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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 4, कुल 80 में से

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सम्राट अशोक : संक्षिप्त परिचय
भारतवर्ष के लिए यह अत्यंत गौरव की बात है कि उसकी धरती पर जन्मे
सम्राट अशोक का नाम केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में, बहुत ही
आदर के साथ लिया जाता है। ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध लेखक एच. जी. वेल्स ने
अशोक की गणना विश्व इतिहास के छः महानतम व्यक्तियों में की है। यूनेस्को
कलिंग प्राईज १९८५ के लारिएट सर एग्गरमोंट ने इसके बारे में अपने उद्गार
व्यक्त करते हुए कहाः 'अशोक को आज विश्व का सम्राट होना चाहिए था।'
इसी विभूति का संक्षिप्त परिचय नीचे की चंद पंक्तियों में दिया जा रहा है।
अशोक के जीवन के बारे में मुख्य-मुख्य जानकारी निम्न स्रोतों से मिलती है -
१. दिव्यावदान (असोकावदान) २. दीपवंस ३. महावंस ४. पुराण ५.
सम्राट अशोक के शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख
सम्राट के प्रारंभिक जीवन के बारे में अनेक दंतकथाएं भी प्रचलित हैं पर
इनमें से कितनी ही निःसार प्रतीत होती हैं। इनमें से कुछ तो भारतीय मूल की
हैं और शेष अधिकतर श्रीलंका से प्रसरित हुई हैं। एक कथा के अनुसार
अशोक पहले बड़े चंड स्वभाव का था, पर बाद में भगवान बुद्ध की शिक्षा को
अपनाने से बड़ा धार्मिक व्यक्ति बन गया। इस प्रकार वह 'चंडाशोक' से
'धम्माशोक' बन गया।
सम्राट के जीवन के घटनाक्रम के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। फिर भी
प्रायःकर वे सभी इसका प्रामाणिक स्रोत उन अभिलेखों को तो मानते ही हैं जिन्हें
अशोक ने अपने शासनकाल में समय समय पर अपने विशाल साम्राज्य में
महत्त्वपूर्ण स्थानों पर शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाया था। स्वर्गीय श्री
रवींद्रनाथ टैगोर का भी चिंतन है कि सम्राट अशोक ने चट्टानों पर लेख इसीलिए
खुदवाये कि वह जो आवाज इनमें भरे वही आवाज सदियों तक लोगों के
श्रवणगोचर होती रहे। इन अभिलेखों को पढ़ते समय बहुत बार सचमुच ऐसे
लगने लगता है मानों अशोक स्वयं अपनी धर्मलिपि पढ़ कर हमें सुना रहा हो।
अशोक मौर्य वंश का तीसरा बड़ा सम्राट था। चंद्रगुप्त इसके पितामह और
बिंदुसार इसके पिता थे। शासन की बागडोर संभालने से पहले अपने पिता के