सुसुसता धंमवुतं च अनुविधीयता
२. एतकाय देवानंपियो पियदसि राजा यसो व किति व इच्छति
३. यं तु किचि परिकमते देवानं प्रियदसि राजा त सवं पारत्रिकाय किति
सकले अपपरिस्रवे अस
४. एस तु परिसवे य अपुञं
५. दुकरं तु खो एतं छुदकेन व जनेन उसटेन व अञत्र अग्रेन पराकमेन सवं
परिचजित्पा
६. ए तु खो उसटेन दुकरं


गिरनार शिला : एकादश अभिलेख

१. देवानंपियो पियदसि राजा एवं आह
२. नास्ति एतारिसं दानं यारिसं धंमदानं धंमसंतवो वा धंमसंविभागो वा
धंमसंबंधो व
३. तत इदं भवति दासभतकम्हि सम्यप्रतीपती मातरि पितरा साधु सुस्रुसा
मितसंस्तुतञातिकानं बाम्हणसमणानं साधु दानं प्राणां अनारंभो साधु
४. एत वतव्यं पिता व पुत्रेन व भ्राता व मितसंस्तुतञातीकेन व आव
पटीवेसियेहि इदं साधु इदं कतव्यं
५. सो तथा करु इलोक्यस आरधो होति परत च अनंतं पुञं भवति तेन
धंमदानेन


गिरनार शिला : दशम अभिलेख / १५

गिरनार शिला : दशम अभिलेख

१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा यश अथवा कीर्ति को (कोई) बहु महत्त्व की
वस्तु नहीं मानते सिवाय इसके कि अभी, और दीर्घ काल तक, उनकी प्रजा धर्म
की बात सुनने को लालायित रहे और धर्म का आचरण करे (क्योंकि यह उनका
मंतव्य है)।
२. इतने (मात्र) के लिए देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा यश वा कीर्ति की
कामना करते हैं।
३. जो कुछ पराक्रम (उद्यम) देवानां (प्रिय) प्रियदर्शी राजा करते हैं वह सब
(भवसागर से) पार जाने के लिए है कि कैसे सब (लोग) (अपने-अपने)
परिस्रवों (पापकर्मों) से मुक्तप्राय हो जायं।
४. जो अ-पुण्य (अर्थात्, पाप) है वही 'परिस्रव' (कहलाता) है।
५. परंतु निश्चय ही किसी छोटे या बड़े व्यक्ति द्वारा बिना सब
(आसक्तियां) छोड़ हुए और बिना उत्तम पराक्रम किये हुए, यह कर पाना
कठिन है।
६. और बड़े व्यक्ति द्वारा तो यह निःसंदेह (अपेक्षाकृत अधिक) दुःसाध्य है।


गिरनार शिला : एकादश अभिलेख

१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. ऐसा कोई दान नहीं है जैसा कि धर्म का दान। (ऐसा कोई परिचय नहीं
है जैसा कि) धर्म का परिचय। (ऐसा कोई बंटवाड़ा नहीं है जैसा कि) धर्म का
बंटवाड़ा। (ऐसा कोई संबंध नहीं है जैसा कि) धर्म का संबंध।
३. उसमें यह होता है कि दासों और भृत्यों के प्रति सम्यक व्यवहार उत्तम
होता है; माता-पिता की सेवा उत्तम होती है; मित्रों, परिचितों, जातिभाइयों,
ब्राह्मणों तथा श्रमणों को दान देना उत्तम होता है (और) प्राणियों की हिंसा न
करना उत्तम होता है।
४. पिता, पुत्र, भाई, मित्र, परिचित, जातिभाई - यहां तक कि पड़ोसियों
द्वारा भी- यह कहा जाना चाहिए: "यह उत्तम है, इसे करना चाहिए।"
५. ऐसा करने वाले को उस धर्मदान से इस लोक की प्राप्ति (अर्थात्,
सिद्धि) होती है और परलोक में असीम पुण्य मिलता है।

[पृष्ठ १६]

