सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
पृष्ठ 20, कुल 80 में से
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२२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
२६. सवचरिति भोतु य धंमरति
२७. स हि हिदलोकिक परलोकिक
गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख
१. अयं धंमलिपी देवानंपियेन पियदसिना राजा लेखापिता अस्ति एव
संखितेन अस्ति मझेमेन अस्ति विस्ततेन
२. न च सर्वं सर्वत घटितं
३. महाल्के हि विजिते बहु च लिखितं लिखापयिसं चेव
४. अस्ति च एत के पुन पुन वुत्तं तस तस अथस माधुरताय किति जनो
तथा पटिपजेथ
५. तत्र एकदा असमातं लिखितं अस देसं व सछाय कारणं व अलोचयित्व
लिपिकरापरधेन व
धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख
१. देवानंपियस वचनेन तोसलियं महामतात नगरवियोवहालका वतविय
२. अं किछि दखामि हकं तं इछामि किति कंमन पटिपादयेहं दुवालते च
आलंभहं
३. एस च मे मोख्यमत दुवाल एतसि अथसि जं तुफेसु अनुसथि
४. तुफे हि बहुसु पानसहसेसु आयत पनवयं गछेमु हु सुनितानं
५. सवे मुनिसे पजा ममा
६. अथा पजाये इछामि हकं किति सवेन हितसुखेन
हिदलोकिक-पाललोकिकेन यूजेवु ति तथा...... मुनिसेसु पि इछामि हकं
७. नो च पापुनाथ आव-सुके इयं अठे
दायाँ पृष्ठ (हिन्दी अनुवाद)
गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख / २३
२६. जो धर्मरति है वही पूर्णतः अतिरति है।
२७. वही इहलौकिकी और पारलौकिकी है।
गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख
१. यह धर्मलिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवायी गयी है -
(यह) संक्षेप में है, मध्यम (आकार) में है (अथवा) विस्तार में है।
२. सब कुछ सब जगह के लिए उपयुक्त नहीं था।
३. क्योंकि (मेरा) साम्राज्य विशाल है और बहुत कुछ लिखा गया है और
लिखवाना भी है।
४. इसमें कुछ ऐसा भी है जो किसी-किसी विषय की रोचकता के कारण
बार-बार कहा गया है। सो क्यों? (वह इसलिए कि) लोग वैसा प्रतिपादन करें
(अर्थात्, उसे जीवन में उतारें)।
५. यह देख कर कि (शिला पर) स्थान (की कमी है) अथवा (शिला)
क्षति-ग्रस्त है अथवा लिपिकार की भूल से भी इनमें कहीं-कहीं अधूरा लिखा
हुआ हो सकता है।
धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख
१. देवानंप्रिय के हवाले से तोसली के महामात्रों को, जो नगर के
न्याय-शासक हैं, (इस प्रकार) कहना चाहिए -
२. मैं जो कुछ (उचित) समझता हूं, उसके बारे में चाहता हूं कि कैसे इसे
क्रियान्वित करूं और ढंग से इसकी शुरुआत करूं।
३. और मेरे विचार में इसका मुख्य उपाय यह है कि इस प्रयोजन के लिए
मैं आपको अनुदेश दूं।
४. आप कितने ही हजारों प्राणियों के बीच स्थापित हैं, (इसलिए कि आप)
मनुष्यों का प्रेम प्राप्त कर सकें।
५. सारे मनुष्य मेरी संतान हैं।
६. जिस प्रकार मैं (अपनी) संतान के लिए कामना करता हूं कि वह
इहलोक तथा परलोक में हितसुख-लाभी हो वैसे ही (सभी) मनुष्यों के लिए मेरी
मनोकामना है।
७. आप नहीं समझते कि मेरा मंतव्य कितना गहरा है।