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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

चतुर्दश मुख्य शिलालेख (१ से १४ शिलालेख - अहिंसा, धम्म-विजय व सर्वधर्म-समभाव)

१४ / सम्राट अशोक के अभिलेख

गिरनार शिला : दशम अभिलेख

१. देवानंपियो प्रियदसि राजा यसो व कीति व न महाथावहा मञते अञत्र
तदायत्वो दिघाय च मे जनो धंमसुसुसा सुसुसता धंमवुतं च अनुविधीयता
२. एतकाय देवानंपियो पियदसि राजा यसो व किति व इच्छति
३. यं तु किचि परिकमते देवानं प्रियदसि राजा त सवं पारत्रिकाय किति
सकले अपपरिस्रवे अस
४. एस तु परिसवे य अपुञं
५. दुकरं तु खो एतं छुदकेन व जनेन उसटेन व अञत्र अग्रेन पराकमेन सवं
परिचजित्पा
६. ए तु खो उसटेन दुकरं


गिरनार शिला : एकादश अभिलेख

१. देवानंपियो पियदसि राजा एवं आह
२. नास्ति एतारिसं दानं यारिसं धंमदानं धंमसंतवो वा धंमसंविभागो वा
धंमसंबंधो व
३. तत इदं भवति दासभतकम्हि सम्यप्रतीपती मातरि पितरा साधु सुस्रुसा
मितसंस्तुतञातिकानं बाम्हणसमणानं साधु दानं प्राणां अनारंभो साधु
४. एत वतव्यं पिता व पुत्रेन व भ्राता व मितसंस्तुतञातीकेन व आव
पटीवेसियेहि इदं साधु इदं कतव्यं
५. सो तथा करु इलोक्यस आरधो होति परत च अनंतं पुञं भवति तेन
धंमदानेन


गिरनार शिला : दशम अभिलेख / १५

गिरनार शिला : दशम अभिलेख

१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा यश अथवा कीर्ति को (कोई) बहु महत्त्व की
वस्तु नहीं मानते सिवाय इसके कि अभी, और दीर्घ काल तक, उनकी प्रजा धर्म
की बात सुनने को लालायित रहे और धर्म का आचरण करे (क्योंकि यह उनका
मंतव्य है)।
२. इतने (मात्र) के लिए देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा यश वा कीर्ति की
कामना करते हैं।
३. जो कुछ पराक्रम (उद्यम) देवानां (प्रिय) प्रियदर्शी राजा करते हैं वह सब
(भवसागर से) पार जाने के लिए है कि कैसे सब (लोग) (अपने-अपने)
परिस्रवों (पापकर्मों) से मुक्तप्राय हो जायं।
४. जो अ-पुण्य (अर्थात्, पाप) है वही 'परिस्रव' (कहलाता) है।
५. परंतु निश्चय ही किसी छोटे या बड़े व्यक्ति द्वारा बिना सब
(आसक्तियां) छोड़ हुए और बिना उत्तम पराक्रम किये हुए, यह कर पाना
कठिन है।
६. और बड़े व्यक्ति द्वारा तो यह निःसंदेह (अपेक्षाकृत अधिक) दुःसाध्य है।


गिरनार शिला : एकादश अभिलेख

१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. ऐसा कोई दान नहीं है जैसा कि धर्म का दान। (ऐसा कोई परिचय नहीं
है जैसा कि) धर्म का परिचय। (ऐसा कोई बंटवाड़ा नहीं है जैसा कि) धर्म का
बंटवाड़ा। (ऐसा कोई संबंध नहीं है जैसा कि) धर्म का संबंध।
३. उसमें यह होता है कि दासों और भृत्यों के प्रति सम्यक व्यवहार उत्तम
होता है; माता-पिता की सेवा उत्तम होती है; मित्रों, परिचितों, जातिभाइयों,
ब्राह्मणों तथा श्रमणों को दान देना उत्तम होता है (और) प्राणियों की हिंसा न
करना उत्तम होता है।
४. पिता, पुत्र, भाई, मित्र, परिचित, जातिभाई - यहां तक कि पड़ोसियों
द्वारा भी- यह कहा जाना चाहिए: "यह उत्तम है, इसे करना चाहिए।"
५. ऐसा करने वाले को उस धर्मदान से इस लोक की प्राप्ति (अर्थात्,
सिद्धि) होती है और परलोक में असीम पुण्य मिलता है।

[पृष्ठ १६]

१६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
गिरनार शिला मूल : अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि राजा सवपासंडानि च पवजितानि च घरस्तानि च
पूजयति दानेन च विविधेना च पूजाय पूजयति ने
२. न तु तथा दानं व पूजा व देवानंपियो मंञते यथा किति सारवढी अस
सवपासंडानं
३. सारवढी तु बहुविधा
४. तस तु इदं मूलं य वचोगुती किति अत्तपासंडपूजा व परपासंडगरहा व
नो भवे अपकरणम्हि लहुका व अस तन्हि तन्हि प्रकरने
५. पूजेतव्या तु एव परपासंडा तेन तेन प्रकरनेन
६. एवं करतं अत्तपासंडं च वढयति परपासंडस च उपकरोति
७. तदन्यथा करोतो अत्तपासंडं च छणति परपासंडस च पि अपकरोति
८. यो हि कंचि अत्तपासंडं पूजयति परपासंडं व गरहति सवं
अत्तपासंडभतियैव किन्ति अत्तपासंडं दीपयेम इति सो च पुन तथ करातो
अत्तपासंडं बाढतरं उपहनाति
९. त संवायो एव साधु किंति अञमञस धंमं सुणारु च सुंसूंसेर च
१०. एवं हि देवानंपियस इछा किंति सवपासंडा बहुसुता च असु
कल्याणागमा च असु
११. ये च तत तत पसंना तेहि वतव्यं
१२. देवानंपियो नो तथा दानं व पूजां व मंञते यथा किति सारवढी अस
सवपासंडानं
१३. बहका च एतथ अथा वायाता धंममहामाता च इथिझखमहामाता च
वचभूमिक्या च अञे च निकाया
१४. अयं च एतस फलं य अत्तपासंडवढी च होति धंमस च दीपना


[पृष्ठ १७]

