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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 80 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 12

[पृष्ठ ६ : बायाँ स्तम्भ]

६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
७. एस हि सेटं कंमं य धंमानुसासनं
८. धंमचरणे पि न भवति असीलस
९. त इमानि अयठि वधी च अहिनी च साधु
१०. एताय अथाय इदं लेखापितं इमस अथस वधि युजुंतु हीनि च ने
लोचेतव्या
११. द्वादसवासाभिसितेन देवानंपियेन पियदसिना राजा इदं लेखापितं
कालसी शिला : पंचम अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि लाजा अहा
२. कल्यानं दुकरं
३. ए आदिकले कल्यानस से दुकरं करोति
४. से ममया बहु कल्याने कटे
५. ता ममा पुता चा नताले चा परं चा तेहि ये अपतिये मे आवकप तथा
अनुवतिसंति से सुकटं कछंति
६. ए चु हेता देसं पि हापयिसति से दुकटं कछति
७. पापे हि नामा सुपदालये
८. से अतिक्रंतं अंतरं नो हुतुपूल धंममहामाता नामा
९. तेदसवसाभिसितेना ममया धंममहामाता कटा
१०. ते सवपासंडेसु वियापटा धंमाधियानंये वा धंमावढिया हिदसुखाये वा
धंमयुतसा योनकंबोजगंधालनं ए वा पि अंने अपलंता


[पृष्ठ ७ : दायाँ स्तम्भ]

कालसी शिला : पंचम अभिलेख / ७
७. क्योंकि यह जो धर्मानुशासन है, यह श्रेष्ठ कर्म है।
८. शील-हीन (व्यक्ति) द्वारा धर्म का आचरण संभव नहीं होता है।
९. तो इस प्रयोजन के उत्कर्ष का होना और अपकर्ष का न होना अच्छा है।
१०. इस उद्देश्य से यह लिखवाया गया है कि वे (अर्थात, मेरे उत्तराधिकारी)
इस प्रयोजन के उत्कर्ष में लगे रहें और इसके अपकर्ष में रुचि न लें।
११. अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
यह लिखवाया गया है।
[स्पष्टीकरण पंक्ति (२) : डा. भंडारकर ने 'विमानवत्थु' का उद्धरण दिया
है जिसके अनुसार धार्मिक मनुष्य को परलोक में स्वर्ग का सुख मिलता है जहां
(१) चलता-फिरता महल, (२) हस्ती=ऐरावत की सवारी, और (३) सितारों
की तरह भास्वर रूप की प्राप्ति होती है। अशोक ने इनके प्रदर्शन से लोगों का
ध्यान धार्मिक जीवन बिताने की ओर आकृष्ट किया प्रतीत होता है।]
कालसी शिला : पंचम अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा कहते हैं।
२. भलाई का काम करना कठिन होता है।
३. जो भलाई के काम में पहल करता है वह कठिन काम करता है।
४. तो मेरे द्वारा बहुत से भलाई के काम किये गये हैं।
५. यदि मेरे पुत्र, नाती और उनसे आगे जो संतान होगी कल्पांत तक वैसा
ही अनुवर्तन करेंगे तो सुकृत (अर्थात्, पुण्य का कार्य) करेंगे।
६. और जो इसका तनिक भी अपकर्ष करेगा वह दुष्कृत (अर्थात, पाप का
कार्य) करेगा।
७. वस्तुतः पाप का तो खूब दलन किया जाना चाहिए।
८. तो एक अंतराल हो गया है जबकि पहले 'धर्ममहामात्र' नाम के
(अधिकारी) नहीं हुआ करते थे।
९. अभिषेक के तेरह वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा धर्ममहामात्र (नियुक्त)
किये गये हैं।
१०. वे सब संप्रदायों में धर्म की स्थापना और धर्म की वृद्धि के लिए और
यवनों, कंबोजों, गंधारों और जो भी अन्य अपरांत (पश्चिमी सीमा पर रहने
वाले लोग) हैं उनमें जो धर्मपरायण हैं उनके हित-सुख के लिए लगाये गये हैं।