सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
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४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
मूल पाठ (प्राकृत)
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
१. देवानंपियो पियदसि राजा एवं आह
२. द्वादसवसाभिसितेन मया इदं आज्ञापितं
३. सर्वत विजिते मम युता च राजुके च प्रादेशिके च पंचसु पंचसु वासेसु
अनुसंयान नियातु एतायेव अथाय इमथ धंमानुसस्तिय यथा अञाय पि कम्माय
४. साधु मातरि च पितरि च सुसूसा मित्रसंस्तुतज्ञातीनं बाम्हण-समणानं
साधु दानं प्राणानां साधु अनांरभो अपव्ययता अपभांडता साधु
५. परिसा पि युते आज्ञापयिसति गणनायं हेतुतो च व्यंजनतो च
गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
मूल पाठ (प्राकृत)
गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
१. अतिक्रातं अंतरं बहुनि वर्षशतानि वढितो एव प्राणालंभो विहिंसा च
भूतानं ज्ञातीसु असंमतिपती ब्राम्हणसमणानं असंप्रतिपत्ती
२. त अज्ज देवानंपियस पियदसिनो राञो धंमचरणेन भेरीघोसो अहो
धंमघोसो विमानदरंसणा च हथिदसणा च अगिखंधानि च अञानि च दिव्यानि
रूपाणि दर्सयित्वा जनं
३. यारिसे बहुहि वर्षसतेहि न भूतपुवे तारिसे अज्ज वढिते देवानंप्रियस
पियदसिनो राञो धंमानुसस्तिया अनारंभो प्राणांन अविहिंसा भूतानं ज्ञातीनं
संपटिपत्ती ब्राम्हणसमणानं संपटिपत्ती मातरि पितरि सुसूसा थेरसुसूसा
४. एस अञे च बहुविधे धंमचरणे वढिते
५. वढयिसति चेव देवानंपियो पियदसि राजा धंमचरणं इदं
६. पुता च पोता च प्रपोता च देवानंपियस पियदसिनो राञो प्रवर्धयिसंति
इदं धंमचरणं आव संवटकपा धंमंम्हि सीलम्हि चिनिट्ठाय धंमं अनुसासिसंति
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गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख / ५
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
हिन्दी अनुवाद
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह आज्ञा जारी की गयी
है।
३. मेरे राज्य में सब जगह युक्त, रज्जुक और प्रादेशिक यह जो धर्म का
अनुशासन है- इसी प्रयोजन के लिए हर पांच वर्षों में (अपने-अपने
क्षेत्राधिकार में) सम्यक् प्रकार से दौरा करने के लिए नियमपूर्वक जाएं जैसे कि
दूसरे कामों के लिए भी जाया करते हैं।
४. माता-पिता की सेवा करना उत्तम है; मित्रों, परिचितों, ज्ञाति-भाइयों,
ब्राह्मणों और श्रमणों को दान देना उत्तम है; प्राणियों की हत्या न करना उत्तम
है; कम खर्च करना और कम संचय करना उत्तम है।
५. संक्षेप में और विस्तार के साथ योग रखने के लिए युक्तों को परिषदें
भी आदेश देंगी।
गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
हिन्दी अनुवाद
गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
१. कितने ही सैकड़ों वर्षों का अंतराल हो गया है जब से प्राणियों की बलि,
जीवों की विहिंसा तथा ज्ञाति-भाइयों, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति अनादर का
भाव बढ़ता ही गया गया है।
२. परंतु आज लोगों को देवयान दिखाया कर, हाथी दिखाया कर, अग्नि की
मशालों और अन्य अलौकिक दृश्यों को दिखाया कर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा
के धर्माचरण से भेरी का नाद धर्म का नाद हो गया है।
३. जैसा कि कितने ही सैकड़ों वर्षों में पहले कभी नहीं हुआ वैसा आज
देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के धर्मानुशासन से प्राणियों का अ-वध, जीवों की
अविहिंसा, ज्ञाति-भाइयों, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति आदर का भाव और
माता-पिता तथा वृद्धजनों के प्रति सेवा का भाव बढ़ने लगा है।
४. यह और अन्य बहुत प्रकार से धर्म का आचरण बढ़ गया है।
५. और बढ़ना ही रहेगा। देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा का यह धर्माचरण।
६. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र सृष्टि के विनाश
तक इस धर्मचरण को बढ़ाते चले जाएंगे और धर्म तथा शील में प्रतिष्ठित
हुए-हुए वे धर्म का अनुशासन करेंगे।