गिरनार शिला : द्वादश अभिलेख / १७
गिरनार शिला : द्वादश अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा सब संप्रदाय वालों, गृहत्यागियों तथा गृहस्थों
का सम्मान करते हैं- (वे) दान और विविध प्रकार की अर्चना से उनका
सत्कार करते हैं।
२. किन्तु देवानांप्रिय दान अथवा अर्चना को उतना (महत्वपूर्ण) नहीं मानते
जितना कि सब संप्रदायों में सार की वृद्धि हो।
३. सार की वृद्धि अनेक प्रकार से होती है।
४. किन्तु उसका मूल आधार यह है कि वाणी पर नियंत्रण रखा रहे। सो
क्या? कि बिना प्रसंग के अपने संप्रदाय की बड़ाई और अन्य संप्रदाय की निंदा
न हो अथवा प्रसंग-विशेष में साधारण-सी (चर्चा) हो।
५. जिस-किसी प्रसंग में अन्य संप्रदायों की प्रशंसा हो की जानी चाहिए।
६. ऐसा करता हुआ (व्यक्ति) अपने संप्रदाय की उन्नति करता है और
अन्य संप्रदायों पर उपकार करता है।

Here is the complete line-by-line transcription of both pages:


[पृष्ठ ३८]

३८ / कुमार अशोक के अभिलेख
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख
१. अठवर्षअभिसितस देवानंप्रियस प्रियद्रशिस रञो कलिग विजित
२. दियढमत्रे प्राणशतसहस्रे ये ततो अपवुढे शतसहस्रमात्रे तत्र हते
बहूतावते वा मुटे
३. ततो पछा अधुना लधेषु कलिगेषु तिव्रे धंमसिलन धंमकामता धंमानुशस्ति
च देवानंप्रियस
४. सो अस्ति अनुशयनं देवानंप्रियस विजिनितिय कलिगानि
५. अविजितं हि विजिनामने यो तत्र वध व मरणं व अपवहो व जनस तं
बाढं वेदनियमतं गुरुमतं च देवानंप्रियस
६. इमं पि चु ततो गुरुमततरं देवानंप्रियस
७. ये तत्र वसति ब्रह्मण व श्रमण व अंने व प्रषंड गृहथ व येसु विहिता एष
अग्रिभुसुसा मातापितुषु सुस्रुषा गुरुन सुस्रुषा मित्रसंस्तुतसहायनातिकेषु
दासभटकनम सम्यप्रतिपति दिढभतित तस तत्र भवति उपघातो व वधो व
अभिनिष्क्रमनं व प्रियजननं
८. येष व पि सुविहितानं सिनेहो अविप्रहीनो ए तेष मित्रसंस्तुतसहायनातिक
व्यसनं प्रापुनंति तत्र ते पिन हंदि सो उपघातो होति
९. प्रतिभागो च एस सवमनुषानं च गुरुमतो च देवानंप्रियस
१०. नस्ति च एकतारे पि जनपदे यत्र न सन्ति एते निकाया अन्नत योनेषु
११. सो समणे प्रषंडे नथि यत्र नस्ति मनुषानं एकतरसि पि प्रषडसि न नमे प्रसादो
१२. सो यवतको जनो तदा कलिगेषु हतो च मुटो च अपवुढो च ततो शतभागे
वा सहस्रभागं वा अज गुरुमतो वो देवानंप्रियस
१३. यो पि च अपकरोति क्षमितवियमते व देवानंप्रियस य शको क्षमनाये


[पृष्ठ ३९]

शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख | ३९
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख
१. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के अभिषेक के आठ वर्ष हो चुकने पर
(उनके द्वारा) कलिंग पर विजय पायी गयी।
२. यहाँ से डेढ़ लाख प्राणी बंदी बनाकर बाहर निकाले गये, एक लाख
मारे या कटे और इससे कई गुना (प्रतिशत) मर गये।
३. उसके पश्चात् अब कलिंग के हाथ आने पर देवानंप्रिय का
धर्म-अनुशीलन, धर्म के प्रति अनुराग और धर्मानुशासन तीव्र हो उठा है।
४. कलिंग पर विजय पाकर देवानंप्रिय को पश्चात्ताप हुआ है।
५. क्योंकि अविजित (देश) को विजय करने समय वहाँ पर लोगों का जो
मारण, मरण अथवा निर्वासन होता है, वह देवानंप्रिय के मन में बहुत
पीड़ादायक और गंभीर (भारी) है।
६. परंतु देवानंप्रिय के मन में यह और भी गंभीर (भारी) है कि-
७. वहाँ पर जो ब्राह्मण, श्रमण, अन्य संप्रदाय वाले अथवा गृहस्थ निवास
करते हैं- जिनमें गुरुजनों की सेवा, माता-पिता की सेवा, वृद्धजनों की सेवा,
मित्रों, परिचितों, सहायकों, ज्ञातिभाइयों, दासों एवं भृत्यों के प्रति सम्यक
व्यवहार और दृढ़ भक्ति का चलन है- वहाँ पर उनका आघात, वध अथवा
प्रियजनों का देश निकाला होता है।
८. अथवा जो लोग स्वयं तो सुरक्षित होते हैं, परंतु उनके मित्र, परिचित,
सहायक (अथवा) सगे-भाई विपत्तिग्रस्त हो जाते हैं (उनके प्रति उनका) स्नेह
अक्षुण्ण होने के कारण उनकी भी अत्यंत क्षति पहुँचती है।
९. इसके अतिरिक्त सब मनुष्य होते हैं परंतु देवानंप्रिय के लिए यह (और
भी) गंभीर (भारी) है।
१०. और ऐसा (कोई) नहीं है सिवाय किसी न किसी संप्रदाय में अनुराग
न होता हो।
११. इसलिए जितने भी लोग उस समय कलिंग में मारे गये, मर गये
अथवा निर्वासित हुए, उनका सौवां भाग अथवा हजारवाँ भाग भी आज
देवानंप्रिय के मन में गंभीर (भारी) होगा।
१२. और जो कोई भी अपकार करे, देवानंप्रिय के मन में, उसे जहाँ तक
क्षमा परंतु क्षमा कर देना चाहिए।

२० / सम्राट अशोक के अभिलेख
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख / २१


[मूल प्राकृत पाठ]

