सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंHere is the complete and precise transcription of the provided image containing the Prakrit text and Hindi translation of Ashoka's Major Rock Edicts (Girnar Shila: First and Second Edicts):
२ / सम्राट अशोक के अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख / ३
मूल अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ हिंदी रूपांतर
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
१. इयं धंमलिपी देवानंपियेन प्रियदसिना राञा ले खापिता $\qquad\qquad$ १. यह धर्मलिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवायी गयी है।
२. इध न किंचि जीवं आरभित्पा प्रजूहितव्यं $\qquad\qquad\qquad\qquad$ २. यहां किसी जीव को मार कर होम नहीं किया जाना चाहिए।
३. न च समाजो कतव्यो $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ३. और न ही इन्द्रियलोलुपता को बढ़ावा देने वाला उत्सव किया जाना
४. बहुकं हि दोसं समाजम्हि पसति देवानंपियो प्रियदसि राजा $\qquad\quad$ चाहिए।
५. अस्ति पि तु एकाचा समाजा साधुमता देवानंपियस प्रियदसिनो राञो $\qquad$ ४. क्योंकि ऐसे उत्सव में देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा बहुत बुराई देखते हैं।
६. पुरा महानसम्हि देवानंपियस प्रियदसिनो राञो अनुदिवसं बहूनि $\qquad$ ५. फिर भी कोई-कोई उत्सव तो हैं ही, जो देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के
प्राणसतसहस्रानि आरभिसु सूपाथाय $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ मत में अनिंद्य हैं।
७. से अज यदा अयं धंमलिपी लिखिता ती एव प्राणा आरभरे सूपाथाय द्वो $\quad$ ६. पहले देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के रंधनागार में प्रतिदिन बहुत से,
मोरा एको मगो सो पि मगो न ध्रुवो $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ सैंकड़ों-हजारों, प्राणी सूप के प्रयोजन से मारे जाते थे।
८. एते पि त्री प्राणा पछा न आरभिसरे $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ ७. परंतु आज, जबकि यह धर्मलिपि लिखी गयी है, सूप के प्रयोजन से
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ तीन ही प्राणी मारे जाते हैं - दो मोर और एक पशु - और वह पशु भी
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ नित्यप्रति नहीं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ८. ये तीन प्राणी भी बाद में नहीं मारे जाएंगे।
गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख
१. सर्वत विजितम्हि देवानंपियस पियदसिनो राञो एवमपि प्रचंतेसु यथा $\quad$ १. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के राज्य में सर्वत्र और इसी प्रकार सीमा से
चोडा पाडा सतियपुतो केतलपुतो आ तंबपंणी अंतियको योनराजा ये वा पि $\quad$ सटे हुए पड़ोसी राज्यों में - जैसे चोड, पांड्य, सत्यपुत्र, केरलपुत्र, ताम्रपर्णी
तस अंतियकस सामीपं राजानो सर्वत्र देवानंप्रियस प्रियदसिनो राञो द्वे चिकीछ $\quad$ भी, यवनराजा अंतियोक और जो भी उस अंतियोक के समीपवर्ती राजा हैं -
कता मनुसचिकीछा च पसुचिकीछा च $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ सब जगह देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा की (ओर से) मनुष्यों के लिए चिकित्सा
२. ओसुढानि च यानि मनुसोपगानि च पसोपगानि च यत यत नास्ति $\quad$ और पशुओं के लिए चिकित्सा - दो (प्रकार की) चिकित्सा (व्यवस्थाएं) की हुई
सर्वत्रा हारापितानि च रोपापितानि च $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ हैं।
३. मूलानि च फलानि च यत यत्र नास्ति सर्वत हारापितानि च रोपापितानि च $\quad$ २. और मनुष्यों तथा पशुओं के लिए उपयोगी जो औषधियां जहां जहां
४. पंथेसू कूपा च खानापिता व्रछा च रोपापिता परिभोगाय पसुमनुसानं $\quad$ नहीं हैं उन सब स्थानों पर मंगवायी गयी हैं और लगवा दी गयी हैं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ३. और कंदमूल तथा फल जहां-जहां नहीं हैं उन सब स्थानों पर मंगवाये
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गये हैं और लगवा दिये गये हैं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ४. और पशुओं तथा मनुष्यों के प्रचुर उपयोग के लिए मार्गों पर कुएं
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ खुदवाये गये हैं और वृक्ष लगवाये गये हैं।