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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 80 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

१४ / सम्राट अशोक के अभिलेख

गिरनार शिला : दशम अभिलेख

१. देवानंपियो प्रियदसि राजा यसो व कीति व न महाथावहा मञते अञत्र
तदायत्वो दिघाय च मे जनो धंमसुसुसा सुसुसता धंमवुतं च अनुविधीयता
२. एतकाय देवानंपियो पियदसि राजा यसो व किति व इच्छति
३. यं तु किचि परिकमते देवानं प्रियदसि राजा त सवं पारत्रिकाय किति
सकले अपपरिस्रवे अस
४. एस तु परिसवे य अपुञं
५. दुकरं तु खो एतं छुदकेन व जनेन उसटेन व अञत्र अग्रेन पराकमेन सवं
परिचजित्पा
६. ए तु खो उसटेन दुकरं


गिरनार शिला : एकादश अभिलेख

१. देवानंपियो पियदसि राजा एवं आह
२. नास्ति एतारिसं दानं यारिसं धंमदानं धंमसंतवो वा धंमसंविभागो वा
धंमसंबंधो व
३. तत इदं भवति दासभतकम्हि सम्यप्रतीपती मातरि पितरा साधु सुस्रुसा
मितसंस्तुतञातिकानं बाम्हणसमणानं साधु दानं प्राणां अनारंभो साधु
४. एत वतव्यं पिता व पुत्रेन व भ्राता व मितसंस्तुतञातीकेन व आव
पटीवेसियेहि इदं साधु इदं कतव्यं
५. सो तथा करु इलोक्यस आरधो होति परत च अनंतं पुञं भवति तेन
धंमदानेन


गिरनार शिला : दशम अभिलेख / १५

गिरनार शिला : दशम अभिलेख

१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा यश अथवा कीर्ति को (कोई) बहु महत्त्व की
वस्तु नहीं मानते सिवाय इसके कि अभी, और दीर्घ काल तक, उनकी प्रजा धर्म
की बात सुनने को लालायित रहे और धर्म का आचरण करे (क्योंकि यह उनका
मंतव्य है)।
२. इतने (मात्र) के लिए देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा यश वा कीर्ति की
कामना करते हैं।
३. जो कुछ पराक्रम (उद्यम) देवानां (प्रिय) प्रियदर्शी राजा करते हैं वह सब
(भवसागर से) पार जाने के लिए है कि कैसे सब (लोग) (अपने-अपने)
परिस्रवों (पापकर्मों) से मुक्तप्राय हो जायं।
४. जो अ-पुण्य (अर्थात्, पाप) है वही 'परिस्रव' (कहलाता) है।
५. परंतु निश्चय ही किसी छोटे या बड़े व्यक्ति द्वारा बिना सब
(आसक्तियां) छोड़ हुए और बिना उत्तम पराक्रम किये हुए, यह कर पाना
कठिन है।
६. और बड़े व्यक्ति द्वारा तो यह निःसंदेह (अपेक्षाकृत अधिक) दुःसाध्य है।


गिरनार शिला : एकादश अभिलेख

१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. ऐसा कोई दान नहीं है जैसा कि धर्म का दान। (ऐसा कोई परिचय नहीं
है जैसा कि) धर्म का परिचय। (ऐसा कोई बंटवाड़ा नहीं है जैसा कि) धर्म का
बंटवाड़ा। (ऐसा कोई संबंध नहीं है जैसा कि) धर्म का संबंध।
३. उसमें यह होता है कि दासों और भृत्यों के प्रति सम्यक व्यवहार उत्तम
होता है; माता-पिता की सेवा उत्तम होती है; मित्रों, परिचितों, जातिभाइयों,
ब्राह्मणों तथा श्रमणों को दान देना उत्तम होता है (और) प्राणियों की हिंसा न
करना उत्तम होता है।
४. पिता, पुत्र, भाई, मित्र, परिचित, जातिभाई - यहां तक कि पड़ोसियों
द्वारा भी- यह कहा जाना चाहिए: "यह उत्तम है, इसे करना चाहिए।"
५. ऐसा करने वाले को उस धर्मदान से इस लोक की प्राप्ति (अर्थात्,
सिद्धि) होती है और परलोक में असीम पुण्य मिलता है।