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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 80 में से

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पृष्ठ 18

Here is the complete line-by-line transcription of both pages:


[पृष्ठ ३८]

३८ / कुमार अशोक के अभिलेख
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख
१. अठवर्षअभिसितस देवानंप्रियस प्रियद्रशिस रञो कलिग विजित
२. दियढमत्रे प्राणशतसहस्रे ये ततो अपवुढे शतसहस्रमात्रे तत्र हते
बहूतावते वा मुटे
३. ततो पछा अधुना लधेषु कलिगेषु तिव्रे धंमसिलन धंमकामता धंमानुशस्ति
च देवानंप्रियस
४. सो अस्ति अनुशयनं देवानंप्रियस विजिनितिय कलिगानि
५. अविजितं हि विजिनामने यो तत्र वध व मरणं व अपवहो व जनस तं
बाढं वेदनियमतं गुरुमतं च देवानंप्रियस
६. इमं पि चु ततो गुरुमततरं देवानंप्रियस
७. ये तत्र वसति ब्रह्मण व श्रमण व अंने व प्रषंड गृहथ व येसु विहिता एष
अग्रिभुसुसा मातापितुषु सुस्रुषा गुरुन सुस्रुषा मित्रसंस्तुतसहायनातिकेषु
दासभटकनम सम्यप्रतिपति दिढभतित तस तत्र भवति उपघातो व वधो व
अभिनिष्क्रमनं व प्रियजननं
८. येष व पि सुविहितानं सिनेहो अविप्रहीनो ए तेष मित्रसंस्तुतसहायनातिक
व्यसनं प्रापुनंति तत्र ते पिन हंदि सो उपघातो होति
९. प्रतिभागो च एस सवमनुषानं च गुरुमतो च देवानंप्रियस
१०. नस्ति च एकतारे पि जनपदे यत्र न सन्ति एते निकाया अन्नत योनेषु
११. सो समणे प्रषंडे नथि यत्र नस्ति मनुषानं एकतरसि पि प्रषडसि न नमे प्रसादो
१२. सो यवतको जनो तदा कलिगेषु हतो च मुटो च अपवुढो च ततो शतभागे
वा सहस्रभागं वा अज गुरुमतो वो देवानंप्रियस
१३. यो पि च अपकरोति क्षमितवियमते व देवानंप्रियस य शको क्षमनाये


[पृष्ठ ३९]

शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख | ३९
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख
१. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के अभिषेक के आठ वर्ष हो चुकने पर
(उनके द्वारा) कलिंग पर विजय पायी गयी।
२. यहाँ से डेढ़ लाख प्राणी बंदी बनाकर बाहर निकाले गये, एक लाख
मारे या कटे और इससे कई गुना (प्रतिशत) मर गये।
३. उसके पश्चात् अब कलिंग के हाथ आने पर देवानंप्रिय का
धर्म-अनुशीलन, धर्म के प्रति अनुराग और धर्मानुशासन तीव्र हो उठा है।
४. कलिंग पर विजय पाकर देवानंप्रिय को पश्चात्ताप हुआ है।
५. क्योंकि अविजित (देश) को विजय करने समय वहाँ पर लोगों का जो
मारण, मरण अथवा निर्वासन होता है, वह देवानंप्रिय के मन में बहुत
पीड़ादायक और गंभीर (भारी) है।
६. परंतु देवानंप्रिय के मन में यह और भी गंभीर (भारी) है कि-
७. वहाँ पर जो ब्राह्मण, श्रमण, अन्य संप्रदाय वाले अथवा गृहस्थ निवास
करते हैं- जिनमें गुरुजनों की सेवा, माता-पिता की सेवा, वृद्धजनों की सेवा,
मित्रों, परिचितों, सहायकों, ज्ञातिभाइयों, दासों एवं भृत्यों के प्रति सम्यक
व्यवहार और दृढ़ भक्ति का चलन है- वहाँ पर उनका आघात, वध अथवा
प्रियजनों का देश निकाला होता है।
८. अथवा जो लोग स्वयं तो सुरक्षित होते हैं, परंतु उनके मित्र, परिचित,
सहायक (अथवा) सगे-भाई विपत्तिग्रस्त हो जाते हैं (उनके प्रति उनका) स्नेह
अक्षुण्ण होने के कारण उनकी भी अत्यंत क्षति पहुँचती है।
९. इसके अतिरिक्त सब मनुष्य होते हैं परंतु देवानंप्रिय के लिए यह (और
भी) गंभीर (भारी) है।
१०. और ऐसा (कोई) नहीं है सिवाय किसी न किसी संप्रदाय में अनुराग
न होता हो।
११. इसलिए जितने भी लोग उस समय कलिंग में मारे गये, मर गये
अथवा निर्वासित हुए, उनका सौवां भाग अथवा हजारवाँ भाग भी आज
देवानंप्रिय के मन में गंभीर (भारी) होगा।
१२. और जो कोई भी अपकार करे, देवानंप्रिय के मन में, उसे जहाँ तक
क्षमा परंतु क्षमा कर देना चाहिए।