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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 80 में से

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पृष्ठ 23

पृष्ठ २८

२८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
६. अथ पजाये इच्छामि किति मे सवेणा हितसुखेन युजेयू अथ पजाये
इच्छामि किति मे सवेन हितसुखेन युजेयू ति हिदलोकिकपाललोकिकेन हेवमेव मे
इछ सवमुनिसु
७. सिया अंतानं अविजितानं किंछंदे सु लाजा अफेषु ति
८. एताका वा मे इछ अंतेसु पापुनेयु लाजा हेव इच्छति अनुविगीन हेयू
ममियाये अस्वसेयु च मे सुखंमेव च लहेयू ममते नो दुखं हेव च पापुनेयु खमिसति
ने लाजा ए सकिये खमितवे ममं निमितं च धंमं चलेयू ति हिदलोगं च पललोगं
च आराधयेयु
९. एताये च अठाये हकं तुफेनि अनुसासामि अनने एतकेन हकं तुफेनि
अनुसासितु छंदं च वेदितु आ मम धिति पटिना च अचल
१०. स हेव कटू कंम चेलितवियं अस्वासनिया च ते एन ते पापुनेयु अथा
पित हेव ने लाजा ति अथ अतानं अनुकंपति हेव अंकेनि अनुकंपति अथा पजा
हेवं मयं राजिने
११. तुफेनि हकं अनुसासितु छंदं च वेदित आ मम धिति पटिना या अचल
सकलदेसाआयुक्तिके होसामि एतसि अथसि
१२. अलं हि तुफे अस्वासनाये हितसुखाये च तेस
हिदलोकिकपाललोकिकाये
१३. हेव च करंतं स्वगं च आराघयिसथ मम च आनन्यं एषथ
१४. एताये च अठाये इयं लिपी लिखित हिद एन महामाता सास्वंतं समं
युजंतू अस्वासनाये च धंमचलनाये च अंतानं
१५. इयं च लिपी अनुचातुंमासं सोतविया तिसेन


पृष्ठ २९

जौगड़ शिला : द्वितीय पृथक अभिलेख / २९
६. जैसे मैं अपनी संतान के लिए कामना करता हूँ कि वे कैसे इहलोक तथा
परलोक के सर्वप्रकार के हित-सुख के भागी हों, वैसे ही सब मनुष्यों के लिए
मेरी मनोकामना है।
७. अ-विजित सीमावर्ती लोगों के मन में यह जिज्ञासा हो सकती है कि
हमारे बारे में राजा क्या सोचते हैं।
८. सीमावर्ती लोगों के बारे में मेरी इतनी अभिलाषा (उन तक) पहुँचानी
चाहिए कि राजा ऐसा चाहते हैं कि वे उद्विग्न न हों, मेरे प्रति आश्वस्त हों और
मेरे से सुख ही पायें, दुःख नहीं। और उन्हें यह पता चले कि राजा उन्हें
यथासंभव क्षमा कर देंगे और वे मेरे निमित्त धर्म पर चलें जिससे कि वे इहलोक
और परलोक का सुख प्राप्त कर सकें।
९. और इसी प्रयोजन के लिए मैं आपको अनुदेश देता हूँ जिससे कि इससे
(उनके प्रति मुझ पर जो ऋण है उससे) उऋण हो सकूँ। मैं आपको अनुदेश
देता हूँ और अपनी मनोकामना जतलाता हूँ जो कि मेरी स्थिर या अटल प्रतिज्ञा
है।
१०. इसलिए इस प्रकार आचरण करते हुए आपको (अपना)
कर्तव्य-(पालन) करना चाहिए और उनको आश्वासन देना चाहिए जिससे वे
समझ जायें कि राजा हमारे लिए वैसे ही हैं जैसे कि पिता, जैसे वह अपने पर
कृपा करते हैं वैसे ही हमारे पर कृपा करते हैं, हम राजा के लिए वैसे ही हैं जैसे
कि (उनकी अपनी) प्रजा।
११. आपको अनुदेश देकर और अपनी मनोकामना जतला कर, जो कि
मेरी स्थिर या अटल प्रतिज्ञा है, मैं इस प्रयोजन के लिए सारे देश में अधिकारी
नियुक्त करूँगा।
१२. क्योंकि आप उन्हें आश्वस्त करने और इहलोक तथा परलोक का
हित-सुख प्राप्त कराने की क्षमता रखते हैं।
१३. और ऐसा करते हुए (आप) स्वर्ग-लाभ करेंगे और मेरे ऋण से उऋण
हो पाएँगे।
१४. और इस प्रयोजन के लिए यहाँ पर लिखावट लिखी गयी है जिससे कि
महामात्र हर समय सीमावर्ती लोगों को भरोसा दिलाने और धर्म में प्रवृत्त करने
के काम में लगे रहें।
१५. और इस लिखावट को (सभी द्वारा) प्रत्येक चातुर्मास में तिष्य (नक्षत्र)
के दिन सुना जाना चाहिए।