१३. य पि च अटवि देवानंप्रियस विजिते भोति त पि अनुनेति अनुनिशि...
१४. अनुतपे पि च प्रभवे देवानंप्रियस वुचति तेष किति अवत्रपु न च
हंञेयुसु
१५. इच्छति हि देवानंप्रियो सवभूतान अक्षाति संयमं समचर्यं रभसिये
१६. अयि च मुख्यमु विजये देवानंप्रियस यो ध्रमविजयो
१७. सो च पुन लधो देवानंप्रियस इह च सवेषु च अंतेषु आ षषु पि
योजनशतेषु यत्र अंतियोको नम योनराज परं च तेन अंतियोकेन चतुर ४ राजा
तुरमये नम अंतिकिनि नम मग नम अलिकसुदरो नम निच चोड़पंड आ
तंभपंणिय
१८. एवमेव हिद राजविषयस्मि योनकंबोजेषु नाभकनाभिपंतिषु
भोजपितिनिकेषु अंध्रपारिदेषु सवत्र देवानंप्रियस ध्रमानुशस्ति अनुवतंति
१९. यत्र पि देवानंप्रियस दूता न व्रजंति ते पि श्रुतु देवानंप्रियस ध्रमवुटं
विधानं ध्रमानुशस्ति ध्रम अनुविधियंति अनुविधियिषंति च
२०. यो स लधे एतकेन भोति सवत्र विजयो सवत्र पुन विजयो प्रितिरसो सो
२१. लध भोति प्रिति ध्रमविजयस्मि
२२. लहुक तु खो सो प्रिति
२३. पारत्रिकमेव महफल मञति देवानंप्रियो
२४. एतये च अथये अयि ध्रमलिपि निपिस्त किति पुत्र पपोत्र मे असु नवं
विजयं म विजेतविय मञिषु स्वकसि यो विजये खंति च लहुदंड च रोचेतु तमे
व यो विज मञतु यो ध्रमविजयो
२५. सो हिदलोगिको परलोकिको


[हिन्दी अनुवाद]

१३. और देवानंप्रिय के राज्य में जो वनवासी लोग हैं उनको भी वह अनुनय करते हैं (और अपनी विचारधारा) में ढालते हैं।
१४. और उनको जतलाया जाता है कि दुःखी होने पर भी देवानंप्रिय में (दंड देने की) क्षमता है जिससे कि वे (अपने दुराचरण के लिए) लज्जित हों और मृत्यु (दंड) से बचे रहें।
१५. देवानंप्रिय चाहते हैं कि विप्लव के समय सब प्राणियों की यथास्थिति, आत्मसंतुलन तथा शांतिपूर्ण चर्या बनी रहे।
१६. और यह जो धर्मविजय है, देवानंप्रिय के मत में वही मुख्य विजय है।
१७. और फिर इसे देवानंप्रिय ने यहां और सब सीमावर्ती राज्यों में छः सौ योजन की दूरी तक - जहां अंतियोक नाम का यवन राजा और उस अंतियोक से परे तुरमय, अंतिफिन, मफ (तथा) अलिक्सुंदर नाम के चार (४) राजा (राज्य करते) हैं - और नीचे (दक्षिण में) चोल या पांड्य, ताम्रपर्णी तक प्राप्त किया है।
१८. इसी प्रकार यहां राजा के राज्य में, यवनों एवं कंबोजों में, नाभकों तथा नाभिपंक्तियों में, भोजों और पितिनिकों में, आंध्रों एवं पुलिंदों में - सभी जगह देवानंप्रिय के धर्मानुशासन का अनुवर्तन किया जाता है।
१९. जहां-जहां देवानंप्रिय के दूत नहीं जाते हैं, वहां-वहां भी लोग देवानंप्रिय के धर्मवृत्त, विधान तथा धर्मानुशासन को सुनकर धर्म का पालन कर रहे हैं और करते रहेंगे।
२०. इससे जो यह सर्वत्र और बार-बार विजय प्राप्त हुई है वह तृप्ति दिलाने वाली है।
२१. धर्म द्वारा विजय प्राप्त करने से (मुझे) तृप्ति प्राप्त हुई है।
२२. परंतु यह तृप्ति वस्तुतः अल्प (महत्व की) है।
२३. देवानंप्रिय (भवसागर से) पार ले जाने वाले (लाभ) को ही बड़ा फल मानते हैं।
२४. और इस प्रयोजन के लिए यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है कि मेरे पुत्र, प्रपौत्र जो हों वे नयी विजय को विजय-योग्य न मानें, और यदि इन्हें विजय में रस मिलता ही हो तो वे क्षमा कर देने और हल्का दंड देने में ही रुचि लें और धर्म-विजय को ही (सच्ची) विजय समझें।
२५. वह (विजय) इहलोक और परलोक दोनों में फल देने वाली होती है।

बायाँ पृष्ठ (मूल प्राकृत पाठ)

२२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
२६. सवचरिति भोतु य धंमरति
२७. स हि हिदलोकिक परलोकिक
गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख
१. अयं धंमलिपी देवानंपियेन पियदसिना राजा लेखापिता अस्ति एव
संखितेन अस्ति मझेमेन अस्ति विस्ततेन
२. न च सर्वं सर्वत घटितं
३. महाल्के हि विजिते बहु च लिखितं लिखापयिसं चेव
४. अस्ति च एत के पुन पुन वुत्तं तस तस अथस माधुरताय किति जनो
तथा पटिपजेथ
५. तत्र एकदा असमातं लिखितं अस देसं व सछाय कारणं व अलोचयित्व
लिपिकरापरधेन व
धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख
१. देवानंपियस वचनेन तोसलियं महामतात नगरवियोवहालका वतविय
२. अं किछि दखामि हकं तं इछामि किति कंमन पटिपादयेहं दुवालते च
आलंभहं
३. एस च मे मोख्यमत दुवाल एतसि अथसि जं तुफेसु अनुसथि
४. तुफे हि बहुसु पानसहसेसु आयत पनवयं गछेमु हु सुनितानं
५. सवे मुनिसे पजा ममा
६. अथा पजाये इछामि हकं किति सवेन हितसुखेन
हिदलोकिक-पाललोकिकेन यूजेवु ति तथा...... मुनिसेसु पि इछामि हकं
७. नो च पापुनाथ आव-सुके इयं अठे


दायाँ पृष्ठ (हिन्दी अनुवाद)

गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख / २३
२६. जो धर्मरति है वही पूर्णतः अतिरति है।
२७. वही इहलौकिकी और पारलौकिकी है।
गिरनार शिला : चतुर्दश अभिलेख
१. यह धर्मलिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवायी गयी है -
(यह) संक्षेप में है, मध्यम (आकार) में है (अथवा) विस्तार में है।
२. सब कुछ सब जगह के लिए उपयुक्त नहीं था।
३. क्योंकि (मेरा) साम्राज्य विशाल है और बहुत कुछ लिखा गया है और
लिखवाना भी है।
४. इसमें कुछ ऐसा भी है जो किसी-किसी विषय की रोचकता के कारण
बार-बार कहा गया है। सो क्यों? (वह इसलिए कि) लोग वैसा प्रतिपादन करें
(अर्थात्, उसे जीवन में उतारें)।
५. यह देख कर कि (शिला पर) स्थान (की कमी है) अथवा (शिला)
क्षति-ग्रस्त है अथवा लिपिकार की भूल से भी इनमें कहीं-कहीं अधूरा लिखा
हुआ हो सकता है।
धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख
१. देवानंप्रिय के हवाले से तोसली के महामात्रों को, जो नगर के
न्याय-शासक हैं, (इस प्रकार) कहना चाहिए -
२. मैं जो कुछ (उचित) समझता हूं, उसके बारे में चाहता हूं कि कैसे इसे
क्रियान्वित करूं और ढंग से इसकी शुरुआत करूं।
३. और मेरे विचार में इसका मुख्य उपाय यह है कि इस प्रयोजन के लिए
मैं आपको अनुदेश दूं।
४. आप कितने ही हजारों प्राणियों के बीच स्थापित हैं, (इसलिए कि आप)
मनुष्यों का प्रेम प्राप्त कर सकें।
५. सारे मनुष्य मेरी संतान हैं।
६. जिस प्रकार मैं (अपनी) संतान के लिए कामना करता हूं कि वह
इहलोक तथा परलोक में हितसुख-लाभी हो वैसे ही (सभी) मनुष्यों के लिए मेरी
मनोकामना है।
७. आप नहीं समझते कि मेरा मंतव्य कितना गहरा है।

