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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 80 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

४२ / सम्राट अशोक के अभिलेख

मूल अभिलेख

लघु स्तंभ : सारनाथ

१-३. देवा.... ए लं.... पाट.... ये केनपि संघे भेतवे
४. ए चुं खो भिखु वा भिखुनि वा संघं भाखति से ओदातानि दुसानि
संनंघयिया अनावाससि आवासयिये
५. हेवं इयं सासने भिखुसंघसि च भिखुनिसंघसि च विंनपयितविये
६. हेवं देवानंपिये आहा
७. हेदिसा च एका लिपि तुफाकंतिकं हुवाति संसरनसि निखिता इकं च
लिपिं हेदिसमेव उपासकानंतिकं निक्खिपथ
८. ते पि च उपासका अनुपोसथं यातु एतमेव सासनं विस्वंसयितवे
अनुपोसथं च धुवाये इकिंके महामाते पोसथाये याति एतमेव सासनं
विस्वंसयितवे आजानेत्तवे च
९. आवते च तुफाकं आहाले सवत विवासयाथ तुफे एतेन वियंजनेन
१०. हेमेव सवेसु कोटविषवेसु एतेन वियंजनेन विवासापयाथा

लघु स्तंभ : सारनाथ / ४३

हिंदी रूपांतर

लघु स्तंभ : सारनाथ

१. देवा (नांप्रिय) ...................
२. ................... पाट (लिपुत्र) ...................
३. ........... किसी के भी द्वारा संघ का भेदन (नहीं किया जा सकता)।
४. परंतु यदि कोई भिक्षु अथवा भिक्षुणी संघ का भेदन करे तो उसे श्वेत
वस्त्र पहना कर (भिक्षुओं-भिक्षुणियों के) अयोग्य स्थान पर बसाया जाना
चाहिए।
५. इस प्रकार यह आदेश भिक्षुओं के संघ में और भिक्षुणियों के संघ में
जानकारी में लाया जाना चाहिए।
६. देवानंप्रिय ऐसा कहते हैं-
७. इस प्रकार की एक लिखावट आपके पास चौपाल में रखी हुई हो और
ऐसी ही एक लिखावट उपासकों के पास रखें।
८. और वे उपासक भी हर उपोसथ के दिन इस आदेश के प्रति (अपना)
विश्वास जमाने के लिए आयें और निश्चित रूप से प्रत्येक उपोसथ के दिन
प्रत्येक महामात्र इसी आदेश के प्रति (अपना) विश्वास जमाने और इसे पूरी
तरह समझने के लिए उपोसथ में आयें।
९. और जहां तक आपका अधिकार-क्षेत्र है, वहां तक सब जगह यह
आदेश लेकर (आप) दौरा करें।
१०. और इसी प्रकार सब दुर्गम प्रदेशों में इस आदेश के साथ (अपने
अधीनस्थ अधिकारियों को) भिजवायें।