१६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
गिरनार शिला मूल : अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि राजा सवपासंडानि च पवजितानि च घरस्तानि च
पूजयति दानेन च विविधेना च पूजाय पूजयति ने
२. न तु तथा दानं व पूजा व देवानंपियो मंञते यथा किति सारवढी अस
सवपासंडानं
३. सारवढी तु बहुविधा
४. तस तु इदं मूलं य वचोगुती किति अत्तपासंडपूजा व परपासंडगरहा व
नो भवे अपकरणम्हि लहुका व अस तन्हि तन्हि प्रकरने
५. पूजेतव्या तु एव परपासंडा तेन तेन प्रकरनेन
६. एवं करतं अत्तपासंडं च वढयति परपासंडस च उपकरोति
७. तदन्यथा करोतो अत्तपासंडं च छणति परपासंडस च पि अपकरोति
८. यो हि कंचि अत्तपासंडं पूजयति परपासंडं व गरहति सवं
अत्तपासंडभतियैव किन्ति अत्तपासंडं दीपयेम इति सो च पुन तथ करातो
अत्तपासंडं बाढतरं उपहनाति
९. त संवायो एव साधु किंति अञमञस धंमं सुणारु च सुंसूंसेर च
१०. एवं हि देवानंपियस इछा किंति सवपासंडा बहुसुता च असु
कल्याणागमा च असु
११. ये च तत तत पसंना तेहि वतव्यं
१२. देवानंपियो नो तथा दानं व पूजां व मंञते यथा किति सारवढी अस
सवपासंडानं
१३. बहका च एतथ अथा वायाता धंममहामाता च इथिझखमहामाता च
वचभूमिक्या च अञे च निकाया
१४. अयं च एतस फलं य अत्तपासंडवढी च होति धंमस च दीपना


[पृष्ठ १७]

गिरनार शिला : द्वादश अभिलेख / १७
गिरनार शिला : द्वादश अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा सब संप्रदाय वालों, गृहत्यागियों तथा गृहस्थों
का सम्मान करते हैं- (वे) दान और विविध प्रकार की अर्चना से उनका
सत्कार करते हैं।
२. किन्तु देवानांप्रिय दान अथवा अर्चना को उतना (महत्वपूर्ण) नहीं मानते
जितना कि सब संप्रदायों में सार की वृद्धि हो।
३. सार की वृद्धि अनेक प्रकार से होती है।
४. किन्तु उसका मूल आधार यह है कि वाणी पर नियंत्रण रखा रहे। सो
क्या? कि बिना प्रसंग के अपने संप्रदाय की बड़ाई और अन्य संप्रदाय की निंदा
न हो अथवा प्रसंग-विशेष में साधारण-सी (चर्चा) हो।
५. जिस-किसी प्रसंग में अन्य संप्रदायों की प्रशंसा हो की जानी चाहिए।
६. ऐसा करता हुआ (व्यक्ति) अपने संप्रदाय की उन्नति करता है और
अन्य संप्रदायों पर उपकार करता है।

Here is the complete line-by-line transcription of both pages:


[पृष्ठ ३८]

३८ / कुमार अशोक के अभिलेख
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख
१. अठवर्षअभिसितस देवानंप्रियस प्रियद्रशिस रञो कलिग विजित
२. दियढमत्रे प्राणशतसहस्रे ये ततो अपवुढे शतसहस्रमात्रे तत्र हते
बहूतावते वा मुटे
३. ततो पछा अधुना लधेषु कलिगेषु तिव्रे धंमसिलन धंमकामता धंमानुशस्ति
च देवानंप्रियस
४. सो अस्ति अनुशयनं देवानंप्रियस विजिनितिय कलिगानि
५. अविजितं हि विजिनामने यो तत्र वध व मरणं व अपवहो व जनस तं
बाढं वेदनियमतं गुरुमतं च देवानंप्रियस
६. इमं पि चु ततो गुरुमततरं देवानंप्रियस
७. ये तत्र वसति ब्रह्मण व श्रमण व अंने व प्रषंड गृहथ व येसु विहिता एष
अग्रिभुसुसा मातापितुषु सुस्रुषा गुरुन सुस्रुषा मित्रसंस्तुतसहायनातिकेषु
दासभटकनम सम्यप्रतिपति दिढभतित तस तत्र भवति उपघातो व वधो व
अभिनिष्क्रमनं व प्रियजननं
८. येष व पि सुविहितानं सिनेहो अविप्रहीनो ए तेष मित्रसंस्तुतसहायनातिक
व्यसनं प्रापुनंति तत्र ते पिन हंदि सो उपघातो होति
९. प्रतिभागो च एस सवमनुषानं च गुरुमतो च देवानंप्रियस
१०. नस्ति च एकतारे पि जनपदे यत्र न सन्ति एते निकाया अन्नत योनेषु
११. सो समणे प्रषंडे नथि यत्र नस्ति मनुषानं एकतरसि पि प्रषडसि न नमे प्रसादो
१२. सो यवतको जनो तदा कलिगेषु हतो च मुटो च अपवुढो च ततो शतभागे
वा सहस्रभागं वा अज गुरुमतो वो देवानंप्रियस
१३. यो पि च अपकरोति क्षमितवियमते व देवानंप्रियस य शको क्षमनाये