यहाँ पृष्ठ के अनुसार दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:


[पृष्ठ २४]

२४ / सम्राट अशोक के अभिलेख

८. केछ व एकपुलिसे..... नाति एतं से पि देसं नो सर्वं
९. देखत हि तुम्फे एतं सुविहिता पि
१०. नितियं एकपुलिसे पि अथिवे बंधनं वा परिकिलेसं वा पापुनाति
११. तत होति अकस्मा तेन बधनंतिक अंत च.... हुं जने दविये दुखीयति
१२. तत इच्छितविये तुम्फेहि किति मझं परिपादयेमा ति
१३. इमेहि चु जातेहि नो संपटीपजति इसाय आसुलोपेन निथूलियेन
तुलनाय अनावूतिय आलसियेन क्लमथेन
१४. से इच्छितविये किति एते जाता नो हुवेवु ममा ति
१५. एतस च सवस मूले अनासलोपे अतूलना च
१६. नितियं ए किछंते सिया न ते उगे संचलितविये तु वटितविये एतविये वा
१७. हेवमेवं ए देखेय तुफाक तेन वतविये आननं देखत हेव च हेव च
देवानंपियस अनुसथि
१८. से महाफले ए तस संपटिपाद महाअपाये असंपटिपत्ति ।
१९. विपटिपाययमीने हि एतं नथि स्रगस आरधि नो राजागधिवि
२०. दुआहले हि इमंस कंमस मं कृते मनोअतिक्रे
२१. संपटिपजयंमीने चु एतं स्वर्गं आराधयिस्यथ मम च आननियं एहथ
२२. इयं च लिपि तिखनखतेन सोतविया


[पृष्ठ २५]

धौली शिला : प्रथम पृथक अभिलेख / २५

८. कदाचित कोई एकाध व्यक्ति इसे समझता भी है तो वह भी थोड़ा-सा
ही, पूरा नहीं।
९. (अब) आप इस ओर ध्यान दें, जैसी कि आपकी सुविधा भी है।
१०. नीति के अनुसरण में कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जिसे कारावास
अथवा यातना का दंड मिला हो।
११. वहां अकस्मात उस बंधन में उसका प्राणांत हो जाता है और दूसरे
(बहुत से) लोग लंबे समय तक दुःखी होते रहते हैं।
१२. इसलिए आपको (विचारना) चाहिए कि कैसे मध्यम मार्ग का
अनुसरण करें।
१३. परंतु इन प्रवृत्तियों से सम्यक् आचरण नहीं हो सकता - ईर्ष्या,
अनवधानता, निष्ठुरता, त्वरा (जल्दबाजी), अनावृत्ति (अभ्यास न रहना),
आलस्य और क्लान्ति (थकान)।
१४. इसलिए आपको चेष्टा करनी चाहिए कि ये प्रवृत्तियां मेरी न हों।
१५. और इन सबकी तह में हैं- अनवधानता (सजगता) और अतत्वरा
(जल्दबाजी का अभाव, समता)।
१६. जो हर समय थके-थके रहते हैं वे उन्नति नहीं कर सकते। अतः चलना
चाहिए, डोलना चाहिए, गतिशील होना चाहिए।
१७. जो इस प्रकार समझ जाय उसे आप लोगों को कहना चाहिए-
"आप (राजा के प्रति अपने ऋण से) उऋण होने की ओर ध्यान दें - ऐसी-ऐसी
देवानांप्रिय की अनुशास्ति है।
१८. "इसका सम्यक् रूप से प्रतिपादन करना बड़ा फलदायक है जबकि
प्रतिपादन न करना बड़ा विनाशकारक है।
१९. "क्योंकि (जो लोग) प्रतिपादन नहीं कर पाते हैं उन्हें न तो स्वर्ग की
प्राप्ति होती है, और न ही राजा की कृपा।"
२०. इस बारे में मैं इतना अधिक क्या सोचता हूं उसका कारण यह है कि
इस काम से दो फल प्राप्त होते हैं-
२१. इसका सम्यक् प्रतिपादन करने से स्वर्ग प्राप्त करोगे और मेरे ऋण से
उऋण हो जाओगे।
२२. और इस लिखावट को तिष्य नक्षत्र में (सभी द्वारा) सुना जाना
चाहिए।

२६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
२३. अंतला पि च तिसेन खनसि खनसि एकैन पि सोतविय
२४. हेवं च कलंतं तुफे चघथ संपटिपदायितवे
२५. एताये अथाये इयं लिपि लिखित हिद एन नगलोवियोहालका ससव
समयं यूजेवू ति.... नस अकस्मा पलिबोधे व अकस्मा पलिकिलेसे व नो सिया ति
२६. एताये च अठाये हकं.... मते पंचसु पंचसु वसेसु निखामयिसामि ए
अखखसे अचंडे सखिनालंभे होसति एतं अठं जानितु.... तथा कलंति अथ मम
अनुसथीति
२७. उजेनिते पि चु कुमाले एताये व अठाये निखामयिस.... हेदिसमेव वगं
नो च अतिकामयिसति तिनि वसानि
२८. हेमेव तखसिलाते पि
२९. अदा अ.... ते महामाता निक्खमिसंति अनुसयानं तदा अगहयितु
अतने कंमं एतं पि जानिसंति तं पि तथा करूँति

