सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
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१६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
गिरनार शिला मूल : अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि राजा सवपासंडानि च पवजितानि च घरस्तानि च
पूजयति दानेन च विविधेना च पूजाय पूजयति ने
२. न तु तथा दानं व पूजा व देवानंपियो मंञते यथा किति सारवढी अस
सवपासंडानं
३. सारवढी तु बहुविधा
४. तस तु इदं मूलं य वचोगुती किति अत्तपासंडपूजा व परपासंडगरहा व
नो भवे अपकरणम्हि लहुका व अस तन्हि तन्हि प्रकरने
५. पूजेतव्या तु एव परपासंडा तेन तेन प्रकरनेन
६. एवं करतं अत्तपासंडं च वढयति परपासंडस च उपकरोति
७. तदन्यथा करोतो अत्तपासंडं च छणति परपासंडस च पि अपकरोति
८. यो हि कंचि अत्तपासंडं पूजयति परपासंडं व गरहति सवं
अत्तपासंडभतियैव किन्ति अत्तपासंडं दीपयेम इति सो च पुन तथ करातो
अत्तपासंडं बाढतरं उपहनाति
९. त संवायो एव साधु किंति अञमञस धंमं सुणारु च सुंसूंसेर च
१०. एवं हि देवानंपियस इछा किंति सवपासंडा बहुसुता च असु
कल्याणागमा च असु
११. ये च तत तत पसंना तेहि वतव्यं
१२. देवानंपियो नो तथा दानं व पूजां व मंञते यथा किति सारवढी अस
सवपासंडानं
१३. बहका च एतथ अथा वायाता धंममहामाता च इथिझखमहामाता च
वचभूमिक्या च अञे च निकाया
१४. अयं च एतस फलं य अत्तपासंडवढी च होति धंमस च दीपना
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गिरनार शिला : द्वादश अभिलेख / १७
गिरनार शिला : द्वादश अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा सब संप्रदाय वालों, गृहत्यागियों तथा गृहस्थों
का सम्मान करते हैं- (वे) दान और विविध प्रकार की अर्चना से उनका
सत्कार करते हैं।
२. किन्तु देवानांप्रिय दान अथवा अर्चना को उतना (महत्वपूर्ण) नहीं मानते
जितना कि सब संप्रदायों में सार की वृद्धि हो।
३. सार की वृद्धि अनेक प्रकार से होती है।
४. किन्तु उसका मूल आधार यह है कि वाणी पर नियंत्रण रखा रहे। सो
क्या? कि बिना प्रसंग के अपने संप्रदाय की बड़ाई और अन्य संप्रदाय की निंदा
न हो अथवा प्रसंग-विशेष में साधारण-सी (चर्चा) हो।
५. जिस-किसी प्रसंग में अन्य संप्रदायों की प्रशंसा हो की जानी चाहिए।
६. ऐसा करता हुआ (व्यक्ति) अपने संप्रदाय की उन्नति करता है और
अन्य संप्रदायों पर उपकार करता है।