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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 80 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

[पृष्ठ ३६]

३६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
लघु शिला : कोलकाता - बैराट
१. प्रियदसि लाजा मागधे संघं अभिवादेतूनं आहा अपाबाधतं च
फासुविहालतं चा
२. विदिते वे भंते आवतके हमा बुधसि धंमसि संघसी ति गालवे च प्रसादे च
३. ए केचि भंते भगवता बुधेन भासिते सर्वं से सुभासिते वा
४. ए चु खो भंते हमियाये दिसेया हेवं सधंमे चिरठीतीके होसती ति
अलहामि हकं तं वातवे
५. इमानि भंते धंमपलियायानि विनयसमुकसे अलियवसानि
अनागतभयानि मुनिगाथा मोनेयसूते उपतिसपसिने ए चा लाघुलोवादे मुसावादं
अधिगिच्य भगवता बुधेन भासिते एतानि भंते धंमपलियायानि इच्छामि किंति
बहुके भिखुपाये चा भिखुनिये चा अभिखिनं सुनेयु चा उपधारेयेयू चा
६. हेमेवा उपासका चा उपासिका चा
७. एतेनि भंते इमं लिखापयामि अभिप्रेतं मे जानंतू ति


लघु शिला : ब्रह्मगिरि
१. सुवणंगिरीते अयपुतस महामाताणं च वचनेन इसिलासि महामाता
आरोगियं वतविया हेवं च वतविया
२. देवाणांपिये आणपयति
३. अधिकानि अढातिियानि वसानि य हकं..... सके
४. नो तु खो बाढं प्रकंते हुसं एकं सवछरं
५. सातिरेके तु खो संवछरं यं मया संघे उपागीते बाढं च मे पक्वंते
६. इमिना चु कालेन अमिसा समाना मुनिसा जंबुदीपसि मिसा देवेहि
७. पकमस हि इयं फले


[पृष्ठ ३७]

लघु शिला : कोलकाता - बैराट / ३७
लघु शिला : कोलकाता - बैराट
१. मगध के राजा प्रियदर्शी संघ को अभिवादन करके उनके स्वास्थ्य और
सुखविहार की कामना करते हैं।
२. आप भदंतगण को विदित ही है कि मेरे मन में बुद्ध, धर्म और संघ के
प्रति कितना आदर एवं अनुराग है।
३. हे भदंतगण! जो कुछ भगवान् बुद्ध ने कहा है वह सब सुभाषित ही है।
४. परंतु, भदंतगण! जैसा कि मुझे सुझाई देता है कि सद्धर्म ऐसे चिरस्थायी
होगा, उस बारे में मैं यह बतलाना चाहता हूँ-
५. भदंतगण! यह परियाति है - विनयसमुत्कर्ष, अलियवसाणि,
अनागतभयानि, मुनिगाथा, मोनेयसूत्त, उपतिसपसिने और ऐसे ही लाघुलोवाद
में मुसावाद के बारे में भगवान बुद्ध ने जो कुछ कहा है। इस परियाति को,
भदंतगण! मैं चाहता हूँ कि बहुत से पूज्य भिक्षु एवं भिक्षुणियां बार-बार सुनें
और धारण करें।
६. और इसी प्रकार उपासक तथा उपासिकाएं (भी)।
७. भदंतगण! यह इस प्रयोजन से लिखवाता हूँ जिससे कि (लोग) मेरा
अभिप्राय जान जायं।


लघु शिला : ब्रह्मगिरि
१. सुवर्णगिरि से कुमार तथा महामात्रों के हवाले से इसिल के महामात्रों के
आरोग्य के बारे में पूछा जाय और (तत्पश्चात) यह कहा जाय -
२. देवानांप्रिय की आज्ञा है-
३. कि अढ़ाई वर्ष से अधिक (समय) हुआ है जब से मैं उपासक हूं।
४. परंतु मैंने एक वर्ष तक निःसंदेह डट कर पराक्रम नहीं किया।
५. परंतु एक वर्ष से कुछ अधिक समय हुआ है जब से मैं संघ हो गया हूं
और खूब पराक्रम कर रहा हूँ।
६. इस काल में जंबुद्वीप में (देवगण से) विलग हुए-हुए मनुष्य उनसे
मिलवा दिये गये हैं।
७. यह पराक्रम का ही फल है।