पृष्ठ २८

२८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
६. अथ पजाये इच्छामि किति मे सवेणा हितसुखेन युजेयू अथ पजाये
इच्छामि किति मे सवेन हितसुखेन युजेयू ति हिदलोकिकपाललोकिकेन हेवमेव मे
इछ सवमुनिसु
७. सिया अंतानं अविजितानं किंछंदे सु लाजा अफेषु ति
८. एताका वा मे इछ अंतेसु पापुनेयु लाजा हेव इच्छति अनुविगीन हेयू
ममियाये अस्वसेयु च मे सुखंमेव च लहेयू ममते नो दुखं हेव च पापुनेयु खमिसति
ने लाजा ए सकिये खमितवे ममं निमितं च धंमं चलेयू ति हिदलोगं च पललोगं
च आराधयेयु
९. एताये च अठाये हकं तुफेनि अनुसासामि अनने एतकेन हकं तुफेनि
अनुसासितु छंदं च वेदितु आ मम धिति पटिना च अचल
१०. स हेव कटू कंम चेलितवियं अस्वासनिया च ते एन ते पापुनेयु अथा
पित हेव ने लाजा ति अथ अतानं अनुकंपति हेव अंकेनि अनुकंपति अथा पजा
हेवं मयं राजिने
११. तुफेनि हकं अनुसासितु छंदं च वेदित आ मम धिति पटिना या अचल
सकलदेसाआयुक्तिके होसामि एतसि अथसि
१२. अलं हि तुफे अस्वासनाये हितसुखाये च तेस
हिदलोकिकपाललोकिकाये
१३. हेव च करंतं स्वगं च आराघयिसथ मम च आनन्यं एषथ
१४. एताये च अठाये इयं लिपी लिखित हिद एन महामाता सास्वंतं समं
युजंतू अस्वासनाये च धंमचलनाये च अंतानं
१५. इयं च लिपी अनुचातुंमासं सोतविया तिसेन


पृष्ठ २९

जौगड़ शिला : द्वितीय पृथक अभिलेख / २९
६. जैसे मैं अपनी संतान के लिए कामना करता हूँ कि वे कैसे इहलोक तथा
परलोक के सर्वप्रकार के हित-सुख के भागी हों, वैसे ही सब मनुष्यों के लिए
मेरी मनोकामना है।
७. अ-विजित सीमावर्ती लोगों के मन में यह जिज्ञासा हो सकती है कि
हमारे बारे में राजा क्या सोचते हैं।
८. सीमावर्ती लोगों के बारे में मेरी इतनी अभिलाषा (उन तक) पहुँचानी
चाहिए कि राजा ऐसा चाहते हैं कि वे उद्विग्न न हों, मेरे प्रति आश्वस्त हों और
मेरे से सुख ही पायें, दुःख नहीं। और उन्हें यह पता चले कि राजा उन्हें
यथासंभव क्षमा कर देंगे और वे मेरे निमित्त धर्म पर चलें जिससे कि वे इहलोक
और परलोक का सुख प्राप्त कर सकें।
९. और इसी प्रयोजन के लिए मैं आपको अनुदेश देता हूँ जिससे कि इससे
(उनके प्रति मुझ पर जो ऋण है उससे) उऋण हो सकूँ। मैं आपको अनुदेश
देता हूँ और अपनी मनोकामना जतलाता हूँ जो कि मेरी स्थिर या अटल प्रतिज्ञा
है।
१०. इसलिए इस प्रकार आचरण करते हुए आपको (अपना)
कर्तव्य-(पालन) करना चाहिए और उनको आश्वासन देना चाहिए जिससे वे
समझ जायें कि राजा हमारे लिए वैसे ही हैं जैसे कि पिता, जैसे वह अपने पर
कृपा करते हैं वैसे ही हमारे पर कृपा करते हैं, हम राजा के लिए वैसे ही हैं जैसे
कि (उनकी अपनी) प्रजा।
११. आपको अनुदेश देकर और अपनी मनोकामना जतला कर, जो कि
मेरी स्थिर या अटल प्रतिज्ञा है, मैं इस प्रयोजन के लिए सारे देश में अधिकारी
नियुक्त करूँगा।
१२. क्योंकि आप उन्हें आश्वस्त करने और इहलोक तथा परलोक का
हित-सुख प्राप्त कराने की क्षमता रखते हैं।
१३. और ऐसा करते हुए (आप) स्वर्ग-लाभ करेंगे और मेरे ऋण से उऋण
हो पाएँगे।
१४. और इस प्रयोजन के लिए यहाँ पर लिखावट लिखी गयी है जिससे कि
महामात्र हर समय सीमावर्ती लोगों को भरोसा दिलाने और धर्म में प्रवृत्त करने
के काम में लगे रहें।
१५. और इस लिखावट को (सभी द्वारा) प्रत्येक चातुर्मास में तिष्य (नक्षत्र)
के दिन सुना जाना चाहिए।

३० / सम्राट अशोक के अभिलेख
१६. अंतला पि च सोतविया
१७. खने संतं एकेन पि सोतविया
१८. हेवँ च कलंतं छघथ संपतिपातयितवे


जौगड शिला : द्वितीय पृथक् अभिलेख / ३१
१६. और (तिष्य के दिनों के) बीच बीच में भी सुना जाना चाहिए।
१७. अवसर मिलने पर भले ही एक व्यक्ति द्वारा ही सुना जाना चाहिए।
१८. और ऐसा करते हुए (आप) सम्यक प्रतिपादन (की दिशा में)
यत्नशील होंगे।

खंड (२)
लघु शिलाओं पर उत्कीर्ण अभिलेख

पृष्ठ ३४

३४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
मूल अभिलेख
लघु शिला : रूपनाथ
१. देवानंपिये हेव आहा
२. सातिरेकानि अढतियानि व य सुमि प्रकास सके
३. नो चु बाढि पकंते
४. सातिरेके चु छवछरे य सुमि हकं सघ उपेते बाढि च पकंते
५. या इमाय कालाय जंबुदिपसि अमिसा देवा हुसु ते दानि मिसा कटा
६. पकसहि हि एस फले
७. नो च एसा महतता पापोतवे खुदकेन पि पकममिनेना सकिये पिपुले पि
स्वगे आरोधेवे
८. एतिय अठाय च सावने कटे खुदका च उडाला च पकमतु ति अता पि
च जानंतु इय पकरा व किति चिरठितिके सिया
९. इय हि अठे वढि वढिसिति विपुलं च वढिसिति अपलधियेना दियढियं
वढिसत
१०. इय च अठे पवतिसु लेखापेत बालत
११. हथ च अथि सिलाथंभे सिलाथंभसि लाखापेतवय त
१२. एतिना च वयजनेना यावतक तुफक अहाले सव विवसेतवाय ति
१३. व्यूठेना सावने कटे
१४. २०० ५० ६ सत विवासा त


