सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 80 में से
संदर्भ में पढ़ें, सत्य (और)
शुचिता (पवित्रता)।
Wait, let's check line 3:
"३. पाप-कर्मों से दूर रहना, खूब सत्कर्म करना, दया, दान, सत्य (और)"
Look at "दान": दया, दान, सत्य (और)
Line 4:
"शुचिता (पवित्रता)।"
Line 5:
"४. मेरे द्वारा अनेक प्रकार के चक्षुदान भी किये गये हैं।"
Line 6:
"५. दुपायों और चौपायों पर, और खे-चरों तथा जल-चरों पर प्राणदान देने"
Line 7:
"तक मैंने नाना प्रकार के उपकार किये हैं।"
Line 8:
"६. मेरे द्वारा और भी बहुत से कुशल कार्य किये गये हैं।"
Line 9:
"७. मेरे इस प्रयोजन के लिए यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है कि (लोग)"
Line 10:
"इसके अनुसार आचरण करें और यह चिरस्थायी हो।"
Line 11:
"८. और जो इसके अनुसार आचरण करेगा वह सुकृत (सत्कर्म)"
Line 12:
"(ही) करेगा।"
Let's verify line by line carefully:
Under "स्तंभ देहली-टोपरा : द्वितीय अभिलेख":
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
२. धर्म श्रेष्ठ है, परन्तु धर्म है क्या?
३. पाप-कर्मों से दूर