सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 80 में से
संदर्भ में पढ़ें२० / सम्राट अशोक के अभिलेख
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख / २१
[मूल प्राकृत पाठ]
१३. य पि च अटवि देवानंप्रियस विजिते भोति त पि अनुनेति अनुनिशि...
१४. अनुतपे पि च प्रभवे देवानंप्रियस वुचति तेष किति अवत्रपु न च
हंञेयुसु
१५. इच्छति हि देवानंप्रियो सवभूतान अक्षाति संयमं समचर्यं रभसिये
१६. अयि च मुख्यमु विजये देवानंप्रियस यो ध्रमविजयो
१७. सो च पुन लधो देवानंप्रियस इह च सवेषु च अंतेषु आ षषु पि
योजनशतेषु यत्र अंतियोको नम योनराज परं च तेन अंतियोकेन चतुर ४ राजा
तुरमये नम अंतिकिनि नम मग नम अलिकसुदरो नम निच चोड़पंड आ
तंभपंणिय
१८. एवमेव हिद राजविषयस्मि योनकंबोजेषु नाभकनाभिपंतिषु
भोजपितिनिकेषु अंध्रपारिदेषु सवत्र देवानंप्रियस ध्रमानुशस्ति अनुवतंति
१९. यत्र पि देवानंप्रियस दूता न व्रजंति ते पि श्रुतु देवानंप्रियस ध्रमवुटं
विधानं ध्रमानुशस्ति ध्रम अनुविधियंति अनुविधियिषंति च
२०. यो स लधे एतकेन भोति सवत्र विजयो सवत्र पुन विजयो प्रितिरसो सो
२१. लध भोति प्रिति ध्रमविजयस्मि
२२. लहुक तु खो सो प्रिति
२३. पारत्रिकमेव महफल मञति देवानंप्रियो
२४. एतये च अथये अयि ध्रमलिपि निपिस्त किति पुत्र पपोत्र मे असु नवं
विजयं म विजेतविय मञिषु स्वकसि यो विजये खंति च लहुदंड च रोचेतु तमे
व यो विज मञतु यो ध्रमविजयो
२५. सो हिदलोगिको परलोकिको
[हिन्दी अनुवाद]
१३. और देवानंप्रिय के राज्य में जो वनवासी लोग हैं उनको भी वह अनुनय करते हैं (और अपनी विचारधारा) में ढालते हैं।
१४. और उनको जतलाया जाता है कि दुःखी होने पर भी देवानंप्रिय में (दंड देने की) क्षमता है जिससे कि वे (अपने दुराचरण के लिए) लज्जित हों और मृत्यु (दंड) से बचे रहें।
१५. देवानंप्रिय चाहते हैं कि विप्लव के समय सब प्राणियों की यथास्थिति, आत्मसंतुलन तथा शांतिपूर्ण चर्या बनी रहे।
१६. और यह जो धर्मविजय है, देवानंप्रिय के मत में वही मुख्य विजय है।
१७. और फिर इसे देवानंप्रिय ने यहां और सब सीमावर्ती राज्यों में छः सौ योजन की दूरी तक - जहां अंतियोक नाम का यवन राजा और उस अंतियोक से परे तुरमय, अंतिफिन, मफ (तथा) अलिक्सुंदर नाम के चार (४) राजा (राज्य करते) हैं - और नीचे (दक्षिण में) चोल या पांड्य, ताम्रपर्णी तक प्राप्त किया है।
१८. इसी प्रकार यहां राजा के राज्य में, यवनों एवं कंबोजों में, नाभकों तथा नाभिपंक्तियों में, भोजों और पितिनिकों में, आंध्रों एवं पुलिंदों में - सभी जगह देवानंप्रिय के धर्मानुशासन का अनुवर्तन किया जाता है।
१९. जहां-जहां देवानंप्रिय के दूत नहीं जाते हैं, वहां-वहां भी लोग देवानंप्रिय के धर्मवृत्त, विधान तथा धर्मानुशासन को सुनकर धर्म का पालन कर रहे हैं और करते रहेंगे।
२०. इससे जो यह सर्वत्र और बार-बार विजय प्राप्त हुई है वह तृप्ति दिलाने वाली है।
२१. धर्म द्वारा विजय प्राप्त करने से (मुझे) तृप्ति प्राप्त हुई है।
२२. परंतु यह तृप्ति वस्तुतः अल्प (महत्व की) है।
२३. देवानंप्रिय (भवसागर से) पार ले जाने वाले (लाभ) को ही बड़ा फल मानते हैं।
२४. और इस प्रयोजन के लिए यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है कि मेरे पुत्र, प्रपौत्र जो हों वे नयी विजय को विजय-योग्य न मानें, और यदि इन्हें विजय में रस मिलता ही हो तो वे क्षमा कर देने और हल्का दंड देने में ही रुचि लें और धर्म-विजय को ही (सच्ची) विजय समझें।
२५. वह (विजय) इहलोक और परलोक दोनों में फल देने वाली होती है।