पृष्ठ ३५

लघु शिला : रूपनाथ / ३५
हिंदी रूपांतर
लघु शिला : रूपनाथ
१. देवानांप्रिय ऐसा कहते हैं।
२. अढाई वर्ष से कुछ अधिक समय हो गया है जब से मैं प्रकट रूप से
उपासक हूँ।
३. परंतु मैंने डट कर पराक्रम नहीं किया।
४. परंतु एक वर्ष से कुछ अधिक समय हो गया है जब से मैं संघ हो गया
हूँ और खूब पराक्रम किया है।
५. जो इस काल में जंबुद्वीप में देवगण (मनुष्यों से) विलग हो गये थे वे
अब (मेरे द्वारा उनसे) मिलवा दिये गये हैं।
६. यह पराक्रम का ही फल है।
७. और यह (केवल) बड़े (आदमी) के ही बस में नहीं है (बल्कि) पराक्रम
करने वाला छोटा (आदमी) भी, अथाह होने पर भी, स्वर्ग प्राप्त कर सकता है।
८. और इस प्रयोजन के लिए यह घोषणा की गयी है कि छोटे वा बड़े
(सभी) पराक्रम करें और (मेरे) सीमावर्ती लोग भी जान जायं कि यही पराक्रम
चिरस्थायी हो।
९. क्योंकि यह उद्देश्य आगे-से-आगे बढ़ेगा और खूब बढ़ेगा – कम-से-कम
ड्योढ़ा बढ़ जायगा।
१०. और इस विषय को सुयोग (उपस्थित) होने पर चट्टानों पर लिखवायें।
११. और यहां (अर्थात, मेरे साम्राज्य में जहां कहीं भी) शिलास्तंभ हों
(वहां-वहां) शिलास्तंभों पर इसे लिखवाया जाना चाहिए।
१२. और इस (घोषणा की) इबारत के अनुसार, जितनी (दूर तक)
आपका अधिकार-क्षेत्र हो, (आप) उन सब स्थानों पर (अपने अधिकारियों
को) भिजवायें।
१३. यह घोषणा प्रवास-काल में की गयी।
१४. (तब तक) २५६ पड़ाव (अर्थात, रात्रि-काल) बीत चुके थे।

[पृष्ठ ३६]

३६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
लघु शिला : कोलकाता - बैराट
१. प्रियदसि लाजा मागधे संघं अभिवादेतूनं आहा अपाबाधतं च
फासुविहालतं चा
२. विदिते वे भंते आवतके हमा बुधसि धंमसि संघसी ति गालवे च प्रसादे च
३. ए केचि भंते भगवता बुधेन भासिते सर्वं से सुभासिते वा
४. ए चु खो भंते हमियाये दिसेया हेवं सधंमे चिरठीतीके होसती ति
अलहामि हकं तं वातवे
५. इमानि भंते धंमपलियायानि विनयसमुकसे अलियवसानि
अनागतभयानि मुनिगाथा मोनेयसूते उपतिसपसिने ए चा लाघुलोवादे मुसावादं
अधिगिच्य भगवता बुधेन भासिते एतानि भंते धंमपलियायानि इच्छामि किंति
बहुके भिखुपाये चा भिखुनिये चा अभिखिनं सुनेयु चा उपधारेयेयू चा
६. हेमेवा उपासका चा उपासिका चा
७. एतेनि भंते इमं लिखापयामि अभिप्रेतं मे जानंतू ति


लघु शिला : ब्रह्मगिरि
१. सुवणंगिरीते अयपुतस महामाताणं च वचनेन इसिलासि महामाता
आरोगियं वतविया हेवं च वतविया
२. देवाणांपिये आणपयति
३. अधिकानि अढातिियानि वसानि य हकं..... सके
४. नो तु खो बाढं प्रकंते हुसं एकं सवछरं
५. सातिरेके तु खो संवछरं यं मया संघे उपागीते बाढं च मे पक्वंते
६. इमिना चु कालेन अमिसा समाना मुनिसा जंबुदीपसि मिसा देवेहि
७. पकमस हि इयं फले


[पृष्ठ ३७]

लघु शिला : कोलकाता - बैराट / ३७
लघु शिला : कोलकाता - बैराट
१. मगध के राजा प्रियदर्शी संघ को अभिवादन करके उनके स्वास्थ्य और
सुखविहार की कामना करते हैं।
२. आप भदंतगण को विदित ही है कि मेरे मन में बुद्ध, धर्म और संघ के
प्रति कितना आदर एवं अनुराग है।
३. हे भदंतगण! जो कुछ भगवान् बुद्ध ने कहा है वह सब सुभाषित ही है।
४. परंतु, भदंतगण! जैसा कि मुझे सुझाई देता है कि सद्धर्म ऐसे चिरस्थायी
होगा, उस बारे में मैं यह बतलाना चाहता हूँ-
५. भदंतगण! यह परियाति है - विनयसमुत्कर्ष, अलियवसाणि,
अनागतभयानि, मुनिगाथा, मोनेयसूत्त, उपतिसपसिने और ऐसे ही लाघुलोवाद
में मुसावाद के बारे में भगवान बुद्ध ने जो कुछ कहा है। इस परियाति को,
भदंतगण! मैं चाहता हूँ कि बहुत से पूज्य भिक्षु एवं भिक्षुणियां बार-बार सुनें
और धारण करें।
६. और इसी प्रकार उपासक तथा उपासिकाएं (भी)।
७. भदंतगण! यह इस प्रयोजन से लिखवाता हूँ जिससे कि (लोग) मेरा
अभिप्राय जान जायं।


लघु शिला : ब्रह्मगिरि
१. सुवर्णगिरि से कुमार तथा महामात्रों के हवाले से इसिल के महामात्रों के
आरोग्य के बारे में पूछा जाय और (तत्पश्चात) यह कहा जाय -
२. देवानांप्रिय की आज्ञा है-
३. कि अढ़ाई वर्ष से अधिक (समय) हुआ है जब से मैं उपासक हूं।
४. परंतु मैंने एक वर्ष तक निःसंदेह डट कर पराक्रम नहीं किया।
५. परंतु एक वर्ष से कुछ अधिक समय हुआ है जब से मैं संघ हो गया हूं
और खूब पराक्रम कर रहा हूँ।
६. इस काल में जंबुद्वीप में (देवगण से) विलग हुए-हुए मनुष्य उनसे
मिलवा दिये गये हैं।
७. यह पराक्रम का ही फल है।