[पृष्ठ ३९]

शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख | ३९
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख
१. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के अभिषेक के आठ वर्ष हो चुकने पर
(उनके द्वारा) कलिंग पर विजय पायी गयी।
२. यहाँ से डेढ़ लाख प्राणी बंदी बनाकर बाहर निकाले गये, एक लाख
मारे या कटे और इससे कई गुना (प्रतिशत) मर गये।
३. उसके पश्चात् अब कलिंग के हाथ आने पर देवानंप्रिय का
धर्म-अनुशीलन, धर्म के प्रति अनुराग और धर्मानुशासन तीव्र हो उठा है।
४. कलिंग पर विजय पाकर देवानंप्रिय को पश्चात्ताप हुआ है।
५. क्योंकि अविजित (देश) को विजय करने समय वहाँ पर लोगों का जो
मारण, मरण अथवा निर्वासन होता है, वह देवानंप्रिय के मन में बहुत
पीड़ादायक और गंभीर (भारी) है।
६. परंतु देवानंप्रिय के मन में यह और भी गंभीर (भारी) है कि-
७. वहाँ पर जो ब्राह्मण, श्रमण, अन्य संप्रदाय वाले अथवा गृहस्थ निवास
करते हैं- जिनमें गुरुजनों की सेवा, माता-पिता की सेवा, वृद्धजनों की सेवा,
मित्रों, परिचितों, सहायकों, ज्ञातिभाइयों, दासों एवं भृत्यों के प्रति सम्यक
व्यवहार और दृढ़ भक्ति का चलन है- वहाँ पर उनका आघात, वध अथवा
प्रियजनों का देश निकाला होता है।
८. अथवा जो लोग स्वयं तो सुरक्षित होते हैं, परंतु उनके मित्र, परिचित,
सहायक (अथवा) सगे-भाई विपत्तिग्रस्त हो जाते हैं (उनके प्रति उनका) स्नेह
अक्षुण्ण होने के कारण उनकी भी अत्यंत क्षति पहुँचती है।
९. इसके अतिरिक्त सब मनुष्य होते हैं परंतु देवानंप्रिय के लिए यह (और
भी) गंभीर (भारी) है।
१०. और ऐसा (कोई) नहीं है सिवाय किसी न किसी संप्रदाय में अनुराग
न होता हो।
११. इसलिए जितने भी लोग उस समय कलिंग में मारे गये, मर गये
अथवा निर्वासित हुए, उनका सौवां भाग अथवा हजारवाँ भाग भी आज
देवानंप्रिय के मन में गंभीर (भारी) होगा।
१२. और जो कोई भी अपकार करे, देवानंप्रिय के मन में, उसे जहाँ तक
क्षमा परंतु क्षमा कर देना चाहिए।

२० / सम्राट अशोक के अभिलेख
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख / २१


[मूल प्राकृत पाठ]

