सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 80 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

यहाँ पृष्ठ के अनुसार दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:


[पृष्ठ २४]

२४ / सम्राट अशोक के अभिलेख

८. केछ व एकपुलिसे..... नाति एतं से पि देसं नो सर्वं
९. देखत हि तुम्फे एतं सुविहिता पि
१०. नितियं एकपुलिसे पि अथिवे बंधनं वा परिकिलेसं वा पापुनाति
११. तत होति अकस्मा तेन बधनंतिक अंत च.... हुं जने दविये दुखीयति
१२. तत इच्छितविये तुम्फेहि किति मझं परिपादयेमा ति
१३. इमेहि चु जातेहि नो संपटीपजति इसाय आसुलोपेन निथूलियेन
तुलनाय अनावूतिय आलसियेन क्लमथेन
१४. से इच्छितविये किति एते जाता नो हुवेवु ममा ति
१५. एतस च सवस मूले अनासलोपे अतूलना च
१६. नितियं ए किछंते सिया न ते उगे संचलितविये तु वटितविये एतविये वा
१७. हेवमेवं ए देखेय तुफाक तेन वतविये आननं देखत हेव च हेव च
देवानंपियस अनुसथि
१८. से महाफले ए तस संपटिपाद महाअपाये असंपटिपत्ति ।
१९. विपटिपाययमीने हि एतं नथि स्रगस आरधि नो राजागधिवि
२०. दुआहले हि इमंस कंमस मं कृते मनोअतिक्रे
२१. संपटिपजयंमीने चु एतं स्वर्गं आराधयिस्यथ मम च आननियं एहथ
२२. इयं च लिपि तिखनखतेन सोतविया


[पृष्ठ २५]

धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख / २५

८. कदाचित कोई एकाध व्यक्ति इसे समझता भी है तो वह भी थोड़ा-सा
ही, पूरा नहीं।
९. (अब) आप इस ओर ध्यान दें, जैसी कि आपकी सुविधा भी है।
१०. नीति के अनुसरण में कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जिसे कारावास
अथवा यातना का दंड मिला हो।
११. वहां अकस्मात उस बंधन में उसका प्राणांत हो जाता है और दूसरे
(बहुत से) लोग लंबे समय तक दुःखी होते रहते हैं।
१२. इसलिए आपको (विचारना) चाहिए कि कैसे मध्यम मार्ग का
अनुसरण करें।
१३. परंतु इन प्रवृत्तियों से सम्यक् आचरण नहीं हो सकता - ईर्ष्या,
अनवधानता, निष्ठुरता, त्वरा (जल्दबाजी), अनावृत्ति (अभ्यास न रहना),
आलस्य और क्लान्ति (थकान)।
१४. इसलिए आपको चेष्टा करनी चाहिए कि ये प्रवृत्तियां मेरी न हों।
१५. और इन सबकी तह में हैं- अनवधानता (सजगता) और अतत्वरा
(जल्दबाजी का अभाव, समता)।
१६. जो हर समय थके-थके रहते हैं वे उन्नति नहीं कर सकते। अतः चलना
चाहिए, डोलना चाहिए, गतिशील होना चाहिए।
१७. जो इस प्रकार समझ जाय उसे आप लोगों को कहना चाहिए-
"आप (राजा के प्रति अपने ऋण से) उऋण होने की ओर ध्यान दें - ऐसी-ऐसी
देवानांप्रिय की अनुशास्ति है।
१८. "इसका सम्यक् रूप से प्रतिपादन करना बड़ा फलदायक है जबकि
प्रतिपादन न करना बड़ा विनाशकारक है।
१९. "क्योंकि (जो लोग) प्रतिपादन नहीं कर पाते हैं उन्हें न तो स्वर्ग की
प्राप्ति होती है, और न ही राजा की कृपा।"
२०. इस बारे में मैं इतना अधिक क्या सोचता हूं उसका कारण यह है कि
इस काम से दो फल प्राप्त होते हैं-
२१. इसका सम्यक् प्रतिपादन करने से स्वर्ग प्राप्त करोगे और मेरे ऋण से
उऋण हो जाओगे।
२२. और इस लिखावट को तिष्य नक्षत्र में (सभी द्वारा) सुना जाना
चाहिए।