पृष्ठ ३८

३८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
८. नो हीयं सक्ये महात्तेनेव पापोतवे कामं तु खो खुदकेन पि पकम-
णेण विपुले सुवगे आराधेत्तवे
९. एतायठाय इयं सावणे सावापिते.... महाप्पा च इमं पकमेयु ति अंता
मे जानेयु चिरठितीके च इयं पक....
१०. इयं च अठे वढिसिति विपुलं पि च वढिसिति अवरधिया दियढि
वढिसिति
११. इयं च सावणे सावापिते व्यूथेन
१२. २०० ५० ६
१३. से हेवं देवाणांपिये आह
१४. मातापितिसु सुस्रुसितविये हेमेव गरुसु प्राणेषु द्रहितव्यं सचं वतव्ये
से इमे धंमगुणा पवतितविया
१५. हेमेव अंतेवासिना अचारिये अपचायितविये ज्ञातिकेषु च कं य.... हे
पवतितविये
१६. एसा पोराणा पकिती दीघावुसे च एस
१७. हेवं एस कटिविये
१८. चपडेन लिखितं लिपिकरेण


पृष्ठ ३९

लघु शिला : ब्रह्मगिरि / ३९
८. निश्चय ही यह केवल बड़े (आदमी) द्वारा ही प्राप्त नहीं किया जा
सकता है बल्कि, चाहना होने पर, छोटे (आदमी) द्वारा भी पराक्रम करते हुए,
निःसंदेह, विपुल स्वर्ग प्राप्त किया जा सकता है।
९. इस प्रयोजन के लिए यह प्रज्ञापन करवाया गया है कि (छोटे) और बड़े
(सभी) यह पराक्रम करें और मेरे सीमावर्ती लोग भी (इसे) जान जायं और यह
पराक्रम चिरस्थायी हो।
१०. और यह उद्देश्य बढ़ेगा और खूब बढ़ेगा - कम से कम डेढ़ गुना (बढ़
जायगा)।
११. और यह प्रज्ञापन (मेरे) प्रवास-काल में किया गया है।
१२. (इस समय तक) २५६ (रात्रि-विश्राम किये जा चुके हैं)।
१३. और भी देवानांप्रिय का यह कहना है -
१४. माता-पिता की सेवा करनी चाहिए (और) ऐसे ही गुरुजनों की,
प्राणियों के प्रति (दयाभाव को) दृढ़ करना चाहिए, सच बोलना चाहिए, - तो
इन धर्मों के गुणों को व्यवहार में उतारना चाहिए।
१५. इसी प्रकार (आचार्य के सान्निध्य में रहने वाले) शिष्य द्वारा आचार्य
का आदर-सत्कार किया जाना चाहिए और ज्ञातिभाइयों के साथ यथायोग्य
बर्ताव किया जाना चाहिए।
१६. यह सनातन रीति है और इससे आयु बढ़ती है।
१७. इसी के अनुसार (कार्य) करना चाहिए।
१८. लिपिकार चपड द्वारा लिखा गया।

खंड (३)
लघु स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख

४२ / सम्राट अशोक के अभिलेख

मूल अभिलेख

लघु स्तंभ : सारनाथ

१-३. देवा.... ए लं.... पाट.... ये केनपि संघे भेतवे
४. ए चुं खो भिखु वा भिखुनि वा संघं भाखति से ओदातानि दुसानि
संनंघयिया अनावाससि आवासयिये
५. हेवं इयं सासने भिखुसंघसि च भिखुनिसंघसि च विंनपयितविये
६. हेवं देवानंपिये आहा
७. हेदिसा च एका लिपि तुफाकंतिकं हुवाति संसरनसि निखिता इकं च
लिपिं हेदिसमेव उपासकानंतिकं निक्खिपथ
८. ते पि च उपासका अनुपोसथं यातु एतमेव सासनं विस्वंसयितवे
अनुपोसथं च धुवाये इकिंके महामाते पोसथाये याति एतमेव सासनं
विस्वंसयितवे आजानेत्तवे च
९. आवते च तुफाकं आहाले सवत विवासयाथ तुफे एतेन वियंजनेन
१०. हेमेव सवेसु कोटविषवेसु एतेन वियंजनेन विवासापयाथा

लघु स्तंभ : सारनाथ / ४३

हिंदी रूपांतर

लघु स्तंभ : सारनाथ

१. देवा (नांप्रिय) ...................
२. ................... पाट (लिपुत्र) ...................
३. ........... किसी के भी द्वारा संघ का भेदन (नहीं किया जा सकता)।
४. परंतु यदि कोई भिक्षु अथवा भिक्षुणी संघ का भेदन करे तो उसे श्वेत
वस्त्र पहना कर (भिक्षुओं-भिक्षुणियों के) अयोग्य स्थान पर बसाया जाना
चाहिए।
५. इस प्रकार यह आदेश भिक्षुओं के संघ में और भिक्षुणियों के संघ में
जानकारी में लाया जाना चाहिए।
६. देवानंप्रिय ऐसा कहते हैं-
७. इस प्रकार की एक लिखावट आपके पास चौपाल में रखी हुई हो और
ऐसी ही एक लिखावट उपासकों के पास रखें।
८. और वे उपासक भी हर उपोसथ के दिन इस आदेश के प्रति (अपना)
विश्वास जमाने के लिए आयें और निश्चित रूप से प्रत्येक उपोसथ के दिन
प्रत्येक महामात्र इसी आदेश के प्रति (अपना) विश्वास जमाने और इसे पूरी
तरह समझने के लिए उपोसथ में आयें।
९. और जहां तक आपका अधिकार-क्षेत्र है, वहां तक सब जगह यह
आदेश लेकर (आप) दौरा करें।
१०. और इसी प्रकार सब दुर्गम प्रदेशों में इस आदेश के साथ (अपने
अधीनस्थ अधिकारियों को) भिजवायें।

[पृष्ठ ४४]
४४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई
१. देवानंपियेन पियदसिन लाजिन वीसतिवसाभिसितेन अतन आगाच
महीयिते हिद बुधे जाते सक्यमुनी ति
२. सिला विगडभी चा कालापित सिलाथभे च उसपापिते हिद भगवं जाते ति
३. लुंमिनिगामे उबलिके कटे अठभागिये च
लघु स्तंभ : निगली सागर
१. देवानंपियेन पियदसिन लाजिन चोदसवसाभिसितेन बुधस कोनाकमनस
थुबे दुतियं वढिते
२. ....... साभिसितेन च अतन अगाच महीयिते ...... पापिते