१३. य पि च अटवि देवानंप्रियस विजिते भोति त पि अनुनेति अनुनिशि...
१४. अनुतपे पि च प्रभवे देवानंप्रियस वुचति तेष किति अवत्रपु न च
हंञेयुसु
१५. इच्छति हि देवानंप्रियो सवभूतान अक्षाति संयमं समचर्यं रभसिये
१६. अयि च मुख्यमु विजये देवानंप्रियस यो ध्रमविजयो
१७. सो च पुन लधो देवानंप्रियस इह च सवेषु च अंतेषु आ षषु पि
योजनशतेषु यत्र अंतियोको नम योनराज परं च तेन अंतियोकेन चतुर ४ राजा
तुरमये नम अंतिकिनि नम मग नम अलिकसुदरो नम निच चोड़पंड आ
तंभपंणिय
१८. एवमेव हिद राजविषयस्मि योनकंबोजेषु नाभकनाभिपंतिषु
भोजपितिनिकेषु अंध्रपारिदेषु सवत्र देवानंप्रियस ध्रमानुशस्ति अनुवतंति
१९. यत्र पि देवानंप्रियस दूता न व्रजंति ते पि श्रुतु देवानंप्रियस ध्रमवुटं
विधानं ध्रमानुशस्ति ध्रम अनुविधियंति अनुविधियिषंति च
२०. यो स लधे एतकेन भोति सवत्र विजयो सवत्र पुन विजयो प्रितिरसो सो
२१. लध भोति प्रिति ध्रमविजयस्मि
२२. लहुक तु खो सो प्रिति
२३. पारत्रिकमेव महफल मञति देवानंप्रियो
२४. एतये च अथये अयि ध्रमलिपि निपिस्त किति पुत्र पपोत्र मे असु नवं
विजयं म विजेतविय मञिषु स्वकसि यो विजये खंति च लहुदंड च रोचेतु तमे
व यो विज मञतु यो ध्रमविजयो
२५. सो हिदलोगिको परलोकिको


[हिन्दी अनुवाद]

१३. और देवानंप्रिय के राज्य में जो वनवासी लोग हैं उनको भी वह अनुनय करते हैं (और अपनी विचारधारा) में ढालते हैं।
१४. और उनको जतलाया जाता है कि दुःखी होने पर भी देवानंप्रिय में (दंड देने की) क्षमता है जिससे कि वे (अपने दुराचरण के लिए) लज्जित हों और मृत्यु (दंड) से बचे रहें।
१५. देवानंप्रिय चाहते हैं कि विप्लव के समय सब प्राणियों की यथास्थिति, आत्मसंतुलन तथा शांतिपूर्ण चर्या बनी रहे।
१६. और यह जो धर्मविजय है, देवानंप्रिय के मत में वही मुख्य विजय है।
१७. और फिर इसे देवानंप्रिय ने यहां और सब सीमावर्ती राज्यों में छः सौ योजन की दूरी तक - जहां अंतियोक नाम का यवन राजा और उस अंतियोक से परे तुरमय, अंतिफिन, मफ (तथा) अलिक्सुंदर नाम के चार (४) राजा (राज्य करते) हैं - और नीचे (दक्षिण में) चोल या पांड्य, ताम्रपर्णी तक प्राप्त किया है।
१८. इसी प्रकार यहां राजा के राज्य में, यवनों एवं कंबोजों में, नाभकों तथा नाभिपंक्तियों में, भोजों और पितिनिकों में, आंध्रों एवं पुलिंदों में - सभी जगह देवानंप्रिय के धर्मानुशासन का अनुवर्तन किया जाता है।
१९. जहां-जहां देवानंप्रिय के दूत नहीं जाते हैं, वहां-वहां भी लोग देवानंप्रिय के धर्मवृत्त, विधान तथा धर्मानुशासन को सुनकर धर्म का पालन कर रहे हैं और करते रहेंगे।
२०. इससे जो यह सर्वत्र और बार-बार विजय प्राप्त हुई है वह तृप्ति दिलाने वाली है।
२१. धर्म द्वारा विजय प्राप्त करने से (मुझे) तृप्ति प्राप्त हुई है।
२२. परंतु यह तृप्ति वस्तुतः अल्प (महत्व की) है।
२३. देवानंप्रिय (भवसागर से) पार ले जाने वाले (लाभ) को ही बड़ा फल मानते हैं।
२४. और इस प्रयोजन के लिए यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है कि मेरे पुत्र, प्रपौत्र जो हों वे नयी विजय को विजय-योग्य न मानें, और यदि इन्हें विजय में रस मिलता ही हो तो वे क्षमा कर देने और हल्का दंड देने में ही रुचि लें और धर्म-विजय को ही (सच्ची) विजय समझें।
२५. वह (विजय) इहलोक और परलोक दोनों में फल देने वाली होती है।

बायाँ पृष्ठ (मूल प्राकृत पाठ)

