सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
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४४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई
१. देवानंपियेन पियदसिन लाजिन वीसतिवसाभिसितेन अतन आगाच
महीयिते हिद बुधे जाते सक्यमुनी ति
२. सिला विगडभी चा कालापित सिलाथभे च उसपापिते हिद भगवं जाते ति
३. लुंमिनिगामे उबलिके कटे अठभागिये च
लघु स्तंभ : निगली सागर
१. देवानंपियेन पियदसिन लाजिन चोदसवसाभिसितेन बुधस कोनाकमनस
थुबे दुतियं वढिते
२. ....... साभिसितेन च अतन अगाच महीयिते ...... पापिते
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लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई / ४५
लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई
१. अभिषेक के बीस वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
स्वयं (यहाँ) आकर पूजन किया गया क्योंकि यहां पर शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म
हुआ था।
२. (उनके द्वारा यहां पर) पत्थर की बहुत बड़ी दीवार बनवायी गयी और
शिला-स्तंभ खड़ा करवाया गया क्योंकि यहां पर भगवान की उत्पत्ति हुई थी।
३. लुंबिनी ग्राम के धार्मिक कर माफ कर दिये गये और मालगुजारी के रूप
में केवल आठवां हिस्सा (रखा गया)।
लघु स्तंभ : निगली सागर
१. अभिषेक के चौदह वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
कोणगमन बुद्ध का स्तूप दूसरी बार बड़ा करवाया गया।
२. और अभिषेक के (बीस) वर्ष हो चुकने पर (उन्होंने यहां) स्वयं आकर
पूजा की (और एक शिला-स्तंभ खड़ा) करवाया।