[पृष्ठ ४५]
लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई / ४५
लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई
१. अभिषेक के बीस वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
स्वयं (यहाँ) आकर पूजन किया गया क्योंकि यहां पर शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म
हुआ था।
२. (उनके द्वारा यहां पर) पत्थर की बहुत बड़ी दीवार बनवायी गयी और
शिला-स्तंभ खड़ा करवाया गया क्योंकि यहां पर भगवान की उत्पत्ति हुई थी।
३. लुंबिनी ग्राम के धार्मिक कर माफ कर दिये गये और मालगुजारी के रूप
में केवल आठवां हिस्सा (रखा गया)।
लघु स्तंभ : निगली सागर
१. अभिषेक के चौदह वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
कोणगमन बुद्ध का स्तूप दूसरी बार बड़ा करवाया गया।
२. और अभिषेक के (बीस) वर्ष हो चुकने पर (उन्होंने यहां) स्वयं आकर
पूजा की (और एक शिला-स्तंभ खड़ा) करवाया।

खंड (४)
स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख

, सत्य (और)
शुचिता (पवित्रता)।
Wait, let's check line 3:
"३. पाप-कर्मों से दूर रहना, खूब सत्कर्म करना, दया, दान, सत्य (और)"
Look at "दान": दया, दान, सत्य (और)
Line 4:
"शुचिता (पवित्रता)।"
Line 5:
"४. मेरे द्वारा अनेक प्रकार के चक्षुदान भी किये गये हैं।"
Line 6:
"५. दुपायों और चौपायों पर, और खे-चरों तथा जल-चरों पर प्राणदान देने"
Line 7:
"तक मैंने नाना प्रकार के उपकार किये हैं।"
Line 8:
"६. मेरे द्वारा और भी बहुत से कुशल कार्य किये गये हैं।"
Line 9:
"७. मेरे इस प्रयोजन के लिए यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है कि (लोग)"
Line 10:
"इसके अनुसार आचरण करें और यह चिरस्थायी हो।"
Line 11:
"८. और जो इसके अनुसार आचरण करेगा वह सुकृत (सत्कर्म)"
Line 12:
"(ही) करेगा।"

Let's verify line by line carefully:
Under "स्तंभ देहली-टोपरा : द्वितीय अभिलेख":
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
२. धर्म श्रेष्ठ है, परन्तु धर्म है क्या?
३. पाप-कर्मों से दूर

पृष्ठ ५०

५० / सम्राट अशोक के अभिलेख
स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि लाज हेव अहा
२. कयानमेव देखति इयं मे कयाने कटे ति
३. नो मिन पापं देखति इयं मे पापे कटे ति इयं वा आसिनवे नामा ति
४. दुपवेखे चु खो एसा
हेवं चु खो एस देखिये
५. इमानि आसिनवगामीनि नाम अथ चंडिये निठूलिये कोधे माने इस्या
कालनेन व हकं मा पलिसचयिसं
६. एस बाढ देखिये
७. इयं मे हिदिकाये इयमेव मे पालतिकाये

स्तंभ देहली-टोपरा : चतुर्थ अभिलेख
१. देवानंपिय पियदसि लाज हेव आहा
२. सडुवीसतिवसअभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता
३. लजूका मे बहुसु पानसतसहसेसु जनसि आयता
४. तेसं ये अभिहाले वा दंडे वा अतपतिये मे कटे किंति लजूका असथ
अभीता कंमानि पवतवेवू जनस जानपदसा हितसुखं उपदहेवू अनुगहिनेवु चा
५. सुखीयदुखीयनं जानिसंति धंमयुतेन च वियोवदिसंति जनं जानपदं
किंति हिदतं च पालातं च आलाधयेवू ति
६. लजूका पि इच्छंति पटिचलितवे मं
७. पुलिसानि पि मे छंदनानि पटिचलिंसंति


पृष्ठ ५१

स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख / ५१
स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
२. (मनुष्य) (अपना) भला काम ही देखता है (और अपने मन में सोचता
है) 'मैंने यह भला काम किया है।'
३. (वह अपना) बुरा काम जरा भी नहीं देखता (और अपने मन में नहीं
सोचता है;) 'मैंने यह पाप-कर्म किया है', अथवा 'यह आसिनव (बांधने
वाला कर्म) है।'
४. इसकी पहचान करना बड़ा कठिन कार्य है।
५. परंतु इसे, निःसंदेह, इस प्रकार देखना चाहिए-
६. प्रचंडता, निष्ठुरता, क्रोध, अभिमान (और) ईर्ष्या - ये क्लेश को प्राप्त
कराने वाले हैं। इस कारण से मैं कहीं पतित न हो जाऊं।
७. इसे अच्छी तरह जान लेना चाहिए-
८. यह मेरे ऐहिक (लाभ) के लिए है और वह दूसरा मेरे पारलौकिक
(लाभ) के लिए।

स्तंभ देहली-टोपरा : चतुर्थ अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
२. अभिषेक के २६ वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह धर्मलिपि लिखवायी
गयी है।
३. मेरे 'रज्जुक' (नाम के अधिकारी) कई लाख प्राणियों और मनुष्यों के
बीच नियुक्त हैं।
४. उनको अभियोग चलाने अथवा दंड देने के मामलों में मैंने उन्हीं के
विवेक पर छोड़ दिया है। क्यों? (जिससे कि) रज्जुक आश्वस्त और निर्भय
होकर कर्मों में प्रवृत्त हों, देशवासियों को हित-सुख प्रदान करें और (उनका)
उपकार करें।
५. वे सुख-दुःख (के कारणों) को जानेंगे और धर्म का पालन करने वाले
(व्यक्तियों की सहायता से) देशवासियों को प्रेरित करेंगे जिससे कि वे इस
लोक और परलोक (का सुख) प्राप्त कर सकें।
६. रज्जुक भी मेरी आज्ञा का पालन करने के लिए उत्सुक रहते हैं।
७. (सामान्य) (राज-) पुरुष भी मेरी इच्छाओं के अनुसार चलेंगे।

ी, बिना हाड़ वाला मच्छ, वेदवेयक, गंगापुपुटक, संकुज-मत्स्य, कछुआ और शल्यक, पर्णशश, बारकपिंजर, सांड, ओकपिंड, गैंडा, श्वेत कपोत, ग्राम कपोत (और) सभी चौपाये जो उपयोग में नहीं आते और न खाये जाते हैं।`

Wait, look at "कछुवी" in page 53:
छोटी चींटी, कछुवी, बिना हाड़ वाला मच्छ (or कछवी) -> looks like कछुवी or कढवी? In line 2: दडी is translated as कछुवी or कछवी? Ah, दडी -> कछवी or कछुवी.
And बेदवेयक / वेदवेयक.

Let's present both pages clearly, labeling Page 52 and Page 53, line by line.### पृष्ठ ५२

५२ / सम्राट अशोक के अभिलेख

८. ते पि च कति विसंनपयितवे येन मं लघुकं चलेयुति अताथयेनिसं
९. अथा हि पजं वियते धातिपे निसितिज अस्यथ होति वियत धाति
चघति मे पजं सुख