२२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
२६. सवचरिति भोतु य धंमरति
२७. स हि हिदलोकिक परलोकिक
गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख
१. अयं धंमलिपी देवानंपियेन पियदसिना राजा लेखापिता अस्ति एव
संखितेन अस्ति मझेमेन अस्ति विस्ततेन
२. न च सर्वं सर्वत घटितं
३. महाल्के हि विजिते बहु च लिखितं लिखापयिसं चेव
४. अस्ति च एत के पुन पुन वुत्तं तस तस अथस माधुरताय किति जनो
तथा पटिपजेथ
५. तत्र एकदा असमातं लिखितं अस देसं व सछाय कारणं व अलोचयित्व
लिपिकरापरधेन व
धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख
१. देवानंपियस वचनेन तोसलियं महामतात नगरवियोवहालका वतविय
२. अं किछि दखामि हकं तं इछामि किति कंमन पटिपादयेहं दुवालते च
आलंभहं
३. एस च मे मोख्यमत दुवाल एतसि अथसि जं तुफेसु अनुसथि
४. तुफे हि बहुसु पानसहसेसु आयत पनवयं गछेमु हु सुनितानं
५. सवे मुनिसे पजा ममा
६. अथा पजाये इछामि हकं किति सवेन हितसुखेन
हिदलोकिक-पाललोकिकेन यूजेवु ति तथा...... मुनिसेसु पि इछामि हकं
७. नो च पापुनाथ आव-सुके इयं अठे


दायाँ पृष्ठ (हिन्दी अनुवाद)

गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख / २३
२६. जो धर्मरति है वही पूर्णतः अतिरति है।
२७. वही इहलौकिकी और पारलौकिकी है।
गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख
१. यह धर्मलिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवायी गयी है -
(यह) संक्षेप में है, मध्यम (आकार) में है (अथवा) विस्तार में है।
२. सब कुछ सब जगह के लिए उपयुक्त नहीं था।
३. क्योंकि (मेरा) साम्राज्य विशाल है और बहुत कुछ लिखा गया है और
लिखवाना भी है।
४. इसमें कुछ ऐसा भी है जो किसी-किसी विषय की रोचकता के कारण
बार-बार कहा गया है। सो क्यों? (वह इसलिए कि) लोग वैसा प्रतिपादन करें
(अर्थात्, उसे जीवन में उतारें)।
५. यह देख कर कि (शिला पर) स्थान (की कमी है) अथवा (शिला)
क्षति-ग्रस्त है अथवा लिपिकार की भूल से भी इनमें कहीं-कहीं अधूरा लिखा
हुआ हो सकता है।
धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख
१. देवानंप्रिय के हवाले से तोसली के महामात्रों को, जो नगर के
न्याय-शासक हैं, (इस प्रकार) कहना चाहिए -
२. मैं जो कुछ (उचित) समझता हूं, उसके बारे में चाहता हूं कि कैसे इसे
क्रियान्वित करूं और ढंग से इसकी शुरुआत करूं।
३. और मेरे विचार में इसका मुख्य उपाय यह है कि इस प्रयोजन के लिए
मैं आपको अनुदेश दूं।
४. आप कितने ही हजारों प्राणियों के बीच स्थापित हैं, (इसलिए कि आप)
मनुष्यों का प्रेम प्राप्त कर सकें।
५. सारे मनुष्य मेरी संतान हैं।
६. जिस प्रकार मैं (अपनी) संतान के लिए कामना करता हूं कि वह
इहलोक तथा परलोक में हितसुख-लाभी हो वैसे ही (सभी) मनुष्यों के लिए मेरी
मनोकामना है।
७. आप नहीं समझते कि मेरा मंतव्य कितना गहरा है।

यहाँ पृष्ठ के अनुसार दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:


[पृष्ठ २४]

२४ / सम्राट अशोक के अभिलेख

८. केछ व एकपुलिसे..... नाति एतं से पि देसं नो सर्वं
९. देखत हि तुम्फे एतं सुविहिता पि
१०. नितियं एकपुलिसे पि अथिवे बंधनं वा परिकिलेसं वा पापुनाति
११. तत होति अकस्मा तेन बधनंतिक अंत च.... हुं जने दविये दुखीयति
१२. तत इच्छितविये तुम्फेहि किति मझं परिपादयेमा ति
१३. इमेहि चु जातेहि नो संपटीपजति इसाय आसुलोपेन निथूलियेन
तुलनाय अनावूतिय आलसियेन क्लमथेन
१४. से इच्छितविये किति एते जाता नो हुवेवु ममा ति
१५. एतस च सवस मूले अनासलोपे अतूलना च
१६. नितियं ए किछंते सिया न ते उगे संचलितविये तु वटितविये एतविये वा
१७. हेवमेवं ए देखेय तुफाक तेन वतविये आननं देखत हेव च हेव च
देवानंपियस अनुसथि
१८. से महाफले ए तस संपटिपाद महाअपाये असंपटिपत्ति ।
१९. विपटिपाययमीने हि एतं नथि स्रगस आरधि नो राजागधिवि
२०. दुआहले हि इमंस कंमस मं कृते मनोअतिक्रे
२१. संपटिपजयंमीने चु एतं स्वर्गं आराधयिस्यथ मम च आननियं एहथ
२२. इयं च लिपि तिखनखतेन सोतविया


