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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 80 में से

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पृष्ठ 15

[पृष्ठ ४२]

४२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
४. तेनेसा धंमयात्रा
५. एतयं होति बाम्हणसमणानं दसणे च दाने च थेरानं दसणे च
हिरंणपटीविधानो च जानपदस च जनस दसनं धंमानुसस्टी च धंमपरीपुछा च
तदोपया
६. एसा भुये रति भवति देवानामपियस प्रियदसिनो राजो भागे अंजे

गिरनार शिला : नवम अभिलेख
१. देवानंपियो पियदसि राजा एव आह
२. अस्ति जनो उचावचं मंगले करोते आबाधेषु वा आवाहवीवाहेसु वा
पुजनलाभेसु वा प्रवासासि वा एतम्हि च अञम्हि च जनो उचावचं मंगले करोते
३. एत तु महिडायो बहुकं च बहुविधं च छुदं च निरथं च मंगले करोते
४. त कतव्यमेव तु मंगले
५. अप्फले तु खो एतारिसं मंगले
६. अयं तु महाफले मंगले य धंममंगले
७. ततेत दासभतकम्हि सम्याप्रतीपती गुरूनां अपचिति साधु पाणेसु सयमो
साधु बम्हणसमणानं साधु दानं एत च अञ च एतारिसं धंममंगले नाम
८. त वतव्यं पिता व पुतेन वा भात्रा वा स्वामिकेन वा इदं साधु इदं कतव्य
मंगलं आव तस अथस निस्टानाय
९. अस्ति च पि वुतं साधु दान इति
१०. न तु एतारिसं अस्ता दानं व अनुगहो व यारिसं धंमदानं व अम्रनुगहो व
११. त तु खो मित्रेन व सुहृदयेन वा ज्ञातिकेन व सहायन व ओवादितव्यं
तंम्हि तंम्हि पकरणे इदं कतं इदं साध्व इति इमिना सक स्वर्गे आराधेतु इति
१२. कि व इमिना कतव्वतरं यथा स्वर्गारधी


[पृष्ठ ५३]

गिरनार शिला : नवम अभिलेख / ५३
४. उससे यह धर्म-यात्रा (का चलन आरंभ हुआ)।
५. इसमें होता है - ब्राह्मणों तथा श्रमणों का दर्शन और (उनके निमित्त)
दान, वयोवृद्धों का दर्शन और (उनका) सुवर्ण से पोषण, जनपद के लोगों का
दर्शन, धर्मदेशना और इस (अवसर) के अनुकूल धर्म के बारे में परिप्रश्न
(विस्तृत पूछताछ)।
६. यह आनन्दातिरेक देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के (शासन-काल के) अपर
भाग में प्राप्त होता है।

गिरनार शिला : नवम अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. ऐसे लोग हैं जो विपत्ति के समय, पुत्र-पुत्री के परिणय के समय,
पुत्र-जन्म के समय अथवा प्रवास-काल में नाना प्रकार के मंगलाचार करते हैं।
इन और इसी प्रकार के अन्य (अवसरों) पर लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के
मंगलाचरण करते हैं।
३. परंतु इनमें महिलाएं बहुदें और अनेक प्रकार के ओछे और निरर्थक
मंगलाचार करती हैं।
४. तो भी, मंगलाचार तो करने ही चाहिएं।
५. परंतु इस प्रकार के मंगलाचार निश्चय ही अल्प फल देने वाले होते हैं।
६. यह जो "धर्ममंगल" है वह मंगलाचार बहुत फल देने वाला होता है।
७. उसमें होता है-दासों तथा भृत्यों के प्रति शिष्ट व्यवहार, बड़ों के प्रति
आदर का भाव, प्राणियों के प्रति संयम (और) ब्राह्मणों तथा श्रमणों के निमित्त
दान-दक्षिणा। ये और इसी प्रकार के अन्य (आचरण) 'धर्ममंगल' कहलाते हैं।
८. तो पिता, पुत्र, भाई अथवा भर्तार को कहना चाहिए कि यह उत्तम है,
उस (अर्थात्, अभीष्ट) प्रयोजन की सिद्धि-पर्यंत यह मंगल करना चाहिए।
९. और कहा भी गया है: "दान देना उत्तम है।"
१०. ऐसा कोई दान अथवा उपकार नहीं होता है जैसा कि धर्म का दान
अथवा धर्म का उपकार।
११. इसलिए मित्र, सुहृद, ज्ञाति-भाई अथवा सहायी द्वारा दृढ़तापूर्वक कहा
जाना चाहिए कि ऐसे-ऐसे प्रसंग में यह करना चाहिए, यह उत्तम है, इससे स्वर्ग
की प्राप्ति संभव है।
१२. और इससे बढ़ कर करने के लिए रखा ही क्या है कि स्वर्ग मिल
जाय।