[पृष्ठ २५]

धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख / २५

८. कदाचित कोई एकाध व्यक्ति इसे समझता भी है तो वह भी थोड़ा-सा
ही, पूरा नहीं।
९. (अब) आप इस ओर ध्यान दें, जैसी कि आपकी सुविधा भी है।
१०. नीति के अनुसरण में कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जिसे कारावास
अथवा यातना का दंड मिला हो।
११. वहां अकस्मात उस बंधन में उसका प्राणांत हो जाता है और दूसरे
(बहुत से) लोग लंबे समय तक दुःखी होते रहते हैं।
१२. इसलिए आपको (विचारना) चाहिए कि कैसे मध्यम मार्ग का
अनुसरण करें।
१३. परंतु इन प्रवृत्तियों से सम्यक् आचरण नहीं हो सकता - ईर्ष्या,
अनवधानता, निष्ठुरता, त्वरा (जल्दबाजी), अनावृत्ति (अभ्यास न रहना),
आलस्य और क्लान्ति (थकान)।
१४. इसलिए आपको चेष्टा करनी चाहिए कि ये प्रवृत्तियां मेरी न हों।
१५. और इन सबकी तह में हैं- अनवधानता (सजगता) और अतत्वरा
(जल्दबाजी का अभाव, समता)।
१६. जो हर समय थके-थके रहते हैं वे उन्नति नहीं कर सकते। अतः चलना
चाहिए, डोलना चाहिए, गतिशील होना चाहिए।
१७. जो इस प्रकार समझ जाय उसे आप लोगों को कहना चाहिए-
"आप (राजा के प्रति अपने ऋण से) उऋण होने की ओर ध्यान दें - ऐसी-ऐसी
देवानांप्रिय की अनुशास्ति है।
१८. "इसका सम्यक् रूप से प्रतिपादन करना बड़ा फलदायक है जबकि
प्रतिपादन न करना बड़ा विनाशकारक है।
१९. "क्योंकि (जो लोग) प्रतिपादन नहीं कर पाते हैं उन्हें न तो स्वर्ग की
प्राप्ति होती है, और न ही राजा की कृपा।"
२०. इस बारे में मैं इतना अधिक क्या सोचता हूं उसका कारण यह है कि
इस काम से दो फल प्राप्त होते हैं-
२१. इसका सम्यक् प्रतिपादन करने से स्वर्ग प्राप्त करोगे और मेरे ऋण से
उऋण हो जाओगे।
२२. और इस लिखावट को तिष्य नक्षत्र में (सभी द्वारा) सुना जाना
चाहिए।

२६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
२३. अंतला पि च तिसेन खनसि खनसि एकैन पि सोतविय
२४. हेवं च कलंतं तुफे चघथ संपटिपदायितवे
२५. एताये अथाये इयं लिपि लिखित हिद एन नगलोवियोहालका ससव
समयं यूजेवू ति.... नस अकस्मा पलिबोधे व अकस्मा पलिकिलेसे व नो सिया ति
२६. एताये च अठाये हकं.... मते पंचसु पंचसु वसेसु निखामयिसामि ए
अखखसे अचंडे सखिनालंभे होसति एतं अठं जानितु.... तथा कलंति अथ मम
अनुसथीति
२७. उजेनिते पि चु कुमाले एताये व अठाये निखामयिस.... हेदिसमेव वगं
नो च अतिकामयिसति तिनि वसानि
२८. हेमेव तखसिलाते पि
२९. अदा अ.... ते महामाता निक्खमिसंति अनुसयानं तदा अगहयितु
अतने कंमं एतं पि जानिसंति तं पि तथा करूँति